चुपचाप आकार ले रहा है BRICS Trade Finance System, डॉलर व्यवस्था को मिल सकती है टक्कर
नई दिल्ली में हाल ही में हुए BRICS शिखर सम्मेलन ने एक ऐसी परियोजना को आगे बढ़ाया है, जो भविष्य में यह तय कर सकती है कि वैश्विक व्यापार को कौन वित्त पोषित करेगा, उसका बीमा कौन करेगा, और उसमें रुकावट डालने की ताकत किसके पास होगी। खास बात यह है कि इस बार कोई नई मुद्रा लॉन्च नहीं हुई, न ही चर्चित BRICS Pay का नाम आधिकारिक घोषणापत्र में कहीं लिया गया। फिर भी, अलग-अलग पढ़े जाने पर तकनीकी लगने वाले ये फैसले, साथ में जोड़कर देखने पर एक नए वैकल्पिक व्यापार-वित्त ढांचे की नींव जैसे नजर आते हैं।
एक निर्यात ऑर्डर को कितने पड़ावों से गुजरना पड़ता है
इसे समझने के लिए मान लीजिए पुणे की एक इंजीनियरिंग कंपनी को ब्राजील के साओ पाउलो स्थित किसी फूड प्रोसेसिंग कंपनी से पैकेजिंग मशीनरी का ऑर्डर मिलता है, जिसका भुगतान डिलीवरी के 90 दिन बाद होना तय है। इस सौदे को पूरा होने तक कई पड़ावों से गुजरना पड़ता है — निर्माता को माल बनाने के लिए पहले कर्ज चाहिए, जिसके लिए बैंक आमतौर पर डॉलर-आधारित व्यापार-वित्त माध्यमों से मदद करते हैं। इसके बाद माल का बीमा जरूरी है, जिसमें लंदन जैसे केंद्रों की भूमिका आज भी सबसे बड़ी है। भुगतान का निर्देश अक्सर SWIFT के जरिए भेजा जाता है, और पैसा अमेरिकी क्लियरिंग व्यवस्था से होकर गुजरता है — भले ही सौदा भारत और ब्राजील की दो कंपनियों के बीच ही क्यों न हो। अगर कोई विवाद खड़ा हो, तो अनुबंध में अक्सर अंग्रेज़ी कानून और लंदन या सिंगापुर में मध्यस्थता का जिक्र होता है।
यही वह ढांचा है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार को संभव तो बनाता है, लेकिन साथ ही एक निर्भरता भी पैदा करता है। किसी बैंक पर प्रतिबंध, बीमा कवरेज की वापसी, या किसी करेस्पॉन्डेंट बैंक का भुगतान संसाधित करने से इनकार, एक व्यावहारिक रूप से ठीक-ठाक सौदे को भी रोक सकता है। प्रतिबंधों की असली ताकत इसी ढांचे से निकलती है।
नई दिल्ली घोषणापत्र में क्या-क्या शामिल है?
BRICS के नए दिल्ली घोषणापत्र में इसी पूरी श्रृंखला के हर पड़ाव को कवर करने की कोशिश की गई है। सबसे पहले क्रेडिट की बात आती है — घोषणापत्र में निर्यातोन्मुखी छोटे और मझोले उद्यमों (MSME) का आकलन व्यापक जानकारी के आधार पर करने के सिद्धांतों का स्वागत किया गया है, ताकि पारंपरिक दस्तावेजों या गिरवी संपत्ति के अलावा कारोबारी रिकॉर्ड जैसी अन्य जानकारी भी काम आ सके। साथ ही एक BRICS इनवॉइस-डिस्काउंटिंग तंत्र पर अध्ययन के लिए जयपुर सहमति का भी स्वागत किया गया है, जिससे छोटे निर्यातकों को अपने बकाया भुगतान को तुरंत नकदी में बदलने में मदद मिल सकती है।
इसके बाद बीमा का मुद्दा है। घोषणापत्र में पुनर्बीमा क्षमता बढ़ाने और एक स्वैच्छिक BRICS बीमा रेजिलिएंस सेंटर की बात कही गई है, जबकि भारत ने गिफ्ट सिटी में एक रिस्क लैब बनाने का प्रस्ताव रखा है। विशेषज्ञ इसे सबसे मुश्किल कड़ी मानते हैं, क्योंकि बीमा के लिए पर्याप्त पूंजी और अलग-अलग जोखिमों व भौगोलिक क्षेत्रों में विविधता जरूरी होती है — और BRICS सदस्यों में ईरान और UAE जैसे परस्पर विरोधी रणनीतिक हितों वाले देश भी शामिल हैं।
भुगतान और निपटान (सेटलमेंट) को लेकर भी काम जारी है — भुगतान की आपसी अनुकूलता और राष्ट्रीय मुद्राओं के अधिक इस्तेमाल पर चर्चा, डिजिटल व्यापार दस्तावेज़ीकरण और सीमा-शुल्क सहयोग, तथा मध्यस्थता व विवाद निपटान को बढ़ावा देना — ये सभी विषय घोषणापत्र में शामिल हैं। इसके अलावा घोषणापत्र में न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) से स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण बढ़ाने, बहुपक्षीय गारंटी तंत्र को आगे बढ़ाने और एक नए निवेश प्लेटफॉर्म पर अध्ययन समूह बनाने का भी जिक्र है।
भारत-रूस व्यापार से मिला सबक
भारत-रूस व्यापार का अनुभव बताता है कि सिर्फ भुगतान माध्यम बदलने से पूरी समस्या हल नहीं होती। 2023 में रुपये में भुगतान को लेकर बातचीत एक बुनियादी अड़चन में फंस गई थी — रूस भारत को जितना बेच रहा था, उसकी तुलना में खरीद बहुत कम थी, जिससे बड़ी मात्रा में जमा रुपयों का क्या किया जाए, यह सवाल खड़ा हो गया था। भारतीय रिज़र्व बैंक ने बाद में इन अतिरिक्त रुपयों को परियोजनाओं, निवेश और सरकारी प्रतिभूतियों में लगाने की अनुमति देकर इस दिक्कत को कुछ हद तक कम किया। यही वजह है कि नई दिल्ली शिखर सम्मेलन के आसपास रूसी कंपनी ट्रांसमैशहोल्डिंग ने भारत में उत्पादन कर तीसरे बाजारों में बेचने की योजनाओं पर भी चर्चा की — यानी सिर्फ भुगतान की सुविधा ही नहीं, बल्कि उस पैसे को किसी उत्पादक काम में लगाने का रास्ता भी उतना ही जरूरी है।
चुप्पी की रणनीति क्यों अपनाई जा रही है?
कोई भी वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क बनाना मौजूदा व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती माना जाता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही उन देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी दे चुके हैं, जो किसी BRICS मुद्रा या डॉलर के विकल्प का समर्थन करते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि चुपचाप बुनियादी ढांचा तैयार करना एक सोची-समझी रणनीति है — कोई बड़ा ऐलान नहीं, बल्कि भुगतान अनुकूलता, निपटान, व्यापार-वित्त, बीमा, क्रेडिट आकलन और राष्ट्रीय मुद्राओं जैसे अनाकर्षक लेकिन बुनियादी पहलुओं पर चुपचाप काम। विश्लेषकों के अनुसार अगर यह नेटवर्क डॉलर को भी शामिल करने वाला बहु-मुद्रा तंत्र बन जाए, तो इसे मौजूदा मौद्रिक व्यवस्था के खिलाफ बगावत के बजाय व्यापार के लिए एक अतिरिक्त और व्यावहारिक विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है।
अभी सिर्फ नींव पड़ी है
फिलहाल जो कुछ भी नई दिल्ली में तय हुआ है, वह ज्यादातर अध्ययन, प्रस्तावित तंत्र और शुरुआती प्लेटफॉर्म के स्तर पर ही है। पूंजी जुटाना, बैंकों और बीमा कंपनियों को चुनना, प्रशासनिक ढांचा तय करना, और अंततः इसकी सफलता को लागत, समय और लेनदेन की संख्या के आधार पर परखना — यह सब अभी बाकी है। लेकिन अगर यह व्यवस्था वाकई कारगर साबित होती है, तो पुणे जैसे छोटे निर्यातकों के लिए इसका मतलब होगा — ऑर्डर के लिए आसान कर्ज, माल का भरोसेमंद बीमा, और तय समय पर भुगतान, जिससे उनका 90 दिन बाद मिलने वाला भुगतान जल्दी नकदी में बदल सके।

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