आक्रामक लोन बांटने की पुरानी गलतियों से बचें बैंक: पीएम के प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा की चेतावनी, कहा—’उत्साह नहीं, प्रोजेक्ट का अर्थशास्त्र देखकर दें कर्ज’
एसबीआई बैंकिंग कॉन्क्लेव में बैंकों को सतर्क रहने की सलाह; बैंकिंग बैलेंस शीट में सुधार के बावजूद एनपीए (NPA) संकट से बचने पर दिया जोर।
भारतीय बैंकिंग प्रणाली की बैलेंस शीट में आए ऐतिहासिक सुधार और एसेट क्वालिटी (Asset Quality) में रिकॉर्ड मजबूती के बीच केंद्र सरकार ने बैंकों को अत्यधिक और आक्रामक लोन (Aggressive Lending) बांटने के प्रति आगाह किया है। एसबीआई बैंकिंग एंड इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा (Dr. P.K. Mishra) ने कहा कि बैंक क्षणिक उत्साह या बाजार की होड़ में आकर क्रेडिट असेसमेंट (Credit Appraisal) के मानकों को कमजोर न होने दें। उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्ज देने का फैसला केवल परियोजना के वास्तविक अर्थशास्त्र (Project Economics) पर आधारित होना चाहिए।
यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब भारत के सार्वजनिक और निजी बैंकों का एनपीए (गैर-निष्पादित संपत्ति) निचले स्तर पर है और लोन की मांग में तेजी देखी जा रही है। हालांकि, अतीत का अनुभव बताता है कि 2008-2014 के दौर में जब अर्थव्यवस्था में तेजी आई थी, तब बैंकों द्वारा अंधाधुंध और आक्रामक तरीके से बांटे गए कॉरपोरेट लोन बाद में भारी बैड लोन (Bad Loans) और ‘स्ट्रेस्ड एसेट्स’ में बदल गए थे। सरकार चाहती है कि वर्तमान आर्थिक मजबूती के दौर में बैंक उस इतिहास को न दोहराएं।
1. ‘उत्साह नहीं, प्रोजेक्ट की उपयोगिता देखकर दें लोन’
प्रधान सचिव ने बैंकों की क्रेडिट रेटिंग और प्रोजेक्ट मूल्यांकन प्रक्रिया को सख्त बनाए रखने पर जोर दिया:
- परियोजना आधारित मूल्यांकन: डॉ. पी.के. मिश्रा ने कहा, “क्रेडिट का मूल्यांकन उस समय के उत्साह के बजाय परियोजना के वास्तविक अर्थशास्त्र के आधार पर किया जाना चाहिए।” इससे अत्यधिक लोन बांटने और भविष्य में तनावग्रस्त संपत्ति बनने के जोखिम को रोका जा सकेगा।
- केवल बैंक भरोसे नहीं चलेगी अर्थव्यवस्था: उन्होंने रेखांकित किया कि बुनियादी ढांचे (Infrastructure), विनिर्माण (Manufacturing) और ऊर्जा बदलाव (Energy Transition) के लिए केवल बैंकिंग क्षेत्र अकेला पर्याप्त नहीं है। भारत को गहरे बांड बाजार (Bond Markets), शेयर बाजार और संस्थागत निवेशकों को विकसित करना होगा।
2. वैश्विक अनिश्चितता, पूंजी प्रवाह और आरबीआई का सतर्क रुख
बैंकिंग प्रणाली में तरलता (Liquidity) बढ़ने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी बैंकों को लोन प्राइस वॉर (Loan Price War) से बचने की सलाह दी है:
- सस्ती तरलता का जोखिम: जब बैंकों के पास जमा राशि (Deposits) बढ़ती है, तो लोन बांटने की होड़ मच जाती है, जिससे कमजोर क्रेडिट प्रोफ़ाइल वाले उधारकर्ताओं को भी आसानी से लोन मिल जाता है। यह बाद में ‘स्टिकी एसेट्स’ बन जाते हैं।
- विदेशी पूंजी की अस्थिरता: प्रधान सचिव ने चेतावनी दी कि वैश्विक स्तर पर व्यापारिक बाधाओं (Trade Barriers) और पूंजी प्रवाह की अनिश्चितता को देखते हुए भारत को दीर्घकालिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और घरेलू विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने की जरूरत है।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का यह संदेश भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक सामयिक और रणनीतिक चेतावनी है। वर्तमान में बैंकों की स्थिति भले ही मजबूत हो, लेकिन आर्थिक चक्र की अनिश्चितताओं को देखते हुए विवेकपूर्ण और पारदर्शी ऋण आवंटन ही भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक स्थिरता और विकास को सुनिश्चित कर सकता है।

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