छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व में कैमरे में कैद हुई दुर्लभ ‘ब्लैक पैंथर’ की तस्वीर

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में स्थित अचानकमार टाइगर रिजर्व में एक बार फिर दुर्लभ काले तेंदुए (ब्लैक पैंथर) की तस्वीर कैमरा ट्रैप में कैद हुई है। जानें इस दुर्लभ प्रजाति और रिजर्व से जुड़ी पूरी जानकारी।

छत्तीसगढ़ के वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक बार फिर खुशखबरी सामने आई है। बिलासपुर जिले में स्थित अचानकमार टाइगर रिजर्व (ATR) में बाघों की गिनती के लिए लगाए गए कैमरा ट्रैप में एक दुर्लभ ब्लैक पैंथर यानी काले तेंदुए की तस्वीर कैद हुई है। रिजर्व प्रबंधन ने इस बात की पुष्टि करते हुए इसे वन विभाग के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है। छत्तीसगढ़ के वन मंत्री केदार कश्यप ने खुद यह तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा करते हुए इसे राज्य के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक बड़ी कामयाबी करार दिया।

क्या होता है ब्लैक पैंथर

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ब्लैक पैंथर कोई अलग जीव-प्रजाति नहीं है, बल्कि यह आम तेंदुए (Panthera pardus) का ही एक रंग-रूप है। जिस तरह एक ही गाय अलग-अलग रंगों के बछड़ों को जन्म दे सकती है, ठीक उसी तरह जब किसी तेंदुए में एक खास जीन (मेलेनिन से जुड़ा) सक्रिय हो जाता है, तो उसका रंग पूरी तरह काला या बेहद गहरा हो जाता है। ऐसे तेंदुओं को वैज्ञानिक भाषा में “मेलानिस्टिक लेपर्ड” कहा जाता है, जबकि आम बोलचाल में इन्हें ब्लैक पैंथर के नाम से जाना जाता है। यह शब्द कभी-कभी मेलानिस्टिक जगुआर पर भी लागू होता है। भारत में इनका दिखना बेहद दुर्लभ माना जाता है, और आमतौर पर ये घने जंगलों में छिपकर रहना पसंद करते हैं, जिस वजह से इन्हें अक्सर “जंगल का भूत” भी कहा जाता है।

अचानकमार में यह कोई पहली बार नहीं

गौर करने वाली बात यह है कि अचानकमार टाइगर रिजर्व में ब्लैक पैंथर का दिखना बिल्कुल नया वाकया नहीं है। रिजर्व अधिकारियों के मुताबिक यहां सबसे पहले 2011 में एक शावक के रूप में ब्लैक पैंथर की मौजूदगी दर्ज की गई थी। इसके बाद 2018 में हुई अखिल भारतीय बाघ गणना के दौरान भी कैमरा ट्रैप में इसकी झलक मिली थी, और 2020 में करीब सात साल के अंतराल के बाद फिर से इसकी तस्वीरें सामने आईं, जब रिजर्व के तत्कालीन उप निदेशक ने बताया था कि लंबे इंतजार के बाद पहली बार काला तेंदुआ फिर से नजर आया है। यानी यह जानवर समय-समय पर रिजर्व के घने जंगलों में कैमरों की पकड़ में आता रहा है, जिससे वन अधिकारियों को यह भरोसा है कि इलाके में इसकी एक स्थायी मौजूदगी बनी हुई है।

बाघों की भी अच्छी संख्या

दिलचस्प बात यह है कि जिस इलाके में यह ब्लैक पैंथर देखा गया, वहीं बाघों की गिनती में भी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज हुई है। रिजर्व प्रबंधन के मुताबिक अचानकमार में फिलहाल करीब दस बाघ मौजूद हैं। हाल के वर्षों में मध्य भारत के जंगली गलियारों के जरिए बाघों की आवाजाही से इस रिजर्व को खासा फायदा मिला है — मिसाल के तौर पर मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ से लापता हुई एक बाघिन कुछ साल बाद अचानकमार के जंगलों में शावकों के साथ कैमरे में कैद हुई थी, जो यह दिखाता है कि यह रिजर्व मध्य भारत के बड़े टाइगर कॉरिडोर का एक अहम हिस्सा बन चुका है।

अचानकमार टाइगर रिजर्व के बारे में

बिलासपुर जिले में स्थित यह रिजर्व साल 1975 में वन्यजीव अभयारण्य के रूप में स्थापित हुआ था, और 2009 में इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला। यह अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा है और कान्हा तथा बांधवगढ़ जैसे बड़े टाइगर रिजर्व के बीच एक अहम गलियारे का काम करता है, जो बाघों के प्राकृतिक आवागमन में बड़ी भूमिका निभाता है। रिजर्व के कोर इलाके में करीब 25 वन ग्राम बसे हैं, जिनमें से करीब 75 प्रतिशत आबादी बैगा जनजाति की है — जो एक विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) के तौर पर वर्गीकृत है। इसके अलावा भारत में कर्नाटक के काबिनी, डंडेली, भद्रा और शरावती जैसे वन्यजीव क्षेत्र भी काले तेंदुओं के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अब छत्तीसगढ़ का अचानकमार भी इस सूची में मजबूती से अपनी जगह बना चुका है।

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द्वारा Kanchan

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