OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुरानी भर्तियां और प्रमोशन सुरक्षित, CSE-2025 के सेवा आवंटन पर भी दिया निर्देश

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण और क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने साफ किया है कि क्रीमी लेयर तय करते समय केवल माता-पिता की सैलरी को आधार नहीं बनाया जा सकता, बल्कि उनके पद की श्रेणी और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा। इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि 11 मार्च 2026 से पहले पूरी हो चुकी भर्तियों, नियुक्तियों, वरिष्ठता और पदोन्नतियों को इस फैसले के आधार पर दोबारा नहीं खोला जाएगा।

6 नवंबर 2026 को दिए गए आदेश में अदालत ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा 2025 (CSE-2025) के सफल OBC अभ्यर्थियों के सेवा आवंटन में भी इस फैसले को लागू करने का निर्देश दिया है।

OBC Creamy Layer पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या स्पष्ट किया?

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने 6 नवंबर को केंद्र सरकार की स्पष्टीकरण याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।

अदालत ने कहा कि OBC क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की वेतन आय या कुल आय के आधार पर यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद की श्रेणी, उनकी सामाजिक स्थिति और निर्धारित आय-संपत्ति संबंधी मानदंडों को एक साथ देखना होगा।

यह स्पष्टीकरण विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), बैंकों और निजी कंपनियों में काम करने वाले अभिभावकों के बच्चों के लिए महत्वपूर्ण है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में समान स्तर के पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।

माता-पिता की सैलरी से अकेले तय नहीं होगी क्रीमी लेयर

इस विवाद की जड़ 8 सितंबर 1993 के सरकारी कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) और 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र में थी।

1993 के नियमों के अनुसार, OBC क्रीमी लेयर की पहचान में माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति के साथ आय एवं संपत्ति संबंधी कसौटियां भी शामिल हैं। लेकिन 2004 के स्पष्टीकरण में उन PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की सैलरी को भी अलग से शामिल करने की व्यवस्था की गई थी, जिनके पदों की सरकारी पदों के साथ समानता निर्धारित नहीं हुई थी।

11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि 2004 का स्पष्टीकरण पत्र 1993 के मूल कार्यालय ज्ञापन से ऊपर नहीं हो सकता। वेतन आय को अकेले क्रीमी लेयर निर्धारित करने का आधार बनाना उचित नहीं है।

अदालत के अनुसार, निर्धारित आय-संपत्ति परीक्षण में वेतन और कृषि आय को अन्य स्रोतों की आय के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता। साथ ही अभिभावकों के पद की श्रेणी का परीक्षण भी जरूरी है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चे स्वतः OBC नॉन-क्रीमी लेयर के पात्र हो जाएंगे। उन्हें लागू नियमों की अन्य सभी शर्तें पूरी करनी होंगी।

पुरानी भर्तियों और प्रमोशन पर क्या होगा असर?

6 नवंबर के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पहले से पूरी हो चुकी सरकारी भर्तियों और नियुक्तियों को लेकर है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 11 मार्च 2026 के फैसले को आधार बनाकर पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं, नियुक्तियों, सेवा आवंटन और वरिष्ठता को दोबारा नहीं खोला जाएगा।

इससे उन कर्मचारियों और अभ्यर्थियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे, जिनकी नियुक्तियां और पदोन्नतियां पहले ही लागू नियमों के तहत पूरी हो चुकी हैं।

हालांकि, जिन अभ्यर्थियों के समान प्रकार के दावे किसी अदालत, न्यायाधिकरण या सक्षम प्राधिकरण के सामने पहले से लंबित हैं, उनके मामलों पर अलग-अलग तथ्यों और पात्रता के आधार पर विचार किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 11 मार्च 2026 के बाद होने वाले सभी चयन, नियुक्तियां और आरक्षण रोस्टर के तहत किए जाने वाले आवंटन में 1993 के नियमों की उसी व्याख्या का पालन करना होगा, जिसे मार्च के फैसले में स्पष्ट किया गया था।

CSE-2025 के 958 अभ्यर्थियों के सेवा आवंटन पर निर्देश

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का एक बड़ा असर सिविल सेवा परीक्षा 2025 के सफल OBC अभ्यर्थियों पर पड़ेगा।

UPSC ने CSE-2025 का अंतिम परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित किया था। इसके बाद 11 मार्च को क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। उस समय तक सफल अभ्यर्थियों का सेवा आवंटन अंतिम रूप से पूरा नहीं हुआ था।

केंद्र सरकार ने अदालत से अनुरोध किया था कि 958 सफल अभ्यर्थियों का सेवा आवंटन पहले से लागू क्रीमी लेयर नियमों के आधार पर पूरा करने की अनुमति दी जाए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि सेवा आवंटन की प्रक्रिया अभी लंबित है, इसलिए CSE-2025 के OBC अभ्यर्थियों के लिए भी 11 मार्च के फैसले में निर्धारित क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू होगा।

इससे पात्र नॉन-क्रीमी लेयर अभ्यर्थियों के सेवा आवंटन में संशोधित कानूनी व्याख्या के अनुसार विचार किया जाएगा।

केंद्र सरकार को नीति तैयार करने के लिए क्या निर्देश मिले?

केंद्र सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों और निजी संस्थानों के पदों की सरकारी पदों के साथ समानता निर्धारित करने के लिए दो साल का अतिरिक्त समय मांगा था।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया के लिए कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पदों की समानता तय करना और क्रीमी लेयर से जुड़ी नीति बनाना कार्यपालिका तथा विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

हालांकि, अदालत ने 11 मार्च 2026 के पहले के फैसले के अनुपालन के लिए केंद्र सरकार को दो महीने का अतिरिक्त समय दिया है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण से OBC क्रीमी लेयर निर्धारण की प्रक्रिया में माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति की भूमिका फिर स्पष्ट हुई है। साथ ही पहले से पूरी हो चुकी सरकारी नियुक्तियों और पदोन्नतियों को सुरक्षित रखते हुए CSE-2025 के लंबित सेवा आवंटन का रास्ता भी स्पष्ट किया गया है।

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द्वारा Kanchan

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