CAFE-III Norms 2026: नई कारों की ईंधन दक्षता पर सख्ती, EV और हाइब्रिड को मिलेगा बड़ा फायदा
भारत में यात्री वाहनों की ईंधन दक्षता को लेकर सरकार ने CAFE-III Norms को अधिसूचित कर दिया है। नए नियम 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक लागू रहेंगे। इनका उद्देश्य वाहन कंपनियों के पूरे बेड़े की औसत ईंधन खपत को धीरे-धीरे कम करना है। सरकार के मुताबिक, नए मानकों के तहत पांच वर्षों में ईंधन दक्षता में करीब 16.7 प्रतिशत सुधार का लक्ष्य रखा गया है।
क्या है CAFE-III और क्यों है यह महत्वपूर्ण?
Corporate Average Fuel Economy यानी CAFE किसी एक कार के माइलेज को आधार बनाकर कंपनी का आकलन नहीं करता। इसमें किसी वाहन निर्माता द्वारा बेचे जाने वाले पात्र यात्री वाहनों की बिक्री-भारित औसत ईंधन खपत देखी जाती है। इसका अर्थ है कि कंपनी के बेड़े में ज्यादा ईंधन-कुशल वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ने पर उसका औसत प्रदर्शन बेहतर हो सकता है।
भारत में CAFE व्यवस्था की शुरुआत 2017 में हुई थी। अब CAFE-III मौजूदा व्यवस्था की जगह लेगा और वाहन उद्योग को अगले पांच वर्षों के लिए अपेक्षाकृत स्पष्ट अनुपालन ढांचा देगा।
2027 से हर साल कड़ा होगा ईंधन दक्षता लक्ष्य
सरकार ने CAFE-III के तहत ईंधन खपत का आधार लक्ष्य 2027-28 में 3.996 लीटर प्रति 100 किलोमीटर रखा है। यह लक्ष्य क्रमशः कड़ा होते हुए 2031-32 में 3.3273 लीटर प्रति 100 किलोमीटर तक पहुंच जाएगा।
नए नियमों में वाहन के वजन को भी गणना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। संदर्भ वजन को 1,229 किलोग्राम तय किया गया है। यानी वाहन निर्माता के पूरे बेड़े के औसत वजन के आधार पर उसका निर्धारित ईंधन-खपत लक्ष्य तय होगा। सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था हल्के वाहनों के लिए अपेक्षाकृत नरम और भारी वाहनों के लिए अधिक ईंधन-दक्षता सुधार की दिशा में काम करेगी।
भारी गाड़ियों के बढ़ते चलन पर भी नजर
CAFE-III की चर्चा केवल माइलेज तक सीमित नहीं है। भारत के यात्री वाहन बाजार में बड़ी गाड़ियों और एसयूवी की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ यह सवाल भी उठता रहा है कि वजन आधारित नियम वाहन कंपनियों को छोटे और हल्के वाहनों की जगह बड़े वाहनों की ओर जाने के लिए प्रोत्साहित तो नहीं करेंगे।
अंतिम नियमों में पहले प्रस्तावित 909 किलोग्राम तक की पेट्रोल कारों के लिए अलग 3 ग्राम CO₂ प्रति किलोमीटर की छूट शामिल नहीं की गई है। इसके बजाय वजन का असर व्यापक गणना सूत्र में शामिल किया गया है। इससे छोटी कारों और बड़ी गाड़ियों के बीच नियामकीय संतुलन का मुद्दा आगे भी महत्वपूर्ण रह सकता है।
EV, हाइब्रिड और वैकल्पिक ईंधन को राहत
CAFE-III का एक प्रमुख बदलाव यह है कि केवल पेट्रोल और डीजल इंजन की दक्षता पर निर्भर रहने के बजाय कंपनियों को कई तकनीकी रास्ते दिए गए हैं। बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (BEV), रेंज-एक्सटेंडेड इलेक्ट्रिक वाहन, प्लग-इन हाइब्रिड, मजबूत हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए विशेष मात्रा-आधारित लाभ यानी सुपर-क्रेडिट का प्रावधान किया गया है।
BEV और REEV के लिए 3 का वॉल्यूम डेरोगेशन फैक्टर रखा गया है। इसका मतलब है कि अनुपालन की गणना में ऐसी एक गाड़ी को बिक्री मात्रा के लिहाज से तीन वाहनों के बराबर माना जा सकता है। प्लग-इन और हाइब्रिड वाहनों को भी अलग-अलग स्तर का लाभ मिलेगा।
नियमों में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल, जैव ईंधन और CBG जैसे कम-कार्बन ईंधनों के उपयोग को कार्बन न्यूट्रैलिटी फैक्टर के माध्यम से मान्यता दी गई है। इसके अलावा स्टार्ट-स्टॉप सिस्टम, रीजनरेटिव ब्रेकिंग, बेहतर एयर-कंडीशनिंग और अन्य ऊर्जा-बचत तकनीकों के लिए भी अनुपालन लाभ का प्रावधान है।
क्रेडिट व्यवस्था से कंपनियों को कितनी राहत?
CAFE-III में कंपनियों को हर साल लक्ष्य पूरा करने की बाध्यता को कुछ लचीलापन दिया गया है। बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां क्रेडिट अर्जित कर सकेंगी, जिन्हें निर्धारित नियमों के तहत आगे ले जाया या दूसरी कंपनियों के साथ कारोबार किया जा सकता है। लक्ष्य से पीछे रहने वाली कंपनियां पात्र क्रेडिट खरीदकर अपनी कमी पूरी कर सकती हैं।
हालांकि, यहां एक अहम सवाल भी है। अलग-अलग तकनीकों को मिलने वाले क्रेडिट का पर्यावरणीय लाभ वास्तविक ऊर्जा बचत और उत्सर्जन में कमी से कितना मेल खाता है, इसे पारदर्शी तरीके से देखना जरूरी होगा। खासकर तब, जब टेलपाइप उत्सर्जन और पूरे जीवन-चक्र के उत्सर्जन को एक ही पैमाने पर समझना सही नहीं होता।
आगे क्या होगा?
CAFE-III भारत के वाहन क्षेत्र में ईंधन दक्षता और कम-उत्सर्जन तकनीकों की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण नियामकीय ढांचा है। इसके प्रभाव का आकलन केवल कारों के कागजी परीक्षण आंकड़ों से नहीं, बल्कि वास्तविक सड़कीय परिस्थितियों में ईंधन खपत, वाहन के बढ़ते वजन, इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों की हिस्सेदारी तथा ईंधन की कुल मांग के आधार पर करना होगा।
आने वाले वर्षों में चुनौती यह होगी कि सख्त और अनुमानित लक्ष्य, तकनीकी तटस्थता, वास्तविक ईंधन बचत और उपभोक्ताओं के लिए किफायती वाहन, इन सभी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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