गोडावण संरक्षण में बड़ी कामयाबी, पहली बार जंगल में छोड़े गए कैप्टिव-ब्रेड दो पक्षी

नई दिल्ली: भारत के सबसे गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) यानी गोडावण के संरक्षण अभियान ने एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल किया है। 4 अक्टूबर 2026 को राजस्थान के जैसलमेर स्थित डेजर्ट नेशनल पार्क में पहली बार कैद में पाले गए दो नर गोडावणों को जंगल में छोड़ा गया। इसे देश के गोडावण संरक्षण कार्यक्रम में कैद प्रजनन से आगे बढ़कर पुनःप्राकृतिककरण (री-वाइल्डिंग) की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

यह पहल करीब एक दशक से चल रहे संरक्षण प्रयासों का परिणाम है। हालांकि, विशेषज्ञों के लिए असली चुनौती अब शुरू होती है, क्योंकि केवल पक्षियों को जंगल में छोड़ना पर्याप्त नहीं है। उनके प्राकृतिक आवास, भोजन, प्रजनन क्षेत्र और बिजली की लाइनों जैसे खतरों से सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी होगा।

पहली बार कैद में पले गोडावण जंगल में लौटे

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 4 अक्टूबर को जैसलमेर के सम क्षेत्र में दो नर गोडावणों को प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा। दोनों पक्षियों को राजस्थान के संरक्षण प्रजनन केंद्रों में तैयार किया गया था।

सरकार के अनुसार, यह कदम ग्रेट इंडियन बस्टर्ड रिकवरी प्रोग्राम के उस चरण को दर्शाता है जिसमें संरक्षण के लिए कैद में तैयार की गई आबादी को धीरे-धीरे उनके प्राकृतिक आवास में वापस लाने की कोशिश की जा रही है।

इससे पहले पक्षियों को सीधे जंगल में छोड़ने के बजाय नियंत्रित वातावरण में प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाया गया। इसका उद्देश्य यह देखना है कि कैद में पले पक्षी प्राकृतिक वातावरण में किस तरह व्यवहार करते हैं और किन परिस्थितियों में उनके जीवित रहने की संभावना अधिक होती है।

एक दशक की मेहनत के बाद यहां पहुंचा प्रोजेक्ट

गोडावण संरक्षण कार्यक्रम में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राजस्थान वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) सहित कई संस्थाएं शामिल हैं।

जैसलमेर के सम और रामदेवरा स्थित संरक्षण प्रजनन केंद्रों में अब कुल 97 गोडावण मौजूद हैं। इनमें 40 पक्षी जंगल से एकत्र किए गए अंडों से विकसित हुए, जबकि 57 कैद में पाले गए हैं। इनमें से 86 पक्षियों को प्रजनन कार्यक्रम के लिए रखा गया है और 11 को जंगल में छोड़ने के लिए चिन्हित किया गया है।

2025 में इन केंद्रों में 24 जीवित चूजे और 2026 में 29 चूजे पैदा हुए। इससे कैद प्रजनन कार्यक्रम में बढ़ती सफलता का संकेत मिलता है।

जंगल में छोड़ना ही पर्याप्त नहीं

गोडावण को जंगल में वापस लाने की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्राकृतिक आवास कितना सुरक्षित है। यह पक्षी मुख्य रूप से खुले घास के मैदानों और शुष्क क्षेत्रों पर निर्भर करता है। ऐसे आवासों का सिकुड़ना इसकी संख्या में गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण रहा है।

राजस्थान वन विभाग ने डेजर्ट नेशनल पार्क में करीब 200 वर्ग किलोमीटर के घासभूमि क्षेत्रों को बाड़ से सुरक्षित किया है। लंबे समय के रेडियो और उपग्रह आधारित अध्ययन में इन क्षेत्रों को गोडावण के प्रमुख प्रजनन आवास के रूप में पहचाना गया है।

इसलिए कैद प्रजनन के साथ-साथ घासभूमि संरक्षण और आवास पुनर्स्थापना इस परियोजना की सफलता के लिए जरूरी है।

बिजली की तारें बनी हुई हैं बड़ा खतरा

गोडावण के सामने सबसे गंभीर मानवीय खतरों में से एक ऊंची बिजली की तारों से टकराव है। भारी शरीर और अपेक्षाकृत कम ऊंचाई पर उड़ने की प्रवृत्ति के कारण यह पक्षी बिजली की लाइनों से टकराने के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी गोडावण के संरक्षण से जुड़े मामले में संवेदनशील क्षेत्रों में बिजली की लाइनों से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए उपायों पर जोर दिया है। इसका मतलब है कि संरक्षण नीति को केवल वन्यजीव विभाग की सीमा में नहीं देखा जा सकता। ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और भूमि उपयोग से जुड़े फैसलों को भी इसमें शामिल करना होगा।

‘जंपस्टार्ट’ से प्राकृतिक प्रजनन को बढ़ावा

गोडावण परियोजना में वैज्ञानिकों ने ‘जंपस्टार्ट’ नाम की एक तकनीक भी अपनाई है। इसमें कैद में दिए गए अंडों को जंगली घोंसलों में रखा जाता है और यदि प्राकृतिक मादा उन्हें स्वीकार कर लेती है तो उनसे चूजे निकलते हैं।

राजस्थान में इस प्रक्रिया से छह और गुजरात में दो चूजों के निकलने की जानकारी सरकार ने दी है। इससे कैद और प्राकृतिक आबादी के बीच संरक्षण संबंध मजबूत करने की संभावना बढ़ी है।

अब संरक्षण का अगला चरण सबसे महत्वपूर्ण

दो गोडावणों को जंगल में छोड़ना निश्चित रूप से ऐतिहासिक उपलब्धि है, लेकिन इसे प्रजाति की वापसी की अंतिम सफलता नहीं माना जा सकता। अब इन पक्षियों की गतिविधियों, भोजन, आवास, प्रजनन व्यवहार और जीवित रहने की क्षमता पर लगातार निगरानी करनी होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतीकात्मक संरक्षण से आगे बढ़कर आवास आधारित संरक्षण को प्राथमिकता मिले। यदि घासभूमियां सुरक्षित नहीं रहेंगी, बिजली की तारों का खतरा कम नहीं होगा और मानवीय गतिविधियों का दबाव नियंत्रित नहीं किया जाएगा, तो केवल कैद प्रजनन से गोडावण की जंगली आबादी को स्थायी रूप से बढ़ाना मुश्किल होगा।

भारत के लिए इस पहल की वास्तविक सफलता तब होगी, जब गोडावण को बचाने के लिए बनाए गए संरक्षण केंद्रों से निकलकर यह पक्षी फिर से राजस्थान और देश के अन्य उपयुक्त प्राकृतिक क्षेत्रों में स्वतंत्र और टिकाऊ आबादी स्थापित कर सके।

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By Kanchan

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