समान नागरिक संहिता (UCC): क्या सिर्फ़ “एकरूपता” से मिलेगी महिलाओं को बराबरी? राज्यों की बहस का विश्लेषण
समान नागरिक संहिता (UCC) पर देश में बहस अब राज्य स्तर पर पहुँच गई है। एक तरफ़ सरकारें इसे महिलाओं को बराबर अधिकार देने वाला क़दम बता रही हैं, तो दूसरी तरफ़ आलोचकों का तर्क है कि केवल सबके लिए एक जैसा क़ानून बना देने से असमानता ख़त्म नहीं होती। उनका कहना है कि जब तक संहिता महिलाओं की संपत्ति, भरण-पोषण और देखभाल से जुड़े अधिकारों को सभी समुदायों में ठोस सुरक्षा न दे, तब तक एकरूपता पुरानी असमानता को ही नए रूप में दोहरा सकती है।
राज्यों में UCC कहाँ तक पहुँची?
उत्तराखंड में यह क़ानून 27 जनवरी 2025 से लागू है। गुजरात, असम (27 मई 2026) और मध्य प्रदेश (21 जुलाई 2026) की विधानसभाओं ने भी इससे जुड़े विधेयक पारित किए हैं। सितंबर 2026 तक इन तीनों के राष्ट्रपति की मंज़ूरी के इंतज़ार में होने की बात कही गई है, यानी ये अभी लागू नहीं हुए। गोवा में पुरानी नागरिक संहिता पहले से चली आ रही है।
सरकारों और समर्थकों की दलील
समर्थकों का कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना को पूरा करता है। उनके अनुसार इन क़ानूनों में बेटे और बेटियों को बराबर विरासत, सभी धर्मों में समान भरण-पोषण प्रावधान, विवाह और तलाक़ का अनिवार्य पंजीकरण तथा बहुविवाह, तीन तलाक़ और हलाला पर रोक शामिल है। गुजरात के मुख्यमंत्री ने इन प्रावधानों को महिलाओं की क़ानूनी सुरक्षा मज़बूत करने वाला बताया है। उत्तराखंड सरकार का दावा है कि वहाँ विवाह पंजीकरण की लगभग पूरी प्रक्रिया अब ऑनलाइन हो गई है।
आलोचना का मूल तर्क क्या है?
महिला संगठनों और क़ानूनी विश्लेषकों का तर्क है कि “सबके लिए एक जैसा” और “सबके लिए न्यायसंगत” एक बात नहीं है। उनकी चिंताएँ मोटे तौर पर चार जगह केंद्रित हैं।
1. संपत्ति और वसीयत
आलोचकों के अनुसार उत्तराखंड जैसे ढाँचे में पैतृक (सहदायिक) और अन्य संपत्ति का फ़र्क़ हटाकर वसीयत से संपत्ति बाँटने की खुली छूट दे दी गई है। इससे बेटियों को पैतृक संयुक्त परिवार की संपत्ति में मिले सीमित संरक्षण के कमज़ोर पड़ने का ख़तरा बताया गया है। असम के विधेयक पर यह भी कहा गया कि पति-पत्नी और बच्चों के लिए वसीयत की एक-तिहाई सीमा जैसे प्रावधान, जो पूरी तरह वंचित किए जाने से बचाते थे, हटा दिए गए। विरासत की बराबरी काग़ज़ पर दिखे, पर वसीयत की असीमित आज़ादी उसे कमज़ोर कर सकती है, यह इस तर्क का सार है।
2. वैवाहिक संपत्ति और अवैतनिक देखभाल
सबसे बड़ा सवाल यह उठाया गया है कि क़ानून विवाह के भीतर आर्थिक असमानता को नहीं पहचानता। महिलाओं का अवैतनिक घरेलू और देखभाल का श्रम, जिसमें बच्चों, बुज़ुर्गों और बीमारों की देखभाल शामिल है, वैवाहिक संपत्ति की किसी व्यवस्था में गिना नहीं जाता। आलोचकों के अनुसार कुछ समान प्रावधान वैवाहिक संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार पुरुष जीवनसाथी को देते हैं, जो समानता की भावना से मेल नहीं खाता।
3. भरण-पोषण और तलाक के बाद आर्थिक सुरक्षा
माँग की जा रही है कि तलाक़ के समय आर्थिक सुरक्षा, समान संरक्षकता और गोद लेने के अधिकार, बिना दोष तलाक़ के साथ महिलाओं के लिए सुरक्षा उपाय, और पारिवारिक क़ानून में न्याय तक वास्तविक पहुँच सुनिश्चित की जाए। समर्थक पलटकर कहते हैं कि क़ानूनों में भरण-पोषण के प्रावधान पहले से मौजूद हैं, जिनमें लिव-इन में छोड़ी गई महिलाओं को भी भरण-पोषण शामिल है।
4. लिव-इन पंजीकरण और निगरानी
उत्तराखंड के क़ानून में लिव-इन संबंध का एक महीने में पंजीकरण अनिवार्य है और न कराने पर सज़ा का प्रावधान है। गुजरात, असम और मध्य प्रदेश के विधेयकों में भी ऐसे प्रावधान बताए गए हैं। मध्य प्रदेश के विधेयक के अनुसार अगर कोई साथी 21 वर्ष से कम हो तो अभिभावकों को सूचित किया जाएगा और रिकॉर्ड पुलिस से साझा होगा। आलोचकों का कहना है कि यह निजता के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में राज्य का दख़ल है और महिलाओं के जीवन पर निगरानी बढ़ाता है।
जनजातीय छूट और “एकरूपता” का सवाल
मध्य प्रदेश, असम और उत्तराखंड, तीनों में अनुसूचित जनजातियों को दायरे से बाहर रखा गया है। सरकारों का तर्क है कि इससे उनकी परंपराओं की रक्षा होती है। आलोचक पूछते हैं कि अगर एकरूपता का मक़सद महिलाओं को बराबरी है, तो जनजातीय महिलाओं के अधिकार इससे बाहर क्यों रहें, जबकि वे अदालतों में अपने विरासत के हक़ के लिए लड़ती रही हैं। इससे संहिता की “समानता” अधूरी रह जाती है।
विधि आयोग का सुझाव
2018 की विधि आयोग की रिपोर्ट ने सुझाव दिया था कि समुदायों के बीच बराबरी से पहले हर समुदाय के भीतर महिला-पुरुष की बराबरी सुनिश्चित करनी चाहिए, और इसके लिए व्यक्तिगत क़ानूनों में सुधार को UCC से बेहतर माना था। आलोचक इसी का हवाला देकर कहते हैं कि सुधार की कसौटी एकरूपता नहीं, महिलाओं को मिलने वाला वास्तविक संरक्षण होनी चाहिए।
राजनीतिक और संवैधानिक बहस
विपक्ष, ख़ासकर कांग्रेस, का तर्क है कि राज्य स्तर पर यह क़ानून जल्दबाज़ी है और संविधान के अनुच्छेद 29 में दिए सांस्कृतिक अधिकारों से टकरा सकता है। उसने मध्य प्रदेश में विधेयक को प्रवर समिति में भेजने की माँग की थी, जिसे सरकार ने ठुकरा दिया। मुख्यमंत्री का कहना है कि UCC का मूल भाव समानता और सम्मान है और जनजातियों को छूट देकर उनकी परंपराओं का ध्यान रखा गया है।
आगे की राह
बहस का केंद्र अब यह बनता जा रहा है कि क़ानून कितना “एक जैसा” है, यह सवाल जितना अहम है, उतना ही यह कि वह किसके लिए, किस क़ीमत पर और किस सुरक्षा के साथ बराबरी लाता है। सरकारों के सामने चुनौती है कि विरासत की बराबरी के साथ वैवाहिक संपत्ति, अवैतनिक देखभाल की क़ीमत और तलाक़ के बाद आर्थिक सुरक्षा जैसे प्रावधानों को भी ठोस रूप दें। राष्ट्रपति की मंज़ूरी और अदालती जाँच के साथ आने वाले महीनों में इन प्रश्नों पर और स्पष्टता आएगी।
(डिस्क्लेमर: यह लेख विश्लेषण के उद्देश्य से है। इसमें आलोचना और समर्थन, दोनों पक्षों की दलीलें रखी गई हैं और कोई क़ानूनी सलाह नहीं है।)

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