व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सख्त सुप्रीम कोर्ट: “पुलिस के सामने दिया कबूलनामा ‘निवारक निरोध’ का आधार नहीं बन सकता”; संभल हिंसा आरोपी पर NSA रद्द, यूपी सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए शीर्ष अदालत का बड़ा फैसला; कहा— “कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर जमानत आदेशों को विफल करना असंवैधानिक।”
देश में निवारक निरोध कानूनों (Preventive Detention Laws) के मनमाने इस्तेमाल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के हनन पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। 29 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने वर्ष 2024 के चर्चित संभल हिंसा मामले के आरोपी मुल्ला अफ़रोज पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) के तहत लगाए गए निरोध आदेश (Detention Order) को पूरी तरह असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने मनमाने और अवैध तरीके से एनएसए लगाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का भारी जुर्माना (Cost) लगाया है।
यह मामला 24 नवंबर 2024 को संभल की शाही जामा मस्जिद के अदालती सर्वेक्षण के दौरान भड़की हिंसा से जुड़ा है, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने घटना के 54 दिन बाद मुल्ला अफ़रोज को गिरफ्तार किया था और पुलिस कस्टडी के दौरान दर्ज कराए गए कथित इकबालिया बयान के आधार पर 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने उन पर एनएसए लगा दिया था। जब इस आदेश को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बरकरार रखा, तो आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पुलिस हिरासत में लिया गया कबूलनामा भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam की धारा 23) और संविधान के अनुच्छेद 20(3) (आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार) के तहत अदालती सबूत के रूप में अमान्य है, इसलिए इसे जिला मजिस्ट्रेट के ‘वैयक्तिक संतोष’ (Subjective Satisfaction) का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
1. पुलिस कस्टडी में कबूलनामे पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सर्वोच्च अदालत ने निवारक निरोध कानून लागू करने के लिए पुलिस कस्टडी बयानों पर निर्भरता को पूरी तरह खारिज कर दिया:
- संवैधानिक संरक्षण पर प्रहार: पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा, “पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान स्वयं में, और किसी स्वतंत्र साक्ष्य के अभाव में, निवारक निरोध आदेश को बनाए रखने के लिए आवश्यक वैयक्तिक संतोष का आधार नहीं बन सकता।”
- कानून की नजर में संदिग्ध बयान: अदालत ने टिप्पणी की कि जिस बयान को कानून आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि के लिए अमान्य और संदिग्ध मानता है, उसे किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनने का जरिया नहीं बनाया जा सकता।
- जमानत खारिज करने का जरिया बने कानून: सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई कि कार्यपालिका द्वारा नियमित रूप से अदालत से मिली जमानत के असर को बेअसर करने के लिए असाधारण एनएसए जैसे कठोर कानूनों का ‘अतिरिक्त-न्यायिक दंड’ (Extra-Judicial Punishment) की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
2. संभल हिंसा केस और एनएसए (NSA) निरोध आदेश की कानूनी समीक्षा
मुल्ला अफ़रोज मामले में घटनाक्रम और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:
| मामला / पहलू (Parameter) | घटनाक्रम एवं अदालती निष्कर्ष (Case Details & SC Findings) |
|---|---|
| मूल घटना (Incident) | 24 नवंबर 2024: संभल शाही जामा मस्जिद सर्वे हिंसा (4 मौते) |
| गिरफ्तारी व कस्टडी बयान | 54 दिन बाद (17 जनवरी 2025) गिरफ्तारी; कस्टडी में कबूलनामा दर्ज |
| जमानत व NSA की कार्रवाई | 9 सितंबर 2025 को जमानत मिली; 13 अक्टूबर 2025 को डीएम द्वारा NSA लागू |
| इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख | हाईकोर्ट ने यूपी सरकार के एनएसए आदेश को सही ठहराया था |
| सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला | NSA रद्द, आरोपी की तत्काल रिहाई और यूपी सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना |
3. ‘निवारक निरोध दंडात्मक नहीं है’: व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में नागरिक अधिकारों और कार्यपालिका की जवाबदेही पर बल दिया:
- पीड़ित को एक माह में मुआवजा: अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया कि वह जुर्माने की ₹10 लाख की राशि याचिकाकर्ता मुल्ला अफ़रोज को एक महीने के भीतर अदा करे।
- स्वतंत्र जांच का अधिकार जारी: सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि निवारक निरोध आदेश रद्द कर दिया गया है, लेकिन पुलिस के पास सामान्य आपराधिक कानून (CrPC/BNSS) के तहत मामले की निष्पक्ष जांच करने का अधिकार बना रहेगा।
- न्यायिक क्लर्क को श्रद्धांजलि: फैसला सुनाते समय न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता भावुक हो गए और उन्होंने इस ऐतिहासिक निर्णय को अपने लॉ क्लर्क को समर्पित किया, जिनका हाल ही में 27वें जन्मदिन से ठीक पहले निधन हो गया था।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा में एक मील का पत्थर है। संभल हिंसा मामले में यूपी सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाकर और पुलिस कस्टडी बयानों के आधार पर लगाए गए एनएसए को रद्द करके शीर्ष अदालत ने कार्यपालिका को स्पष्ट संदेश दिया है कि असाधारण कड़े कानूनों का इस्तेमाल नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। यह फैसला आने वाले समय में देश भर के जिला मजिस्ट्रेटों और पुलिस प्रशासन को एनएसए और यूएपीए (UAPA) जैसे कठोर कानूनों के मनमाने इस्तेमाल से रोकेगा।
