‘वंदे मातरम’ न गाने पर आपराधिक कार्रवाई नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, कहा—’धार्मिक और अंतरात्मा की स्वतंत्रता का हो सम्मान’

कर्नाटक संगीत गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका पर नोटिस जारी; शीर्ष अदालत ने 1986 के ऐतिहासिक ‘बिजो इमैनुएल’ फैसले का दिया हवाला।

धार्मिक कारणों से वंदे मातरम न गाने वाले व्यक्ति पर कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए': सुप्रीम कोर्ट | Johar LIVE

 

सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों (Stanzas) को गाने की अनिवार्यता और ऐसा न करने पर आपराधिक दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। 22-23 सितंबर 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI Surya Kant), जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने प्रसिद्ध कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगीत गाने से सम्मानपूर्वक परहेज करने वाले व्यक्ति को आपराधिक परिणामों का सामना नहीं करना चाहिए।

यह विवाद ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026’ और गृह मंत्रालय द्वारा जारी उन निर्देशों से जुड़ा है, जिनके तहत सार्वजनिक व शासकीय समारोहों में ‘वंदे मातरम’ के पूरे 6 छंदों को गाना अनिवार्य किया गया है और इसमें बाधा डालने या न गाने पर सजा का प्रावधान है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि गीत के पहले दो छंदों के बाद अंतिम 4 छंदों में हिंदू देवियों (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) का धार्मिक आह्वान है। गैर-हिंदू या अन्य धार्मिक आस्था वाले नागरिकों को इसे गाने के लिए मजबूर करना संविधान के अनुच्छेद 25(1) (अंतरात्मा की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।

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1. ‘बिजो इमैनुएल’ (1986) फैसले का उदाहरण: सम्मानपूर्वक मौन रहना अपराध नहीं

पीठ के सदस्य जस्टिस जोयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान वर्ष 1986 के प्रसिद्ध ‘बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ मामले का उल्लेख किया:

  • 1986 का ऐतिहासिक नजीर: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘जेहोवा के साक्षी’ (Jehovah’s Witnesses) संप्रदाय के स्कूली बच्चों को राष्ट्रगान न गाने पर राहत दी थी, क्योंकि उनके धार्मिक विश्वासों में केवल ईश्वर की स्तुति की अनुमति थी। कोर्ट ने माना था कि राष्ट्रगान के दौरान आदरपूर्वक खड़े रहना ही पर्याप्त है।
  • संविधान का दायरा: अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि सरकार यह तय कर सकती है कि राष्ट्रगीत की लंबाई क्या होगी या उसमें कितने छंद होंगे, लेकिन यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।

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2. धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रगीत के प्रोटोकॉल पर तीखी बहस

अदालत में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली:

  • सरकार का रुख: सॉलिसिटर जनरल ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रगीत का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती।
  • पीठ की स्पष्टता: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत राष्ट्रगीत के रूप में ‘वंदे मातरम’ के ऐतिहासिक महत्व या राष्ट्रीय भावनाओं पर कोई सवाल नहीं उठा रही है। अदालत केवल इस कानूनी प्रश्न का परीक्षण करेगी कि क्या धार्मिक आधार पर आपत्ति जताने वाले व्यक्ति पर दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

निष्कर्ष 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। यह सुनवाई भारत में राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान और नागरिक के मौलिक अधिकारों (विशेषकर अंतरात्मा व धार्मिक स्वतंत्रता) के बीच संतुलन साधने के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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By Kanchan

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