‘अलग विचार और असहमति स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा’: चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों की खबरों को किया खारिज, कहा—सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए
विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) पर मीडिया रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग का आधिकारिक प्रेस नोट; कहा- अनुच्छेद 324 के तहत बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में काम करता है आयोग।
चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को लेकर आंतरिक मतभेदों और औपचारिक आपत्तियों की मीडिया रिपोर्टों पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने स्थिति स्पष्ट की है। 23 सितंबर 2026 को जारी एक आधिकारिक प्रेस नोट में चुनाव आयोग ने कहा कि एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में निर्णय लेने से पहले अलग-अलग विचारों, लिखित टिप्पणियों और तकनीकी सुझावों का आना एक सामान्य और स्वस्थ प्रशासनिक विचार-विमर्श प्रक्रिया का हिस्सा है।
मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि पिछले 10 महीनों के दौरान दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी) ने मतदाता सूची संशोधन और नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े कुछ फैसलों पर लिखित रूप से आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई वाले चुनाव आयोग ने कहा कि कुछ चुनिंदा आंतरिक टिप्पणियों को उजागर कर पूरी तस्वीर को एकांगी रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि आयोग द्वारा लिए गए सभी अंतिम निर्णय और 40 से अधिक नए चुनावी सुधार सर्वसम्मति (Unanimously) से लागू किए गए हैं।
1. अनुच्छेद 324 और बहु-सदस्यीय संस्था के रूप में आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था (Checks and Balances)
चुनाव आयोग ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में संस्थागत मर्यादाओं और संवैधानिक ढांचे का हवाला दिया:
- संवैधानिक जनादेश: आयोग संविधान के अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों और 2023 के मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम के तहत एक बहु-सदस्यीय संस्था के रूप में काम करता है।
- अधिकारियों और आयुक्तों की स्वतंत्रता: आयोग ने स्पष्ट किया कि न केवल तीनों आयुक्त, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी चुनावी व्यवस्था में सुधार और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अपने स्वतंत्र सुझाव देने के लिए पूरी तरह अधिकृत है।
- पारदर्शिता और कानूनी वैधता: ड्राफ्ट स्तर पर पूछे गए सवाल और लिखित नोट्स पारदर्शिता व कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित प्रशासनिक अभ्यास हैं, जिन्हें ‘आंतरिक कलह’ या ‘असंतोष’ के रूप में देखना गलत है।
2. ‘एकतरफा तस्वीर पेश करने की कोशिश’: आयोग ने दिए आंकड़ों के तर्क
चुनाव आयोग ने मीडिया रिपोर्टों के संदर्भ पर सवाल उठाते हुए कहा कि 10 महीने के दौर में तैयार किए गए कुछ चुनिंदा आंतरिक नोट्स पर ध्यान केंद्रित करना भ्रामक है:
- सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय: पिछले एक साल के दौरान मतदाता सूची के राष्ट्रव्यापी पुनरीक्षण (SIR), फॉर्म 6 में संशोधन और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (ECINet / ERONET) के संचालन से जुड़े सभी निर्णय पूर्ण आयोग (Full Commission) द्वारा सर्वसम्मति से मंजूर किए गए थे।
- डिजिटल सुरक्षा और डेटा प्रोटोकॉल: आयोग ने यह भी आश्वासन दिया कि उसके सभी डिजिटल नेटवर्क और वोटर डेटाबेस कड़े सुरक्षा मानकों के तहत काम करते हैं और उनमें अनधिकृत छेड़छाड़ की कोई गुंजाइश नहीं है।
निष्कर्ष
चुनाव आयोग का यह स्पष्टीकरण भारतीय लोकतंत्र की इस सबसे महत्वपूर्ण संस्था की साख और कार्यप्रणाली में जन-विश्वास बनाए रखने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय में विचार-विमर्श की विविधता और असहमति के स्वरों को दबाने के बजाय उन्हें संस्थागत मजबूती का आधार मानना ही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक ताकत को दर्शाता है।

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