ऑनलाइन बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM ) पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ा रुख: केंद्र सरकार को दिया अंतिम मौका, कहा—”मामला बेहद गंभीर, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की लापरवाही पर बने सख्त SOP”
इलेक्ट्रॉनिक्स और कानून मंत्रालय को अनुपालन रिपोर्ट व विस्तृत एसओपी दाखिल करने का निर्देश; पोक्सो कानून के तहत सोशल मीडिया कंपनियों की कानूनी जवाबदेही तय करने की मांग।
इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन शोषण व उत्पीड़न सामग्री (CSAM / CSEAM) की उपलब्धता और इसके प्रसार को रोकने में सोशल मीडिया कंपनियों की ढिलाई पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने केंद्र सरकार के प्रति गहरा असंतोष व्यक्त किया है। 24 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय को अपना पक्ष और विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का “अंतिम अवसर” प्रदान किया। शीर्ष अदालत ने मामले को “अत्यंत गंभीर” बताते हुए कहा कि केंद्र सरकार यह स्पष्ट करे कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (Intermediaries) की ओर से होने वाली भविष्य की लापरवाहियों को रोकने के लिए क्या निवारक कदम उठाए जा रहे हैं।
यह अदालती कार्रवाई ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ (JRCA) और ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ द्वारा दायर याचिकाओं पर हुई। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि इंस्टाग्राम जैसे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सीएसएएम को बढ़ावा देने वाले पेड विज्ञापन तक चलाए जा रहे हैं और ये कंपनियां सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2024 के ऐतिहासिक फैसले का कड़ाई से पालन नहीं कर रही हैं। सितंबर 2024 के अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि बच्चों से जुड़ी अश्लील व शोषणकारी सामग्री (Child Abuse Material) को बिना डिलीट किए या बिना पुलिस को रिपोर्ट किए स्टोर करना भी पोक्सो अधिनियम (POCSO Act, 2012) के तहत अपराध माना जाएगा। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि ऐसे अपराधों का पता लगाने, डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने और रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए एकसमान मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) अधिसूचित की जाए।
1. अदालत की सख्त टिप्पणी: “एक महीने बाद भी रिपोर्ट न आना निराशाजनक”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार के ढीले रवैये पर नाराजगी जताई:
- 14 अगस्त के आदेश का उल्लंघन: पीठ ने याद दिलाया कि 14 अगस्त 2026 को ही केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया था। लेकिन एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया।
- अंतिम मौका: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) द्वारा मोहलत मांगे जाने पर पीठ ने कहा, “हमारे सामने विचाराधीन विषय अत्यंत गंभीर है। हम दोनों मंत्रालयों को अपनी अनुपालन रिपोर्ट और हलफनामा दाखिल करने का एक अंतिम अवसर देते हैं।”
2. एकसमान एसओपी (SOP) और डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण की आवश्यकता
याचिकाकर्ताओं ने अदालतों और पुलिस तंत्र के सामने आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को रेखांकित किया:
- तकनीकी मध्यस्थों (Intermediaries) की मनमानी: अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स सीएसएएम सामग्री की रिपोर्टिंग और उसे हटाने के लिए अलग-अलग नीतियां अपनाते हैं, जिससे कानूनी कार्रवाई में भ्रम पैदा होता है।
- डिजिटल सबूतों का गायब होना: बिना मानकीकृत एसओपी के डिजिटल साक्ष्य (Electronic Evidence) अक्सर समय पर संरक्षित नहीं हो पाते।
- समन्वित एसओपी की मांग: याचिकाओं में मांग की गई है कि इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय और पुलिस एजेंसियों के बीच एक ऐसी एसओपी बनाई जाए जिससे एआई (AI) और आधुनिक एल्गोरिदम का उपयोग करके सीएसएएम सामग्री को अपलोड होते ही अपने-आप ब्लॉक किया जा सके।
3. पोक्सो (POCSO) कानून और सोशल मीडिया कंपनियों की कानूनी जवाबदेही
शीर्ष अदालत की इस सुनवाई से मध्यस्थों (Social Media Platforms) पर कानूनी शिकंजा कसना तय माना जा रहा है:
- अनिवार्य रिपोर्टिंग का नियम: पोक्सो कानून की धारा 19 और 21 के तहत किसी भी ऐसी सामग्री की जानकारी मिलते ही निकटतम पुलिस स्टेशन या साइबर क्राइम पोर्टल पर रिपोर्ट करना अनिवार्य है।
- सख्त दंडात्मक कार्रवाई: जो टेक कंपनियां या उनके नोडल अधिकारी सीएसएएम की उपस्थिति की जानकारी मिलने के बाद भी इसे नहीं हटाते या रिपोर्ट नहीं करते, उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की गई है।
- भविष्य के निवारक उपाय: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि भविष्य में ऐसी किसी भी चूक को रोकने के लिए मंत्रालयों ने क्या पूर्व-सुरक्षा उपाय (Precautions) तैयार किए हैं।
निष्कर्ष
डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा और ऑनलाइन बाल शोषण का खात्मा केवल नीतिगत चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह एक तात्कालिक और अति-संवेदनशील संवैधानिक दायित्व है। उच्चतम न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को दिया गया यह अंतिम अवसर और एकसमान एसओपी (SOP) बनाने का निर्देश यह स्पष्ट करता है कि व्यापारिक लाभ कमाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बाल अधिकारों के हनन की कीमत पर छूट नहीं दी जा सकती। एक मजबूत कानूनी ढांचे और सख्त एसओपी के माध्यम से ही भारत में इंटरनेट को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाया जा सकता है।


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