POCSO मामलों के बढ़ते बोझ पर जबलपुर हाईकोर्ट सख्त: 14,500 से अधिक अपीलें लंबित, कम उम्र के आरोपियों पर जताई चिंता
चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे की पीठ ने पॉक्सो कानून की धारा 43 और 44 के तहत व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर) की तीनों पीठों (जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर) में पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत 14,531 आपराधिक अपीलें लंबित होने पर अदालत ने अत्यधिक चिंता व्यक्त की है। बुधवार, 23 सितंबर 2026 को चीफ जस्टिस अल्पेश वाई. कोगजे और जस्टिस विवेक रूसिया की युगलपीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए पॉक्सो कानून के प्रावधानों के प्रति समाज में व्यापक जागरूकता फैलाने की सख्त आवश्यकता जताई।
अदालत के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, पॉक्सो मामलों में अधिकांश मामलों में पीड़ितों की उम्र 16 से 18 वर्ष और आरोपियों की उम्र 19 से 22 वर्ष के बीच पाई जा रही है। किशोरावस्था के आकर्षण और कानून की जानकारी न होने के कारण कई युवा गंभीर कानूनी मुकदमों और जेल की सजा का सामना कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि किशोरावस्था में अपराधों को रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाना अनिवार्य है।
धारा 43 और 44 के तहत जवाबदेही तय करने का निर्देश
हाईकोर्ट की युगलपीठ ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 43 (कानून का व्यापक प्रचार-प्रसार) और धारा 44 (कार्यान्वयन की निगरानी) को धरातल पर कड़ाई से लागू किया जाए:
- अधिकारियों का प्रशिक्षण: पुलिस, बाल कल्याण समितियों और न्यायिक अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाएं।
- स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता: माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर के छात्रों को पॉक्सो कानून की कानूनी जटिलताओं और सहमति के कानूनी पहलुओं के बारे में जागरूक किया जाए।
निष्कर्ष
पॉक्सो मामलों की भारी पेंडेंसी और उसमें शामिल युवा पीढ़ी को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट की यह टिप्पणी राज्य में कानूनी साक्षरता की तात्कालिक आवश्यकता को दर्शाती है। अदालत की इस सख्ती से उम्मीद है कि राज्य शासन और पुलिस प्रशासन जल्द ही एक एकीकृत निगरानी व जागरूकता ढांचा तैयार करेगा।

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