Starlink भारत में क्यों नहीं? एलन मस्क ने “कुछ oligarchs” पर लगाया रोकने का आरोप, सरकार ने बताया “निराधार”
अरबपति कारोबारी एलन मस्क ने भारत में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा Starlink की एंट्री में देरी के लिए “कुछ oligarchs” यानी चंद शक्तिशाली कारोबारियों को जिम्मेदार ठहराया है। बुधवार, 7 अक्टूबर 2026 को एक्स पर किए गए पोस्ट के बाद गुरुवार को दूरसंचार मंत्रालय ने इन आरोपों को “निराधार और भ्रामक” बताया। मस्क ने किसी का नाम नहीं लिया, पर रिपोर्टों में इसे मुकेश अंबानी और सुनील भारती मित्तल की ओर इशारा माना जा रहा है।
मस्क ने क्या कहा?
मस्क ने एक्स पर लिखा कि Starlink को कुछ ओलिगार्क्स द्वारा रोका जा रहा है, ताकि वे भारतीय लोगों पर अपनी एकाधिकार जैसी पकड़ बनाए रख सकें। उन्होंने लिखा कि “आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं” और इसे “भारत के लोगों के खिलाफ अपराध” बताया। उन्होंने न किसी व्यक्ति का नाम लिया, न कोई सबूत दिया।
यह पोस्ट नई दिल्ली में इंडिया मोबाइल कांग्रेस की शुरुआत के दिन आई। मस्क ने जिस पोस्ट का जवाब दिया, उसमें दावा था कि मई 2026 तक भारत के 11,256 सूचीबद्ध गांवों में 4G कवरेज नहीं था। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मस्क ने यह भी कहा कि भारत के ऊपर Starlink की बीम बंद हैं, इसलिए यह दावा गलत है कि किसी भी उग्रवादी ने इसका इस्तेमाल किया।
Starlink का पक्ष
कुछ घंटे पहले ही SpaceX की Starlink बिजनेस ऑपरेशंस की उपाध्यक्ष लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कहा था कि कंपनी भारत में सेवा शुरू करने को तैयार है। उन्होंने बताया कि कंपनी ने भारत में 20 से ज्यादा गेटवे साइट बनाई हैं, जिनमें सैकड़ों एंटीना हैं। कंपनी का दावा है कि सुरक्षा जरूरतों के अनुसार हर स्तर पर नियंत्रण रखा गया है और भारतीय यूजर्स का डेटा भारत में ही रहेगा। उनके अनुसार Starlink के पास IN-SPACe की अनुमति और GMPCS लाइसेंस है, जबकि सुरक्षा मंजूरी और विदेशी निवेश (FDI) की मंजूरी का इंतजार है। कंपनी ने एयरटेल और जियो के साथ भी साझेदारी की बात कही है।
सरकार का जवाब
संचार मंत्रालय ने गुरुवार को बयान जारी कर कहा कि सैटेलाइट समेत सभी दूरसंचार सेवाओं के लिए अनुमति की प्रक्रिया “निष्पक्ष और भेदभाव-रहित” है। मंत्रालय के अनुसार:
- सुरक्षा मूल्यांकन प्रक्रिया का हिस्सा है और तीनों लाइसेंसधारकों के लिए जारी है।
- यह पूरा होने के बाद कंपनियां स्पेक्ट्रम आवंटन के अगले चरण में जाएंगी।
- तीनों कंपनियां लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं।
- किसी एक ऑपरेटर को तरजीह देना इस ढांचे के अनुरूप नहीं होगा।
तीन आवेदक हैं: स्टारलिंक, भारती समूह समर्थित यूटेलसैट वनवेब और रिलायंस समर्थित जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस। तीनों को लाइसेंस मिल चुके हैं, पर वाणिज्यिक लॉन्च सरकार की मंजूरी और सुरक्षा क्लीयरेंस पर निर्भर है। रिपोर्टों के अनुसार दूरसंचार विभाग ने समायोजित सकल राजस्व (AGR) का 5 प्रतिशत स्पेक्ट्रम शुल्क मंजूर किया है, जिस पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी बाकी है। भारत यह भी आश्वासन चाहता है कि आपात स्थिति में सैटेलाइट सिस्टम पर उसका नियंत्रण रहे।
बाजार की तस्वीर
रिलायंस जियो और भारती एयरटेल मिलाकर लगभग 91 करोड़ ब्रॉडबैंड ग्राहकों को सेवा देते हैं। जियो अपना खुद का लो-अर्थ-ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट नेटवर्क भी बना रहा है, जो Starlink और अमेज़न लियो जैसी वैश्विक कंपनियों से मुकाबला करेगा। अमेज़न लियो भी भारत में प्रवेश की तैयारी में है।
“Oligarch” शब्द का मतलब
“ओलिगार्क” वह शख्स होता है जो चंद अमीर और ताकतवर लोगों के उस छोटे समूह का हिस्सा हो, जिनका किसी बाजार या सत्ता पर बड़ा प्रभाव माना जाता है। यह शब्द खासकर 1990 के दशक के रूस में चर्चित हुआ। भारत के संदर्भ में मस्क का इस्तेमाल एक आरोप है, किसी जांच का निष्कर्ष नहीं।
Starlink क्या है और यह भारत के लिए क्यों अहम है?
Starlink धरती से कुछ सौ किलोमीटर ऊपर घूमते हजारों उपग्रहों के जरिए इंटरनेट देता है। इसमें यूजर को एक छोटा एंटीना (टर्मिनल) लगाना होता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि दूर-दराज, पहाड़ी या ग्रामीण इलाकों में भी कनेक्टिविटी मिल सकती है, जहां फाइबर या मोबाइल टावर पहुंचाना मुश्किल है। हालांकि इसकी कीमत और भारत में अंतिम नियम अभी तय नहीं हैं।
निष्कर्ष
Starlink की भारत में एंट्री अब तकनीकी और सुरक्षा मंजूरियों के साथ राजनीतिक बहस का भी मुद्दा बन गई है। एक पक्ष इसे डिजिटल खाई कम करने का मौका मानता है, जबकि सरकार सुरक्षा और निष्पक्ष प्रक्रिया पर जोर देती है। अंतिम फैसला सुरक्षा क्लीयरेंस, स्पेक्ट्रम आवंटन और मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद ही साफ होगा।
अन्य ख़बरें !

[…] […]