‘संकट में पहली कतार, फैसले में सबसे पीछे’: 81वें यूएन सम्मेलन में एस. जयशंकर का वैश्विक संस्थाओं पर बड़ा प्रहार, विकासशील देशों की उठाई आवाज
न्यू यॉर्क में समान विचारधारा वाले ग्लोबल साउथ देशों की उच्चस्तरीय बैठक को संबोधित किया; खाद्य, ऊर्जा, एआई और संयुक्त राष्ट्र सुधारों पर रखा 7-सूत्रीय एजेंडा।
भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र (81st UNGA Session) के दौरान आयोजित ‘लाइक-माइंडेड ग्लोबल साउथ कंट्रीज एंड फ्रेंड्स’ (Like-Minded Global South Countries and Friends) की उच्चस्तरीय मंत्रिस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए वैश्विक व्यवस्था के दोहरे मापदंडों पर जोरदार हमला बोला। 22 सितंबर 2026 को न्यू यॉर्क में आयोजित इस बैठक में जयशंकर ने कहा कि जब भी कोई वैश्विक संकट, युद्ध या आर्थिक उथल-पुथल आती है, तो विकासशील देश (Global South) ‘पहली कतार’ (Front Row) में खड़े होकर सबसे बड़ा नुकसान सहते हैं, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय फैसले लेने की बात आती है, तो उन्हें ‘पिछली कतार’ (Back Row) में धकेल दिया जाता है।
जयशंकर ने रेखांकित किया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित वैश्विक संस्थाएं (जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद – UNSC) पुराने शक्ति संतुलन का प्रतिनिधित्व करती हैं और आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से पूरी तरह कट चुकी हैं। जलवायु संकट, वैश्विक संघर्षों, खाद्य-ईंधन की महंगाई और कर्ज के बोझ से सबसे ज्यादा प्रभावित होने के बावजूद विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इस विषमता को दूर करने के लिए भारत के विदेश मंत्री ने ग्लोबल साउथ की एकजुटता का आह्वान करते हुए एक 7-सूत्रीय कार्ययोजना (7-Point Agenda) प्रस्तुत की।
1. ग्लोबल साउथ की अधिकारिता के लिए 7-सूत्रीय एजेंडा
विदेश मंत्री ने विकासशील देशों के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने के लिए निम्नलिखित 7 प्रमुख प्राथमिकताओं को रेखांकित किया:
- आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावट रोकना: वित्त, कनेक्टिविटी और सप्लाई चेन में किसी एक देश के आधिपत्य या रुकावट (Choke Points) को रोकना और डी-रिस्किंग को बढ़ावा देना।
- ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा: राजनीतिक उद्देश्यों के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों में हेरफेर को रोकना।
- खाद्य सुरक्षा मजबूत करना: खाद्यान्न और उर्वरक (Grains & Fertilisers) की सुगम आपूर्ति सुनिश्चित करना।
- निष्पक्ष व्यापार पद्धतियां: अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक नीतियों में पारदर्शिता व निष्पक्षता लागू करना।
- समुद्री सुरक्षा (Maritime Commons): वाणिज्यिक जहाजरानी और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- एआई (AI) का जिम्मेदार उपयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रसार से नई डिजिटल असमानताएं पैदा न होने देना।
- वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में सुधार: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय निकायों में ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व को बढ़ाना।
2. सुधारित बहुपक्षवाद (Reformed Multilateralism) और भारत का नेतृत्व
भारत लगातार विकासशील देशों की आवाज बुलंद करता रहा है और उन्हें एक साझा मंच प्रदान कर रहा है:
- वैश्विक संस्थानों में सुधार की तत्काल आवश्यकता: जयशंकर ने स्पष्ट किया कि वर्तमान बहुपक्षीय प्रणाली बढ़ते वैश्विक तनावों और आर्थिक अस्थिरता को संभालने में विफल साबित हो रही है।
- जी-20 से यूएन तक भारत की वकालत: भारत ने जी-20 में अफ्रीकी संघ (African Union) को स्थायी सदस्यता दिलाने से लेकर ‘वॉइस ऑफ ग्लोबल साउथ’ शिखर सम्मेलनों के जरिए हमेशा विकासशील दुनिया के हितों को वैश्विक प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा है।
निष्कर्ष
विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह संबोधन केवल एक कूटनीतिक भाषण नहीं, बल्कि 21वीं सदी के पुनर्संतुलित (Rebalanced) विश्व की एक सशक्त हुंकार है। जब तक अंतरराष्ट्रीय निर्णय लेने वाली संस्थाएं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद विकासशील देशों को उनका न्यायसंगत अधिकार और प्रतिनिधित्व नहीं देतीं, तब तक दुनिया में स्थायी शांति, सुरक्षा और समावेशी विकास की कल्पना अधूरी रहेगी।
