रूपी सोरेन का निधन: हेमंत सोरेन की मां और शिबू सोरेन की पत्नी का 7 अक्टूबर को निधन, जानें उनका राजनीतिक सफर
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक एवं दिवंगत नेता शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन का 7 अक्टूबर 2026 को रांची में निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ थीं और रांची के हिल व्यू अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उनके निधन के बाद सोरेन परिवार, झामुमो कार्यकर्ताओं और झारखंड के राजनीतिक-सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है।
18 सितंबर से अस्पताल में थीं भर्ती
रूपी सोरेन को सांस लेने में परेशानी के बाद 18 सितंबर 2026 को रांची के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके बाद उनकी हालत लगातार गंभीर बनी रही। रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया और अंतिम दिनों में उनकी स्थिति और बिगड़ गई।
7 अक्टूबर की शाम उनके निधन की खबर सामने आई। इसके बाद हेमंत सोरेन ने अपने कई आधिकारिक कार्यक्रम स्थगित कर दिए। परिवार और समर्थक उनके अंतिम दर्शन के लिए रांची स्थित आवास पर पहुंचे।
कौन थीं रूपी सोरेन?
रूपी सोरेन लंबे समय तक झारखंड के राजनीतिक रूप से प्रभावशाली सोरेन परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहीं। वह शिबू सोरेन की पत्नी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां थीं। परिवार के राजनीतिक संघर्ष के लंबे दौर में उन्होंने घर और परिवार की जिम्मेदारियों को संभाला।
शिबू सोरेन जब झारखंड आंदोलन और आदिवासी अधिकारों से जुड़े संघर्षों में सक्रिय थे, उस दौर में रूपी सोरेन ने परिवार को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी वजह से उन्हें सोरेन परिवार की राजनीतिक यात्रा की एक मजबूत पारिवारिक आधारशिला के रूप में भी याद किया जाता है।
1999 में दुमका से लड़ा था चुनाव
रूपी सोरेन की अपनी राजनीतिक यात्रा भी रही है। वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने उन्हें दुमका लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था।
उस समय दुमका बिहार का हिस्सा था और सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी। इस चुनाव में उनका मुकाबला भारतीय जनता पार्टी के बाबूलाल मरांडी से हुआ। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले, जबकि रूपी सोरेन को 1,96,493 वोट मिले। यानी वह महज 4,648 वोट के अंतर से चुनाव हार गई थीं।
यह मुकाबला बेहद करीबी रहा और रूपी सोरेन को कुल वैध मतों का करीब 36 प्रतिशत वोट मिला था।
चुनाव के बाद सक्रिय राजनीति से दूरी
1999 के लोकसभा चुनाव के बाद रूपी सोरेन ने कोई दूसरा लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। इसके बावजूद झामुमो और सोरेन परिवार के भीतर उनकी भूमिका बनी रही।
उनकी पहचान केवल एक राजनीतिक परिवार की सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि परिवार के संघर्ष के दौर में साथ खड़ी रहने वाली महिला के रूप में भी रही। झारखंड आंदोलन के शुरुआती और कठिन वर्षों से जुड़े लोगों के बीच उन्हें लेकर कई व्यक्तिगत और पारिवारिक स्मृतियां सामने आती रही हैं।
शिबू सोरेन के निधन के बाद दूसरा बड़ा सदमा
रूपी सोरेन के निधन से हेमंत सोरेन पर एक साल के भीतर दूसरा बड़ा पारिवारिक आघात पड़ा है। उनके पति और झारखंड के वरिष्ठ नेता शिबू सोरेन का अगस्त 2025 में निधन हुआ था।
शिबू सोरेन के निधन के बाद परिवार के लिए रूपी सोरेन भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण थीं। हेमंत सोरेन ने अपनी मां के निधन के बाद उन्हें अपने जीवन की एक बड़ी भावनात्मक ताकत बताते हुए श्रद्धांजलि दी।
नेमरा में होगा अंतिम संस्कार
रूपी सोरेन का अंतिम संस्कार 8 अक्टूबर 2026 को उनके पैतृक गांव नेमरा में किए जाने की तैयारी है। रिपोर्टों के अनुसार, उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा और इसके बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
नेमरा वही गांव है जो सोरेन परिवार और झारखंड आंदोलन के इतिहास से गहराई से जुड़ा रहा है। यहीं शिबू सोरेन का भी अंतिम संस्कार किया गया था।
झारखंड की राजनीति में याद रहेगी भूमिका
रूपी सोरेन का सार्वजनिक राजनीतिक जीवन भले ही लंबा नहीं रहा, लेकिन झारखंड के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों में से एक के साथ उनका जुड़ाव कई दशकों का रहा। 1999 का दुमका चुनाव उनके राजनीतिक सफर का सबसे प्रमुख अध्याय माना जाता है।
उनका निधन ऐसे समय हुआ है जब झारखंड की राजनीति में सोरेन परिवार अब भी केंद्रीय भूमिका में है। उनके जाने से परिवार ने एक ऐसी सदस्य खो दी है जिसने राजनीतिक उथल-पुथल, संघर्ष और निजी मुश्किलों के बीच दशकों तक परिवार को जोड़े रखा।
निष्कर्ष
रूपी सोरेन का जीवन झारखंड के राजनीतिक इतिहास और सोरेन परिवार की यात्रा से गहराई से जुड़ा रहा। वह शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी, हेमंत सोरेन की मां और खुद एक पूर्व लोकसभा उम्मीदवार थीं। 1999 में दुमका से चुनाव लड़ना उनके राजनीतिक सफर की खास पहचान रहा। अब उनके निधन के बाद झारखंड उन्हें सिर्फ एक बड़े राजनीतिक परिवार की सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि उस दौर की साक्षी के रूप में याद करेगा जब राज्य आंदोलन और राजनीति के बीच सोरेन परिवार ने लंबा संघर्ष किया।

