एआई और डीपफेक के दौर में ‘पर्सनालिटी राइट्स’: चेहरा, आवाज और पहचान की चोरी पर अदालतों का कड़ा प्रहार, जानें अपने अधिकार

बिना विशेष कानून के भी भारतीय अदालतें दे रहीं ऐतिहासिक सुरक्षा आदेश; अभिनेताओं, खिलाड़ियों और उद्योगपतियों के व्यक्तित्व अधिकारों की रक्षा के लिए ‘जॉन डो’ (अशोक कुमार) आदेश लागू।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), वॉयस क्लोनिंग (Voice Cloning) और डीपफेक (Deepfake) तकनीक के इस आधुनिक दौर में किसी भी व्यक्ति की आवाज, चेहरा, नाम और उसके हाव-भाव की नकल करना बेहद आसान हो गया है। बिना अनुमति किसी की पहचान का व्यावसायिक उपयोग करने के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारत में ‘पर्सनालिटी राइट्स’ (Personality Rights – व्यक्तित्व अधिकार) की बहस तेज हो गई है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) और बॉम्बे उच्च न्यायालय ने फिल्म अभिनेताओं, प्रमुख क्रिकेटरों, पत्रकारों और उद्योगपतियों की याचिका पर त्वरित सुनवाई करते हुए बिना सहमति एआई के माध्यम से उनकी पहचान का दुरुपयोग करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के ऐतिहासिक अंतरिम आदेश जारी किए हैं।

भारत में वर्तमान में ‘पर्सनालिटी राइट्स’ या ‘राइट ऑफ पब्लिसिटी’ (प्रचार का अधिकार) के लिए कोई अलग से विशेष अधिनियम (Statute) लागू नहीं है। इसके बावजूद, भारतीय न्यायपालिका संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 (निजता व गरिमा का अधिकार), कॉपीराइट अधिनियम 1957, ट्रेडमार्क अधिनियम 1999 और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम 2021/2026 के प्रावधानों को मिलाकर एक मजबूत कानूनी सुरक्षा कवच तैयार कर रही है। अदालतें अब इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म्स, ई-कॉमर्स कंपनियों और अज्ञात उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ तत्काल सामग्री हटाने (Dynamic Takedown) और ‘अशोक कुमार आदेश’ (John Doe Orders) जारी कर रही हैं।

1. क्या हैं ‘पर्सनालिटी राइट्स’ (व्यक्तित्व अधिकार)?

पर्सनालिटी राइट्स किसी भी व्यक्ति—विशेषकर सार्वजनिक हस्तियों (Public Figures) और प्रसिद्ध व्यक्तियों—को अपनी व्यक्तिगत पहचान के व्यावसायिक दुरुपयोग को रोकने का कानूनी अधिकार देते हैं:

  • पहचान के घटक: इसमें किसी व्यक्ति का नाम, तस्वीर, चेहरा, आवाज, सिग्नेचर डायलॉग, शारीरिक हाव-भाव और व्यक्तित्व की विशिष्ट शैली शामिल हैं।
  • व्यावसायिक शोषण पर रोक: यदि कोई कंपनी, ब्रांड या डिजिटल क्रिएटर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की अनुमति के बिना उसके नाम या छवि का उपयोग अपने उत्पाद, विज्ञापन या एआई-जनरेटेड वीडियो में करके वित्तीय लाभ कमाता है, तो यह उसके व्यक्तित्व अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है।
  • निजता और प्रतिष्ठा की सुरक्षा: यह अधिकार न केवल वित्तीय नुकसान से बचाता है, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक साख, गरिमा और निजता की भी रक्षा करता है।

2. एआई और डीपफेक का खतरा: अदालतों के हालिया ऐतिहासिक फैसले

2025 और 2026 के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने एआई दुरुपयोग से जुड़े मामलों में कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं:

  1. सिनेमा व खेल जगत के दिग्गजों को राहत: अदालत ने दिग्गज अभिनेताओं (जैसे तबू, सोनाक्षी सिन्हा, राकेश बेदी), क्रिकेटरों (युवराज सिंह, अभिषेक शर्मा) और व्यवसायी डॉ. संजीव गोयनका की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए गूगल, मेटा, एक्स (ट्विटर) और रेडिट जैसी टेक कंपनियों को एआई डीपफेक, फर्जी वॉयस क्लोन और सिंथेटिक विज्ञापनों को तुरंत हटाने का आदेश दिया।
  2. अज्ञात उल्लंघनकर्ताओं पर ‘जॉन डो’ (John Doe) आदेश: एआई के इस दौर में फर्जी सामग्री बनाने वाले अज्ञात लोगों (अनलिमिटेड अज्ञात प्रतिवादियों) के खिलाफ अदालतें ‘अशोक कुमार आदेश’ जारी कर रही हैं, जिससे पुलिस और टेक प्लेटफॉर्म्स को बिना नाम जाने भी अवैध सामग्री को तुरंत ब्लॉक करने का अधिकार मिलता है।
  3. आईटी नियम 2026 की भूमिका: नए आईटी दिशानिर्देशों के तहत, अदालती आदेश मिलने के 3 घंटे के भीतर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को डीपफेक और फर्जी पहचान वाली सामग्री हटानी अनिवार्य कर दी गई है।

3. आम नागरिकों के लिए चुनौतियां और कानून की आवश्यकता

यद्यपि प्रसिद्ध हस्तियों को अदालत से त्वरित राहत मिल रही है, लेकिन आम नागरिकों के लिए स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है:

  • संसाधनों की कमी: एक आम नागरिक के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर करना और खर्चीली कानूनी प्रक्रिया से गुजरना आसान नहीं होता।
  • संसदीय कानून की मांग: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में अमेरिका और यूरोपीय संघ की तर्ज पर एक समर्पित ‘पर्सनालिटी राइट्स एंड डीपफेक प्रोटेक्शन एक्ट’ बनाने की सख्त आवश्यकता है।
  • साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत: एक आम नागरिक अपनी सहमति के बिना बनाई गई एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरों या वीडियो की शिकायत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (1930) और संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के शिकायत अधिकारी (Grievance Officer) से दर्ज करा सकता है।

निष्कर्ष 

‘पर्सनालिटी राइट्स’ डिजिटल युग में व्यक्ति की पहचान, मेहनत और सम्मान की सुरक्षा का एक अनिवार्य कानूनी स्तंभ बन चुके हैं। एआई और डीपफेक जैसी नई तकनीकों के आगमन ने जहां एक ओर रचनात्मकता के नए द्वार खोले हैं, वहीं दूसरी ओर डिजिटल पहचान की चोरी के अभूतपूर्व खतरे पैदा कर दिए हैं। जब तक संसद इस विषय पर कोई कड़ा कानून नहीं बनाती, तब तक भारतीय अदालतें निजता और बौद्धिक संपदा अधिकारों के माध्यम से नागरिकों की पहचान की रक्षा करने में एक सुरक्षा ढाल की भूमिका निभाती रहेंगी।

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द्वारा Kanchan

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