मद्रास हाईकोर्ट: Zen Trust को FCRA रजिस्ट्रेशन से इनकार बरकरार, धार्मिक स्वरूप का सही खुलासा न करने पर कोर्ट सख्त

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने Kanzeon Public Charitable Trust को विदेशी चंदा प्राप्त करने के लिए FCRA पंजीकरण देने से इनकार करने के केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि FCRA के तहत आवेदन करने वाली संस्था को अपनी वास्तविक प्रकृति का स्पष्ट और सही खुलासा करना जरूरी है। मामले में ट्रस्ट ने खुद को गैर-धार्मिक संगठन बताया था, जबकि अदालत ने उसके Zen Buddhist दर्शन से जुड़े होने के आधार पर उसे धार्मिक श्रेणी में माना।

यह फैसला 6 अक्टूबर 2026 को जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस एम.डी. सुमति की खंडपीठ ने सुनाया।

क्या है पूरा मामला?

Kanzeon Public Charitable Trust की स्थापना 2021 में हुई थी और यह तमिलनाडु के कोडैकानाल में एक Montessori School तथा Zen Meditation Centre चलाता है। ट्रस्ट पहले ही आयकर कानून के तहत 12AB और 80G पंजीकरण हासिल कर चुका था। इसके बाद उसने विदेशी योगदान स्वीकार करने के लिए Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010 यानी FCRA के तहत पंजीकरण मांगा।

ट्रस्ट का आवेदन केंद्र सरकार के FCRA प्राधिकरण ने खारिज कर दिया। इसके खिलाफ ट्रस्ट ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील की थी।

कोर्ट ने आवेदन क्यों सही नहीं माना?

ट्रस्ट की ओर से कहा गया कि उसकी गतिविधियां मुख्य रूप से Zen Meditation से जुड़ी हैं और इन्हें धार्मिक गतिविधियां नहीं माना जाना चाहिए। उसका तर्क था कि ध्यान भारतीय ध्याना परंपरा से जुड़ा अभ्यास है और इसे केवल धार्मिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

वहीं केंद्र सरकार का पक्ष था कि संगठन की गतिविधियों में धार्मिक तत्व मौजूद हैं और FCRA आवेदन में उसकी प्रकृति का सही उल्लेख नहीं किया गया।

अदालत ने FCRA Rules के Form FC-3A का हवाला देते हुए कहा कि आवेदन में संस्था को धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक या सामाजिक श्रेणी में सही ढंग से बताना होता है। धार्मिक संस्था होने की स्थिति में संबंधित धार्मिक वर्गीकरण भी बताना आवश्यक है।

Zen को धार्मिक श्रेणी में क्यों रखा गया?

अदालत ने कहा कि ट्रस्ट स्वयं Zen Buddhist दर्शन को मानने की बात स्वीकार करता है। पीठ ने Zen Buddhism को Mahayana Buddhist परंपरा की एक शाखा माना और इसी आधार पर संगठन को धार्मिक प्रकृति वाला माना।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ट्रस्ट के Zen दर्शन के दावे की सत्यता पर अलग से फैसला नहीं कर रही है। अदालत के अनुसार, ट्रस्ट की अपनी दलीलों के आधार पर ही उसे धार्मिक संगठन की श्रेणी में रखा जा सकता है।

धार्मिक संस्था होने से FCRA के दरवाजे बंद नहीं

अदालत ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। उसने कहा कि धार्मिक संगठन होने मात्र से FCRA के लिए आवेदन करने पर रोक नहीं लगती। समस्या तब पैदा होती है जब आवेदन में संगठन की वास्तविक प्रकृति छिपाई या गलत तरीके से प्रस्तुत की जाए।

अदालत ने कहा कि FCRA आवेदन में पूरी जानकारी और सही वर्गीकरण देना जरूरी है। इसी कारण उसने केंद्र के अस्वीकृति आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

विदेशी चंदा अधिकार है या विशेषाधिकार?

फैसले में अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी संगठन को विदेशी योगदान प्राप्त करने का कोई निहित या पूर्ण अधिकार नहीं है। FCRA पंजीकरण को अधिकतम एक वैधानिक विशेषाधिकार के रूप में देखा जा सकता है।

इसके साथ ही अदालत ने कहा कि FCRA प्राधिकरण को पंजीकरण देने या अस्वीकार करने में पर्याप्त विवेक प्राप्त है। हालांकि, यदि यह विवेक मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया जाए, जरूरी सामग्री पर विचार न किया जाए या निर्णय में दिमाग का इस्तेमाल न दिखे, तो न्यायिक समीक्षा संभव है।

सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थाओं में अंतर

फैसले का एक अहम हिस्सा धार्मिक गतिविधियों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े शैक्षणिक या सांस्कृतिक कार्यों के बीच अंतर को लेकर है।

अदालत ने कहा कि वे संस्थाएं जो वेदांत, भगवद्गीता, उपनिषद, योग और अन्य भारतीय ज्ञान प्रणालियों को व्यवस्थित कक्षाओं, शोध, प्रकाशनों और पाठ्यक्रमों के माध्यम से पढ़ाती हैं, उन्हें स्वतः धार्मिक संस्था नहीं माना जाना चाहिए। ऐसी गतिविधियां शिक्षा या संस्कृति की श्रेणी में आ सकती हैं।

वहीं पूजा और धार्मिक अनुष्ठान जैसी गतिविधियां धार्मिक श्रेणी में आएंगी।

धर्म परिवर्तन को लेकर कोर्ट की टिप्पणी

अदालत ने FCRA की धारा 12(4)(a)(ii) का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक आस्था बदलने के लिए प्रलोभन या बल का इस्तेमाल करने जैसी गतिविधियों से जुड़े संगठन पंजीकरण की शर्तों को पूरा नहीं कर सकते। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रावधान सभी धार्मिक संगठनों पर समान रूप से लागू होता है।

महत्वपूर्ण रूप से, अदालत ने Kanzeon Trust पर धर्म परिवर्तन का कोई आरोप नहीं लगाया। उसने कहा कि मामले में वास्तविक विवाद आवेदन में संगठन की प्रकृति के सही खुलासे का है।

आगे क्या मायने रखता है?

यह फैसला उन गैर-सरकारी संगठनों के लिए महत्वपूर्ण है जो विदेशी योगदान के लिए FCRA पंजीकरण लेना चाहते हैं। आवेदन में संस्था की गतिविधियों, उद्देश्य और धार्मिक या गैर-धार्मिक प्रकृति का स्पष्ट और सुसंगत विवरण देना जरूरी होगा।

साथ ही फैसले ने यह सवाल भी सामने रखा है कि ध्यान, योग, भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक शिक्षा जैसी मिश्रित गतिविधियों को FCRA के तहत किस आधार पर वर्गीकृत किया जाए। आने वाले मामलों में यह अंतर और स्पष्ट हो सकता है।

निष्कर्ष

मद्रास हाईकोर्ट ने Kanzeon Public Charitable Trust को FCRA पंजीकरण देने से इनकार का आदेश बरकरार रखते हुए साफ किया कि विदेशी योगदान पाने के लिए आवेदन में संस्था की वास्तविक प्रकृति का सही खुलासा जरूरी है। अदालत ने धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियों के बीच अंतर पर भी जोर दिया। फैसला यह संकेत देता है कि FCRA के तहत पारदर्शिता और सही वर्गीकरण केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि पंजीकरण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

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द्वारा Kanchan

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