51A(h) विचार की स्वतंत्रता पर प्रतीकवाद का साया: उच्च शिक्षा में ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ बनाम अत्यधिक केंद्रीय नियंत्रण; क्यों जरूरी है अकादमिक स्वायत्तता ?

संविधान का अनुच्छेद 51A(h) देता है प्रश्न पूछने की आजादी; सहकर्मी समीक्षा (Peer Review), असहमति का सम्मान और पारदर्शी नियुक्तियां ही बचा सकती हैं विश्वविद्यालयों की साख।

देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में अकादमिक स्वतंत्रता (Academic Freedom), संस्थागत स्वायत्तता और विचार-विमर्श के घटते स्थान को लेकर शिक्षाविदों और कानूनी विशेषज्ञों ने एक गंभीर चेतावनी जारी की है। हालिया संपादकीय विश्लेषणों में यह रेखांकित किया गया है कि विश्वविद्यालयों में अनुभववाद (Empiricism), तर्कसंगतता और वैज्ञानिक अनुसंधान की जगह कर्मकांडीय राजनीतिक और धार्मिक प्रतीकात्मकता (Ritualised Symbolism), अत्यधिक केंद्रीय नियंत्रण और असहमति के डर ने ले ली है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रवृत्ति को समय रहते नहीं रोका गया, तो भारत के उच्च शिक्षण संस्थान विश्व स्तरीय ज्ञान सृजन की दौड़ में पीछे छूट जाएंगे।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A(h) प्रत्येक नागरिक के लिए यह मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duty) निर्धारित करता है कि वह “वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper), मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे।” विश्वविद्यालय केवल डिग्रियां बांटने के कारखाने नहीं हैं, बल्कि वे असत्यनीयता (Falsifiability), सहकर्मी समीक्षा (Peer Review), खुली आलोचना और स्वतंत्र सोच पर टिके होते हैं। जब औपचारिक या वैचारिक अनुपालन (Ceremonial Conformity) का असर कुलपतियों की नियुक्तियों, पाठ्यक्रम निर्माण, शोध अनुदानों (Grants) और अनुमत अनुसंधान के विषयों पर पड़ने लगता है, तो यह शिक्षा प्रणाली के लिए विनाशकारी सिद्ध होता है।

1. अकादमिक स्वतंत्रता बनाम स्वायत्तता का हनन: क्या हैं मुख्य चिंताएं?

संपादकीय में उच्च शिक्षा के समक्ष चार प्रमुख संरचनात्मक संकटों को चिह्नित किया गया है:

  • वैज्ञानिक सोच का क्षरण: तर्क और साक्ष्य-आधारित निष्कर्षों की जगह अंध-निष्ठा और पौराणिक दावों को प्राथमिकता दिए जाने से वास्तविक वैज्ञानिक अनुसंधान प्रभावित हो रहा है।
  • अत्यधिक केंद्रीय नियमन (Central Regulation): यूजीसी (UGC) जैसे केंद्रीय निकायों द्वारा न्यूनतम गुणवत्ता सुनिश्चित करने के नाम पर अत्यधिक हस्तक्षेप करने से विश्वविद्यालयों की स्थानीय और वैचारिक स्वायत्तता समाप्त हो रही है।
  • आत्म-सेंसरशिप और भय का माहौल: संकाय सदस्यों और शोधकर्ताओं में असहमति जताने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई, अनुदान रोके जाने या पदोन्नति न मिलने का डर व्याप्त हो रहा है, जिससे ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ की प्रवृत्ति बढ़ी है।
  • शिक्षकों का तदर्थीकरण (Casualisation): स्थायी नियुक्तियों के बजाय संविदा (Contractual) आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति से अकादमिक निडरता कमज़ोर हुई है।

2. संवैधानिक नैतिकता और अकादमिक स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ

विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, अकादमिक स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से बचना नहीं है:

सिद्धांत (Core Principle) पारंपरिक अर्थ (Traditional View) वर्तमान आवश्यकता (Need of the Hour)
अकादमिक स्वतंत्रता (Academic Freedom) केवल मानकों से छूट या विशेषाधिकार उत्तरदायी विद्वतापूर्ण प्रक्रियाओं के माध्यम से साक्ष्य-आधारित निष्कर्षों को खोजना व साझा करना
संस्थागत स्वायत्तता (Institutional Autonomy) प्रशासनिक मनमानी राजनीतिक और वैचारिक हस्तक्षेप से मुक्त होकर स्वतंत्र पठन-पाठन का माहौल तैयार करना
वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) केवल विज्ञान विषयों की पढ़ाई जीवन के हर क्षेत्र में प्रश्न पूछने, जांचने और साक्ष्य के आधार पर निर्णय लेने की आदत
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) नियमों का अक्षरस: पालन विविधता, असहमति और तर्कसंगत विमर्श की रक्षा करने वाले मूल्यों का सम्मान

3. आगे की राह (Way Forward): कैसे बहाल हो विश्वविद्यालयों की साख?

शिक्षाविदों ने विश्वविद्यालयों को पुनः तर्क और ज्ञान का केंद्र बनाने के लिए निम्नलिखित ठोस सुझाव दिए हैं:

  1. पारदर्शी और सहकर्मी-आधारित नियुक्तियां (Peer-led Appointments): कुलपतियों और प्रोफेसरों के पदों पर नियुक्तियां राजनीतिक निष्ठा के बजाय केवल शैक्षणिक योग्यता और पारदर्शी सहकर्मी समीक्षा से हों।
  2. अनुसंधान अनुदान में निष्पक्षता: शोध के लिए सरकारी या गैर-सरकारी अनुदान (Grants) बिना किसी वैचारिक पूर्वाग्रह के केवल विषय की प्रासंगिकता और वैज्ञानिक गुणवत्ता पर दिए जाएं।
  3. असहमति और शोध नैतिकता का संरक्षण: शोधकर्ताओं को बिना किसी खौफ के अपने साक्ष्य-आधारित निष्कर्षों को प्रकाशित करने की स्वतंत्रता मिले।
  4. परिणाम-आधारित मूल्यांकन (Outcome-based Evaluation): विश्वविद्यालयों की रैंकिंग और मूल्यांकन उनके द्वारा किए गए वास्तविक अनुसंधान, सीखने के परिणामों (Learning Outcomes) और सामाजिक योगदान पर हो, न कि प्रतीकात्मक आयोजनों से।
  5. प्रतीकात्मकता को स्वैच्छिक रखना: धार्मिक या राजनीतिक आयोजनों को पूरी तरह स्वैच्छिक रखा जाए और उन्हें अकादमिक मूल्यांकन का हिस्सा न बनाया जाए।

निष्कर्ष 

रवींद्रनाथ टैगोर के ‘जहाँ चित्त भय से शून्य हो’ (Where the Mind is Without Fear) के सपने को साकार करने के लिए भारतीय विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक सोच की वापसी अनिवार्य है। केंद्रीय नियमन का दायरा केवल मानक तय करने तक सीमित होना चाहिए, न कि वैचारिक संरेखण थोपने तक। जब तक हमारे उच्च शिक्षण संस्थान भयमुक्त माहौल में प्रश्न पूछने और साक्ष्य तलाशने की आजादी नहीं देंगे, तब तक 21वीं सदी के भारत के लिए नवाचार और वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा।

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By Kanchan

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