AI के खतरों पर काल्पनिक डर और अति-उत्साह दोनों से बचें: संयुक्त राष्ट्र की वैज्ञानिक समिति का साक्ष्य-आधारित बहसों पर जोर

ट्यूरिंग पुरस्कार विजेता योशुआ बेंगियो और नोबेल विजेता मारिया रेसा सहित वैज्ञानिकों की चेतावनी; काल्पनिक कयामत (Apocalyptic Scenarios) के बजाय दुष्प्रचार, पूर्वाग्रह और दुरुपयोग पर ध्यान देने का आह्वान।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की बढ़ती क्षमताओं और इसके वैश्विक प्रभावों के बीच संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के तत्वावधान में गठित ‘इंडिपेंडेंट इंटरनेशनल साइंटिफिक पैनल ऑन एआई’ (Independent International Scientific Panel on AI) के शीर्ष वैज्ञानिकों ने एआई सुरक्षा बहस को लेकर एक महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है। 21-22 सितंबर 2026 को न्यू यॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान आयोजित कार्यक्रम में पैनल के विशेषज्ञों ने एआई को लेकर फैलाए जा रहे ‘अत्यधिक उत्साह’ (Exaggerated Optimism) और ‘विनाशकारी दावों’ (Apocalyptic Claims) दोनों को खारिज करते हुए केवल वैज्ञानिक साक्ष्यों (Evidence-based Research) पर आधारित निष्पक्ष चर्चा की वकालत की।

संयुक्त राष्ट्र के ‘ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट’ (Global Digital Compact) के तहत गठित इस अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समिति का मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के लिए काम करने वाली संस्था ‘आईपीसीसी’ (IPCC) की तर्ज पर एआई के अवसरों, जोखिमों और समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का स्वतंत्र व निष्पक्ष वैज्ञानिक मूल्यांकन प्रदान करना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘एआई मानव सभ्यता का अंत कर देगा’ जैसे भयभीत करने वाले दावों या इसे ‘सर्वगुण संपन्न चमत्कार’ बताने वाले तर्कों से हटकर, एआई से वर्तमान में उत्पन्न हो रहे वास्तविक खतरों—जैसे कि डीपफेक, दुष्प्रचार (Misinformation), एल्गोरिदम आधारित पूर्वाग्रह (Algorithmic Bias) और निजता के हनन—पर तत्काल वैश्विक कड़े नियम बनाए जाने चाहिए।

1. ‘डर में निवेश बेकार’: काल्पनिक तबाही बनाम वर्तमान वास्तविक नुकसान

गूगल डीपमाइंड की एक्जीक्यूटिव और वैज्ञानिक समिति की सदस्य जोएल बाराल (Joelle Barral) तथा नोबेल शांति पुरस्कार विजेता पत्रकार मारिया रेसा (Maria Ressa) ने एआई बहसों के सरलीकरण पर चिंता जताई:

  • काल्पनिक कयामत के दावे: हाल के दिनों में एआई डेवलपर्स और पूर्व शोधकर्ताओं द्वारा दावे किए गए थे कि दशक के अंत तक एआई इंसानी जीवन को खतरे में डाल सकता है। इस पर वैज्ञानिकों ने कहा कि “डर के माहौल में निवेश करना और अतिरंजित आख्यान गढ़ना नीति निर्माण में सहायक नहीं है।”
  • वास्तविक और साक्ष्य-आधारित जोखिम: समिति के सह-अध्यक्ष और प्रसिद्ध एआई वैज्ञानिक योशुआ बेंगियो (Yoshua Bengio) ने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिकों को साक्ष्यों के आधार पर जो ज्ञात है और जिसकी केवल भविष्यवाणी की जा रही है, उसमें स्पष्ट अंतर करना होगा। वर्तमान प्राथमिकता गलत सूचनाओं के प्रसार, साइबर हमलों, जैव-हथियारों (Bioweapons) में दुरुपयोग और श्रम बाजार (Labor Market) पर पड़ने वाले प्रभाव को रोकना है।

2. वैश्विक एआई शासन (Global AI Governance) का वैज्ञानिक आधार

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव A/RES/79/325 के तहत स्थापित यह अंतरराष्ट्रीय पैनल दुनिया भर के 5 यूएन क्षेत्रों के स्वतंत्र वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से मिलकर बना है:

  • अंतरराष्ट्रीय नियमों की आवश्यकता: संयुक्त राष्ट्र में पेश की गई प्रारंभिक रिपोर्ट (Preliminary Report) में चेतावनी दी गई है कि मौजूदा सुरक्षा उपाय (Safeguards) एआई की क्षमता वृद्धि की गति का मुकाबला करने में असमर्थ हैं।
  • वैश्विक असमानता को रोकना: रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई का विकास और स्वामित्व कुछ चुनिंदा देशों और टेक कंपनियों के पास केंद्रित है, जिससे वैश्विक स्तर पर डिजिटल और आर्थिक असमानता (Global Inequality) बढ़ रही है।

निष्कर्ष 

संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समिति का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—एआई नीति निर्माण काल्पनिक भय या अत्यधिक विपणन दावों के आधार पर नहीं, बल्कि कठोर वैज्ञानिक साक्ष्यों पर होना चाहिए। समय की मांग है कि वैश्विक समुदाय एआई के दूरगामी काल्पनिक खतरों में उलझने के बजाय आज समाज को प्रभावित कर रहे दुष्प्रचार, पूर्वाग्रह और एआई के दुरुपयोग पर नकेल कसने के लिए एक पारदर्शी, जवाबदेह और अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा तैयार करे।

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द्वारा Kanchan

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