असदुद्दीन ओवैसी का सपा पर हमला, 2027 चुनाव से पहले मुस्लिम नेतृत्व की अपील तेज
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) के गढ़ माने जाने वाले आजमगढ़ में अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। हाल ही में आयोजित जनसभा में उन्होंने अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा पर निशाना साधते हुए मुस्लिम समुदाय से अपना स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व खड़ा करने की अपील की। ओवैसी के इस रुख को उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी का आधार बढ़ाने और आगामी चुनाव से पहले नए राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
आजमगढ़ में ओवैसी ने सपा और कांग्रेस को घेरा
अक्टूबर 2026 में आजमगढ़ के दीदारगंज विधानसभा क्षेत्र में आयोजित जनसभा के दौरान ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को केवल पारंपरिक राजनीतिक दलों पर निर्भर रहने के बजाय अपने बीच से नेतृत्व तैयार करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां चुनाव के समय मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मांगती हैं, लेकिन उन्हें पार्टी और सत्ता में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देतीं।
ओवैसी ने अपने भाषण में जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी का उल्लेख करते हुए कहा कि समुदाय को दूसरे नेताओं के भरोसे रहने के बजाय अपने नेताओं को आगे लाना चाहिए। उनके मुताबिक, मुस्लिम समाज की राजनीतिक भागीदारी केवल मतदान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं और सत्ता में भी उसकी उचित भागीदारी होनी चाहिए।
उन्होंने सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव और वर्तमान अध्यक्ष अखिलेश यादव पर भी निशाना साधा। ओवैसी का आरोप था कि मुस्लिम मतदाताओं ने लंबे समय तक सपा का समर्थन किया, लेकिन इससे समुदाय को अपेक्षित राजनीतिक नेतृत्व और स्थानीय विकास का लाभ नहीं मिला।
अखिलेश यादव के साथ गठबंधन की कोशिश क्यों चर्चा में?
उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले ओवैसी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता में लौटने से रोकने के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की इच्छा जताई थी। उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव सहित विपक्षी नेताओं से बातचीत करने की अपील की थी। हालांकि, गठबंधन को लेकर सकारात्मक सहमति सामने नहीं आने के बाद ओवैसी ने सपा के खिलाफ अपना हमला तेज कर दिया है।
उनका कहना है कि अगर विपक्षी दल वास्तव में भाजपा को चुनौती देना चाहते हैं, तो उन्हें छोटे दलों और अल्पसंख्यक नेतृत्व को भी राजनीतिक स्थान देना होगा। दूसरी ओर, एआईएमआईएम के अलग चुनाव लड़ने से विपक्षी मतों के बंटवारे की आशंका भी उठ रही है।
यही वजह है कि ओवैसी की रणनीति सपा और कांग्रेस के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह चुनावी गठबंधनों, उम्मीदवारों और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।
‘भाजपा की बी-टीम’ के आरोप पर क्या बोले ओवैसी?
असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी पर विपक्षी दलों की ओर से अक्सर आरोप लगाया जाता रहा है कि अलग चुनाव लड़ने से भाजपा को फायदा पहुंच सकता है। इस आलोचना को ओवैसी ने खारिज किया है। आजमगढ़ की सभा में उन्होंने सपा और भाजपा दोनों को चुनौती देते हुए अपनी पार्टी को एक अलग राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया।
वहीं, आजमगढ़ के सपा जिलाध्यक्ष हवलदार यादव ने ओवैसी की सभा से पार्टी पर कोई खास असर पड़ने की संभावना को खारिज किया और एआईएमआईएम को भाजपा की ‘बी-टीम’ बताया। इससे साफ है कि गठबंधन की संभावनाओं के साथ-साथ दोनों दलों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी तेज हो रही है।
विकास और आर्थिक असमानता को भी बनाया मुद्दा
ओवैसी ने आजमगढ़ के विकास का मुद्दा उठाते हुए सड़कों की स्थिति, हवाई अड्डे के बंद रहने और उच्च शिक्षा से जुड़ी समस्याओं पर सवाल किए। उन्होंने दावा किया कि लंबे समय तक सपा का प्रभाव रहने के बावजूद क्षेत्र को विकास का अपेक्षित लाभ नहीं मिला। ये उनके राजनीतिक भाषण में लगाए गए आरोप हैं।
इसके अलावा, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ’80 बनाम 20′ वाले राजनीतिक विमर्श की आलोचना करते हुए आर्थिक असमानता को अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। ओवैसी ने इसके मुकाबले ’99 बनाम 1′ का तर्क रखा, जिसके जरिए उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर बहुसंख्यक आबादी और संपन्न वर्ग के बीच अंतर को रेखांकित करने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम के सामने कितनी बड़ी चुनौती?
उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना ओवैसी के लिए आसान नहीं रहा है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने 96 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। राज्य में उसका मत प्रतिशत भी एक प्रतिशत से कम रहा था।
इस पृष्ठभूमि में 2027 का चुनाव पार्टी के लिए अपनी पिछली स्थिति बदलने की परीक्षा होगा। आजमगढ़ जैसे क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ाकर एआईएमआईएम उन मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, जो अब तक सपा या दूसरे विपक्षी दलों के साथ रहे हैं। पार्टी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह जनसभाओं से आगे बढ़कर संगठन, स्थानीय नेतृत्व और मजबूत उम्मीदवारों का कितना विस्तार कर पाती है।
कुल मिलाकर, असदुद्दीन ओवैसी की हालिया सक्रियता उत्तर प्रदेश की राजनीति में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और विपक्षी एकजुटता की बहस को फिर सामने लाती है। उनके स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने या किसी गठबंधन में शामिल होने का फैसला आगामी चुनाव के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। फिलहाल, सपा के साथ सहमति नहीं बनने और आजमगढ़ में दिए गए बयानों ने 2027 के चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच टकराव को और स्पष्ट कर दिया है।

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