महिलाओं के लिए नौकरी तक पहुंच (Mobility) सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं, सफर का रास्ता भी तय करता है मौका

भारत में किसी महिला के लिए नौकरी मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है। वहां तक पहुंचने के लिए सुरक्षित, सस्ता और भरोसेमंद परिवहन उपलब्ध है या नहीं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हाल ही में जारी National Household Travel Survey यानी NHTS के आंकड़े बताते हैं कि काम पर जाने के तरीकों में महिलाओं और पुरुषों के बीच बड़ा अंतर है। यही अंतर यह सवाल उठाता है कि क्या परिवहन व्यवस्था महिलाओं को पुरुषों के बराबर रोजगार के अवसर दे रही है?

महिलाओं की यात्रा का तरीका पुरुषों से अलग

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Women Commute to Work: सर्वे के विश्लेषण के अनुसार, काम पर जाने वाली महिलाओं में करीब 67 फीसदी महिलाएं पैदल चलने, बस या अन्य सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं। पुरुषों में यह हिस्सा करीब 33 फीसदी है। इसके उलट पुरुषों की बड़ी संख्या दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल करती है।

यानी एक ही शहर या गांव में रहने के बावजूद महिला और पुरुष के लिए नौकरी तक पहुंचने का भौगोलिक दायरा अलग हो सकता है। दोपहिया वाहन पुरुषों को अपेक्षाकृत लंबी दूरी तय करके अधिक नौकरियों तक पहुंचने की सुविधा देता है, जबकि पैदल या सीमित सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर महिला का विकल्प अक्सर घर के आसपास के काम तक सिमट सकता है।

ग्रामीण महिलाओं के लिए पैदल सफर सबसे अहम

ग्रामीण क्षेत्रों में काम पर जाने वाली महिलाओं के लिए पैदल यात्रा का महत्व और बढ़ जाता है। उपलब्ध विश्लेषण के मुताबिक ग्रामीण महिला कामगारों में दो-तिहाई से अधिक पैदल अपने कार्यस्थल तक पहुंचती हैं।

यह सिर्फ यह नहीं बताता कि महिलाएं पैदल चलना पसंद करती हैं। कई मामलों में यह सार्वजनिक परिवहन की उपलब्धता, लागत, सुरक्षा और घर के पास काम की मजबूरी का संकेत हो सकता है।

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MoSPI के सर्वे के मुताबिक देश में 36.6 फीसदी ग्रामीण कामगार पैदल और 37.1 फीसदी दोपहिया से काम तक पहुंचते हैं। शहरों में दोपहिया का हिस्सा बढ़कर 52.3 फीसदी हो जाता है।

महिलाओं की नौकरी का दायरा क्यों छोटा रह जाता है?

शहरों में महिलाओं के लिए बस और अन्य सार्वजनिक परिवहन रोजगार तक पहुंच का महत्वपूर्ण साधन हैं। कुछ राज्यों में महिलाओं के काम पर जाने में सार्वजनिक परिवहन की भूमिका खास तौर पर दिखाई देती है।

समस्या तब पैदा होती है जब बस कम चलती हों, इंतजार लंबा हो, आखिरी दूरी के लिए साधन उपलब्ध न हो या यात्रा सुरक्षित महसूस न हो। ऐसी स्थिति में महिला दूर की बेहतर नौकरी छोड़कर पास की कम वेतन वाली नौकरी चुन सकती है।

यानी परिवहन की कमी सीधे रोजगार के विकल्पों और संभावित आय को प्रभावित कर सकती है।

Mobility Poverty क्या है?

जब किसी व्यक्ति के लिए परिवहन उपलब्ध, सस्ता या सुरक्षित न होने के कारण वह नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा या अन्य जरूरी अवसरों तक नहीं पहुंच पाता, तो इसे मोबिलिटी पॉवर्टी कहा जाता है।

महिलाओं के मामले में इसकी समस्या और जटिल हो सकती है, क्योंकि नौकरी के साथ उन्हें घर के काम और देखभाल की जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं।

Trip Chaining से बढ़ती चुनौती

महिलाओं की यात्रा अक्सर सिर्फ घर से कार्यालय और फिर घर लौटने तक सीमित नहीं होती। रास्ते में बच्चों को स्कूल छोड़ना, बाजार से सामान लेना, किसी बुजुर्ग की देखभाल करना या अन्य घरेलू काम शामिल हो सकते हैं।

इसे Trip Chaining कहा जाता है, यानी एक ही दिन में कई उद्देश्यों को जोड़कर यात्रा करना। ऐसी महिलाओं के लिए सिर्फ तेज परिवहन पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसा नेटवर्क चाहिए जो सुविधाजनक, सुरक्षित और कई जगहों को जोड़ने वाला हो।

विश्व बैंक की भारत संबंधी रिसर्च भी बताती है कि महिलाओं की परिवहन पसंद पर सुरक्षा, खर्च, घरेलू जिम्मेदारियों और अंतिम दूरी जैसी बाधाओं का गहरा असर पड़ता है।

आंकड़ों में एक और बड़ा अंतर

National Household Travel Survey: NHTS के मुताबिक 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के 61.9 फीसदी पुरुष काम के लिए 1 किलोमीटर से अधिक की दैनिक यात्रा करते हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा सिर्फ 41.9 फीसदी है।

यह अंतर बताता है कि समस्या सिर्फ “महिलाएं कौन-सा वाहन इस्तेमाल करती हैं” तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि कितनी महिलाएं रोजाना नौकरी तक पहुंचने लायक यात्रा ही कर पा रही हैं।

आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?

महिलाओं की रोजगार भागीदारी बढ़ाने के लिए परिवहन नीति में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना जरूरी है। शहरों और कस्बों में नियमित और पर्याप्त बस सेवाओं का विस्तार, सुरक्षित आखिरी दूरी के साधन, बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग और आसान पैदल मार्ग जरूरी हैं।

The world is moving ahead and India is running behind, women employees are missing from the office, so how we will create women leaders

रूट तय करते समय सिर्फ कार्यालय क्षेत्रों को नहीं, बल्कि स्कूल, आंगनवाड़ी, बाजार, अस्पताल और अन्य देखभाल केंद्रों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। साथ ही परिवहन बजट में पुरुष और महिला यात्रियों के अलग-अलग आंकड़ों का इस्तेमाल होना चाहिए।

निष्कर्ष

किसी महिला के लिए नौकरी की दूरी सिर्फ किलोमीटर में नहीं मापी जाती। उसमें किराया, सुरक्षा, बस का इंतजार, आखिरी दूरी और घर की जिम्मेदारियां भी शामिल होती हैं। NHTS के आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे दिखाते हैं कि भारत में परिवहन व्यवस्था और रोजगार के बीच लैंगिक संबंध कितना गहरा है।

अगर सार्वजनिक परिवहन सुरक्षित, सस्ता और भरोसेमंद बने, तो इसका असर सिर्फ यात्रा पर नहीं पड़ेगा। इससे महिलाओं के रोजगार विकल्प, आय, आर्थिक स्वतंत्रता और श्रमबल में भागीदारी के रास्ते भी व्यापक हो सकते हैं।

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By Kanchan

2 thought on “महिलाओं की नौकरी और परिवहन: NHTS ने खोला Mobility Gap का सच”
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