वैश्विक व्यवस्था में बड़े बदलाव की दस्तक: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता को रूस का खुला समर्थन; जानें क्यों जरूरी है UNSC में सुधार

UNGA के 81वें सत्र में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत और ब्राजील के दावे पर लगाई मुहर; पश्चिमी देशों के विस्तार का किया विरोध, IBSA ने उठाई ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज।

वैश्विक शांति और सुरक्षा की शीर्ष संस्था संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की प्रासंगिकता और संरचना में व्यापक बदलाव की मांग एक बार फिर विश्व मंच पर गूंज उठी है। न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र (UNGA 81) के दौरान रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने घोषणा की है कि रूस सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील की स्थायी सदस्यता के दावे का पुरजोर समर्थन करता है। इसके साथ ही भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका (IBSA समूह) ने एक सुर में कहा है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय बनी यह 15-सदस्यीय संस्था 21वीं सदी की वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती, इसलिए इसमें तत्काल समयबद्ध सुधार (Time-Bound Reforms) आवश्यक हैं।

द हिंदू और न्यूज ऑन एआईआर (News On AIR) की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी सदस्य (P5 – अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस) हैं, जिनके पास वीटो पावर (Veto Power) मौजूद है। हालांकि, रूस-यूक्रेन संघर्ष और मध्य पूर्व में तनाव के चलते वीटो पावर का जिस तरह इस्तेमाल हुआ है, उसने यूएन की निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रूस द्वारा भारत के दावे के समर्थन से जहां ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की स्थिति मजबूत हुई है, वहीं लावरोव ने जर्मनी और जापान जैसे पश्चिमी देशों को अतिरिक्त स्थायी सीटें दिए जाने का कड़ा विरोध किया है। भारत लंबे समय से अपनी विशाल आबादी, मजबूत अर्थव्यवस्था और यूएन शांति मिशनों (Peacekeeping Missions) में योगदान के आधार पर स्थायी सीट की मांग कर रहा है।

1. रूस का स्पष्ट रुख: “भारत और ब्राजील को मिले सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट”

UNGA 81 के मंच से रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का संबोधन कूटनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है:

  • एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व: रूस ने आधिकारिक नीति के तहत कहा कि सुरक्षा परिषद के विस्तार का मुख्य उद्देश्य विकासशील दुनिया को उचित प्रतिनिधित्व देना होना चाहिए।
  • पश्चिमी देशों के विस्तार पर आपत्ति: लावरोव ने चेतावनी दी कि सुरक्षा परिषद के सुधारों में पश्चिमी देशों (विशेषकर जर्मनी और जापान) को और सीटें नहीं दी जानी चाहिए।
  • P5 शक्तियों का संरक्षण: हालांकि, रूस ने यह भी स्पष्ट किया कि सुधारों के बावजूद मौजूदा स्थायी सदस्यों के मूल अधिकारों (Veto Prerogatives) को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

2. IBSA और G4 समूह की मांग: ‘ग्लोबल साउथ’ की बुलंद आवाज

संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर आयोजित 14वीं IBSA (भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका) मंत्रीस्तरीय बैठक में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर, ब्राजील के विदेश मंत्री मौरो विएरा और दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्री रोनाल्ड लामोला ने संयुक्त बयान जारी किया:

  • एक लोकतांत्रिक और समावेशी UNSC: तीनों विकासशील महाद्वीपों के प्रमुख लोकतंत्रों ने सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधि, वैध और प्रभावी बनाने की वकालत की।

  • अफ्रीका का ऐतिहासिक अधिकार: IBSA मंत्रियों ने अफ्रीकी महाद्वीप के लिए सुरक्षा परिषद की दोनों (स्थायी व अस्थायी) श्रेणियों में स्थायी प्रतिनिधित्व की पुरजोर वकालत की।
  • G4 और L.69 समूहों की एकजुटता: भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील का ‘G4’ समूह लगातार एक-दूसरे की स्थायी सदस्यता के दावे का समर्थन कर रहा है।

3. वीटो पावर पर घमासान और भारत का मजबूत दावा

सुरक्षा परिषद के पुनर्गठन में सबसे बड़ा रोड़ा वीटो पावर का इस्तेमाल और 5 स्थायी सदस्यों की आम सहमति का न बनना है:

  1. वीटो पावर के दुरुपयोग पर अंकुश की पहल: फ्रांस-मेक्सिको पहल और लीकटेंस्टीन पहल जैसी वैश्विक मुहिमों के जरिए मांग की जा रही है कि मानवीय संकटों (Humanitarian Crises) के समय P5 देश वीटो का इस्तेमाल न करें।
  2. भारत का अकाट्य दावा: दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और यूएन शांति सेना में सर्वाधिक योगदान देने वाला देश होने के नाते भारत का दावा बेहद मजबूत है।
  3. चीन और तकनीकी अड़चनें: अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस ने भारत की स्थायी सदस्यता का कई बार समर्थन किया है, लेकिन चीन के रुख और यूएन चार्टर में संशोधन (Article 108) की जटिल प्रक्रिया के कारण सुधारों की गति धीमी रही है।

निष्कर्ष 

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार अब केवल एक कूटनीतिक चर्चा नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए अपरिहार्य आवश्यकता बन चुका है। UNGA 81 में रूस का भारत को मिला खुला समर्थन और IBSA समूह की एकजुटता यह दर्शाते हैं कि बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) में भारत की अनदेखी संभव नहीं है। जब तक विश्व निकाय अपनी पुरानी संरचना को बदलकर भारत जैसे उभरते देशों को उचित स्थान नहीं देता, तब तक वैश्विक संकटों के समाधान में संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर सवाल उठते रहेंगे।

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By Kanchan

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