हिमालय का संकट: भारत की 21.5% GDP जिस पारिस्थितिकी पर टिकी है, वह तेज़ी से खतरे में

एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत की करीब 21.5% GDP यानी 64.8 लाख करोड़ रुपये हिमालय की पारिस्थितिकी सेवाओं पर निर्भर है। जानें ग्लेशियर पिघलने, ब्लैक कार्बन और आगे की राह से जुड़ी पूरी जानकारी।

हिमालय को अक्सर सिर्फ एक पर्वत श्रृंखला या पर्यटन स्थल के तौर पर देखा जाता है, लेकिन एक ताजा रिपोर्ट ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था का करीब पांचवां हिस्सा, यानी लगभग 64.8 लाख करोड़ रुपये या वित्त वर्ष 2024 की कुल GDP का 21.5 प्रतिशत हिस्सा, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हिमालय की पारिस्थितिकी सेवाओं पर निर्भर करता है। यह आंकड़ा सिर्फ पहाड़ी राज्यों की अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नीचे के मैदानी इलाकों में पानी पर निर्भर खेती-किसानी, उद्योग और इससे जुड़े पूरे सप्लाई-चेन असर को भी शामिल किया गया है।

तीन बड़ी नदी प्रणालियां, करोड़ों लोगों का जीवन

सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र, ये तीनों बड़ी नदी प्रणालियां सीधे हिमालय से निकलती हैं और देशभर में खेती, शहरों की पानी आपूर्ति, उद्योग-धंधों और जलविद्युत उत्पादन को सहारा देती हैं। दिलचस्प बात यह है कि हिमालय भारत के कुल भूभाग का महज़ लगभग 18 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है, लेकिन इसी रिपोर्ट के मुताबिक देश में आने वाली कुल आपदाओं में से करीब 35 प्रतिशत इसी क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं। यानी छोटा-सा दिखने वाला यह भूभाग जितना संसाधन देता है, उतना ही जोखिम भी झेलता है। एक चिंताजनक पहलू यह भी सामने आया है कि इतनी बड़ी आर्थिक कीमत पैदा करने के बावजूद पहाड़ी राज्यों के हाथ में इस प्राकृतिक संपदा से बनने वाले कुल आर्थिक मूल्य का महज़ करीब 5 प्रतिशत हिस्सा ही रह पाता है, बाकी फायदा मैदानी और दूसरे राज्यों तक पहुंच जाता है।

ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार में बड़ी तेज़ी

रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता की बात यह बताई गई है कि हिमालयी ग्लेशियर अब एक दशक पहले के मुकाबले करीब 65 प्रतिशत ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं, और यह क्षेत्र धीरे-धीरे एक “टिपिंग प्वाइंट” यानी ऐसे मोड़ के करीब पहुंच रहा है, जहां से हालात संभालना मुश्किल हो सकता है। इसे समझने के लिए “पीक वाटर” शब्द का इस्तेमाल किया जाता है — यह वह बिंदु है जब ग्लेशियर से निकलने वाला पानी अपने अधिकतम स्तर पर पहुंचता है, और उसके बाद बर्फ के भंडार घटने के साथ नदियों में पानी की मात्रा लगातार कम होने लगती है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र सदी के अंत यानी 2100 तक अपने मौजूदा ग्लेशियर आयतन का करीब 80 प्रतिशत तक खो सकता है, जबकि पीक वाटर की स्थिति इस सदी के मध्य के आसपास ही आ सकती है।

ब्लैक कार्बन बन रहा है छुपा हुआ खतरा

रिपोर्ट में एक और अहम पहलू सामने रखा गया है — ब्लैक कार्बन यानी कालिख जैसे कणों का असर। यह बर्फ की सतह को काला कर देता है, जिससे बर्फ सूरज की रोशनी को परावर्तित करने के बजाय सोखने लगती है और तेजी से पिघलने लगती है। अनुमान है कि दक्षिण एशिया से निकलने वाला ब्लैक कार्बन हिमालयी ग्लेशियरों में होने वाले कुल बर्फ नुकसान का करीब एक-तिहाई हिस्सा अकेले पैदा कर रहा है। यह कालिख मुख्य रूप से पुराने ढंग की ईंट भट्टियों, चूल्हों, वाहनों के धुएं और खेतों में फसल जलाने जैसी गतिविधियों से निकलती है। राहत की बात यह है कि साफ-सुथरी तकनीक वाली ईंट भट्टियां अपनाने से कालिख और ईंधन की खपत, दोनों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

21.5% का मतलब क्या है, क्या नहीं

यह समझना जरूरी है कि 21.5 प्रतिशत का यह आंकड़ा किसी भविष्यवाणी की तरह नहीं है कि हिमालय के संकट में आते ही इतनी GDP पूरी तरह खत्म हो जाएगी। यह असल में एक परिदृश्य-आधारित निर्भरता का अनुमान है, यानी यह बताता है कि आज की तारीख में कितनी आर्थिक गतिविधि हिमालय से मिलने वाले पानी और संसाधनों से जुड़ी हुई है। यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वत विकास केंद्र (ICIMOD, नेपाल) और जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट, उत्तराखंड के सहयोग से तैयार की गई है।

आगे का रास्ता क्या है

विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है कि भारत नदी-बेसिन स्तर पर अनुकूलन योजना बनाए, ग्लेशियरों की लगातार वैज्ञानिक निगरानी करे और ऐसा मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करे जो आपदाओं का सामना कर सके। साथ ही ईंट भट्टियों, चूल्हों, परिवहन और फसल जलाने से निकलने वाले ब्लैक कार्बन पर सख्त नियंत्रण जरूरी है। यह भी सुझाव दिया गया है कि सार्वजनिक वित्त व्यवस्था में भविष्य में आने वाले आपदा और जल-संकट के जोखिमों को पहले से ही कीमत के तौर पर शामिल किया जाना चाहिए, ताकि नीति-निर्माण में इसे नजरअंदाज न किया जा सके। हाल ही में नेपाल में हिमखंड-चट्टान खिसकने से आई बाढ़ ने भी इस चेतावनी को और पुख्ता कर दिया है कि हिमालय अब इंतजार करने की स्थिति में नहीं है।

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द्वारा Kanchan

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