स्कूली शिक्षा में ऐतिहासिक क्रांति: आंध्र प्रदेश की किताबों में टूटीं जेंडर रूढ़ियां, रसोई में खाना पकाते दिखे पिता और ढोल बजातीं बेटियां

पहली और दूसरी कक्षा के नए पाठ्यक्रम में घरेलू कामकाज में पुरुषों और महिलाओं की 50-50 प्रतिशत भागीदारी; शनिवार को ‘नो बैग डे’ और प्रैक्टिकल लाइफ स्किल्स की शुरुआत।

प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही समाज में लैंगिक समानता (Gender Equality), पारंपरिक जेंडर रूढ़ियों के अंत और महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव विकसित करने के उद्देश्य से आंध्र प्रदेश सरकार ने एक बड़ा और प्रगतिशील कदम उठाया है। राज्य के मानव संसाधन विकास (HRD) एवं आईटी मंत्री नारा लोकेश (Nara Lokesh) की पहल पर प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 और 2) की स्कूली किताबों में बड़े बदलाव किए गए हैं। नए पाठ्यक्रमों और चित्रों में अब घरेलू कामों को केवल महिलाओं तक सीमित न दिखाकर पुरुषों और महिलाओं के बीच 50-50 प्रतिशत की समान भागीदारी के रूप में दर्शाया गया है। इसमें पिता को रसोई में खाना बनाते, पुरुषों को सार्वजनिक नल से पानी भरते और लड़कियों को पारंपरिक रूप से लड़कों के माने जाने वाले वाद्ययंत्र (जैसे ढोल और वायलिन) बजाते दिखाया गया है।

नई दिल्ली में ‘पब्लिक अफेयर्स फोरम ऑफ इंडिया’ (PAFI) द्वारा आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम के दौरान मंत्री नारा लोकेश ने इस ऐतिहासिक पाठ्यक्रम सुधार की औपचारिक घोषणा की। उन्होंने बताया कि पहले की किताबों में खाना पकाना, सफाई करना या बच्चों की देखभाल जैसे घरेलू कार्यों में केवल महिलाओं के चित्र होते थे। इस रूढ़िवादिता को बचपन से ही खत्म करने के लिए सरकार ने यह नया दृष्टिकोण अपनाया है। इसके अतिरिक्त, स्कूली शिक्षा में “नो बैग डे” (No Bag Day) लागू करके छात्रों को व्यावहारिक जीवन कौशल, पारिवारिक बजट प्रबंधन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सही उपयोग सिखाया जा रहा है।

1. रसोई में पिता और ढोल बजातीं बेटियां: 50-50 फीसदी काम का नया फॉर्मूला

नए प्राथमिक पाठ्यक्रम में चित्रों और कहानियों के जरिए पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं (Gender Roles) को चुनौती दी गई है:

  • घरेलू कार्यों में पुरुषों की समान भूमिका: किताबों के नए संस्करण में पिता को मां के साथ रसोई में खाना पकाते हुए, पुरुषों को फूलों की दुकान पर माला बुनते हुए और सार्वजनिक नलों से पानी की बाल्टी भरते हुए चित्रित किया गया है।
  • पारंपरिक रूढ़ियों को तोड़ती बेटियां: संगीत और खेलकूद के अध्यायों में लड़कियों को ढोलक, ड्रम और वायलिन जैसे वाद्ययंत्र बजाते हुए दिखाया गया है, जिन्हें पहले पारंपरिक रूप से लड़कों से जोड़कर देखा जाता था।
  • खेतों और बाजारों में साझा श्रम: कृषि क्षेत्रों और सब्जी मंडियों के दृश्यों में पुरुषों और महिलाओं को एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हुए दिखाया गया है, जिससे बच्चों के मन में श्रम की गरिमा और लैंगिक समानता का भाव पैदा हो सके।

2. शनिवार को ‘नो बैग डे’ (No Bag Day) और व्यावहारिक जीवन कौशल

केवल किताबों तक सीमित न रहकर आंध्र प्रदेश सरकार ने कक्षाओं में व्यावहारिक शिक्षा को जोड़ने का नया मॉडल लागू किया है:

  • फैमिली और एग्रीकल्चरल बजट की सीख: प्राथमिक और उच्च-प्राथमिक स्कूलों में हर शनिवार को ‘नो बैग डे’ मनाया जाता है। इस दिन बच्चे बिना बस्ते के स्कूल आते हैं और उन्हें व्यावहारिक गणित के तहत पारिवारिक बजट (Family Budget) और कृषि बजट (Agricultural Budget) प्रबंधित करना सिखाया जाता है।
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सही ज्ञान: प्राथमिक स्तर पर ही छात्रों को एआई तकनीक के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं से परिचित कराया जा रहा है, ताकि वे तकनीक का जिम्मेदार उपयोग सीख सकें।
  • फील्ड विजिट्स और एक्सपोजर: बच्चों को व्यावहारिक अनुभव देने के लिए स्थानीय खेतों, बैंकों और प्रशासनिक कार्यालयों के भ्रमण पर ले जाया जाता है।

3. मूल्य-आधारित शिक्षा और भावी पीढ़ी का निर्माण

आंध्र प्रदेश के इस शिक्षा मॉडल को देश भर में एक अनुकरणीय उदाहरण माना जा रहा है:

  1. चरणबद्ध पाठ्यक्रम सुधार: मंत्री नारा लोकेश ने स्पष्ट किया कि शिक्षा में बदलाव रातों-रात नहीं आ सकता, इसलिए सरकार ने दो चरणों में ग्रेड-वाइज सुधार किए हैं और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा।
  2. गेमिफाइड क्लासरूम्स (Gamified Classrooms): भविष्य में कक्षाओं को तकनीक और खेलों के माध्यम से और अधिक रोचक बनाने की योजना है।
  3. कम उम्र में सम्मान की सीख: बचपन में पढ़े गए पाठ बच्चे के चरित्र निर्माण की नींव होते हैं। जब बच्चा अपनी किताब में पिता को खाना बनाते और मां को बाहर काम करते देखेगा, तो वह लैंगिक भेदभाव से मुक्त दृष्टिकोण के साथ बड़ा होगा।

निष्कर्ष 

आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा शुरू किया गया यह पाठ्यक्रम सुधार केवल एक किताबी बदलाव नहीं, बल्कि एक नए, समतावादी और प्रगतिशील समाज के निर्माण की दिशा में उठाया गया मील का पत्थर है। किताबों में पुरुषों और महिलाओं की 50-50 भागीदारी दिखाना और शनिवार को व्यावहारिक जीवन कौशल सिखाना यह साबित करता है कि शिक्षा का सही उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है। आंध्र प्रदेश का यह मॉडल देश के अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।

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By Kanchan

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