भारत की तीन अमूल्य धरोहरों को UNESCO की मान्यता: महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी की पांडुलिपियाँ एशिया-प्रशांत स्मृति रजिस्टर में दर्ज
भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ा सम्मान मिला है। यूनेस्को ने महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और कल्हण की राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को अपने ‘विश्व स्मृति’ (मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड) के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल कर लिया है। इन तीनों के जुड़ने के बाद इस रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियाँ छह हो गई हैं।
UNESCO Memory of the World: कब और कहाँ हुआ फैसला
रिपोर्टों के अनुसार यह फैसला इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर के 11वें सत्र में लिया गया। इसकी घोषणा 5 नवंबर 2026 को की गई। विदेश मंत्रालय ने इसे देश के “कालजयी ज्ञान को मिली वैश्विक मान्यता” बताया है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि यह भारत की ऐतिहासिक स्मृति, धर्म की समझ और राजकाज की समृद्ध परंपरा की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति है।
कौन-सी पांडुलिपियाँ हुईं शामिल
महाभारत: मान्यता प्राप्त पांडुलिपि भोजपत्र (भूर्जपत्र) पर लिखी गई महाभारत की प्रति है। यह विश्व के सबसे बड़े महाकाव्यों में गिना जाता है, जिसमें कथा, दर्शन, नीति और धर्म की गहरी चर्चा मिलती है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र: इसे ताड़पत्र पर लिखी प्राचीन पांडुलिपि के रूप में दर्ज किया गया है। यह ग्रंथ राज्य संचालन, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और नेतृत्व के सिद्धांतों का अनूठा संग्रह माना जाता है।
कल्हण की राजतरंगिणी: संस्कृत में लिखा यह ऐतिहासिक ग्रंथ कश्मीर के राजाओं का क्रमबद्ध वृत्तांत देता है। इसे 12वीं सदी के कश्मीर की झलक दिखाने वाली अनमोल ऐतिहासिक रचना माना जाता है, और भारत में इतिहास-लेखन की एक महत्वपूर्ण परंपरा का उदाहरण भी।
कुछ रिपोर्टों में पुणे के भंडारकर प्राच्य शोध संस्थान, मैसूरु के प्राच्य शोध संस्थान और श्रीनगर में सुरक्षित प्रतियों का ज़िक्र है। इन प्रतियों के संरक्षक संस्थानों की आधिकारिक सूची जारी होने पर तस्वीर और साफ होगी।
भारत की अब तक की प्रविष्टियाँ
इन तीन के जुड़ने से पहले इस क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की तीन प्रविष्टियाँ थीं: रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयालोक-लोचन। अब यह संख्या बढ़कर छह हो गई है।
‘विश्व स्मृति’ कार्यक्रम क्या है
यूनेस्को ने यह कार्यक्रम 1992 में शुरू किया था। इसका उद्देश्य दुनिया की महत्वपूर्ण दस्तावेज़ी धरोहरों, जैसे पांडुलिपियों, पुस्तकालयों के संग्रह, अभिलेखों और श्रव्य-दृश्य सामग्री, को सुरक्षित रखना और उनकी जानकारी सबतक पहुँचाना है।
इसके तीन स्तर होते हैं: अंतरराष्ट्रीय रजिस्टर, क्षेत्रीय रजिस्टर और राष्ट्रीय रजिस्टर। एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में उन धरोहरों को जगह मिलती है, जो इस क्षेत्र की साझा स्मृति और इतिहास के लिए विशेष महत्व रखती हैं। ध्यान रहे कि यह अंतरराष्ट्रीय रजिस्टर से अलग है, इसलिए यह मान्यता क्षेत्रीय स्तर की है।
इस मान्यता का महत्व
इस सम्मान से इन पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और शोध को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। साथ ही दुनिया भर के विद्वानों और विद्यार्थियों का ध्यान भारत की प्राचीन लेखन परंपरा की ओर जाएगा। नई पीढ़ी के लिए यह खबर अपनी जड़ों से जुड़ने का एक अवसर भी है, क्योंकि जिन ग्रंथों को हम कथाओं और पाठ्यपुस्तकों में पढ़ते हैं, उनकी मूल हस्तलिखित प्रतियाँ आज वैश्विक विरासत का दर्जा पा रही हैं।

