Press Council of India: आधी ताकत से चल रहा प्रेस का प्रहरी, पत्रकारों की सीटें खाली होने से उठे सवाल

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता के मानकों की निगरानी करने वाली प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) इन दिनों अपनी ही संरचना को लेकर सवालों के घेरे में है। 7 अक्टूबर 2026 तक परिषद की 28 सदस्यीय संरचना में आधी सीटें रिक्त हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें फिलहाल एक भी कार्यरत पत्रकार या समाचार-पत्र संपादक शामिल नहीं है।

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यह स्थिति ऐसे समय में है जब मीडिया की भूमिका, प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की विश्वसनीयता को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है।

क्या है Press Council of India?

Press Council of India एक वैधानिक और अर्ध-न्यायिक संस्था है, जिसकी स्थापना Press Council Act, 1978 के तहत हुई थी। इसका मूल उद्देश्य देश में प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखना तथा समाचार-पत्रों और समाचार एजेंसियों के मानकों को बनाए रखने और उनमें सुधार करना है।

कानून के अनुसार परिषद में एक अध्यक्ष और 28 अन्य सदस्य होते हैं। सदस्यता की संरचना इस तरह बनाई गई है कि उसमें पत्रकारों, समाचार-पत्र प्रबंधन, समाचार एजेंसियों, संसद और शिक्षा, विज्ञान, कानून तथा साहित्य-संस्कृति जैसे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व रहे।

पत्रकारों की पूरी श्रेणी खाली

मौजूदा स्थिति सबसे ज्यादा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 28 सदस्यीय परिषद में पत्रकारों के लिए निर्धारित 13 पद रिक्त हैं। इनमें छह पद समाचार-पत्र संपादकों और सात पद अन्य कार्यरत पत्रकारों के लिए हैं।

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प्रेस काउंसिल ने इन श्रेणियों के लिए नामों का चयन और नामांकन प्रक्रिया आगे बढ़ाई है, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं होने के कारण ये सदस्य परिषद में शामिल नहीं हो पाए हैं।

इसका सीधा असर परिषद के प्रतिनिधित्व पर पड़ता है। जिस संस्था में पत्रकारिता से जुड़े प्रमुख फैसलों और शिकायतों पर विचार होना है, उसमें कार्यरत पत्रकारों और संपादकों की अनुपस्थिति उसके पेशेवर प्रतिनिधित्व को कमजोर करती है।

आधी ताकत का मतलब क्या?

मौजूदा संरचना में 28 में से 14 सदस्य सीटें रिक्त हैं। यानी सदस्य स्तर पर परिषद अपनी स्वीकृत क्षमता की लगभग आधी ताकत के साथ काम कर रही है।

यह समस्या केवल संख्या का मामला नहीं है। परिषद के अलग-अलग वर्गों का प्रतिनिधित्व इसलिए रखा गया है ताकि मीडिया जगत से जुड़े फैसलों में विविध अनुभव और पेशेवर दृष्टिकोण शामिल हो सकें।

लंबे समय तक रिक्तियां बने रहने पर निर्णय प्रक्रिया, समितियों के काम और शिकायतों के निपटारे की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

PCI की शक्तियां कितनी हैं?

 प्रेस काउंसिल का काम मीडिया संस्थानों और पत्रकारिता से जुड़े पेशेवर आचरण के मामलों की जांच करना है। शिकायत मिलने पर परिषद सुनवाई कर सकती है और निर्धारित परिस्थितियों में किसी समाचार-पत्र, समाचार एजेंसी, संपादक या पत्रकार को चेतावनी, फटकार या निंदा कर सकती है।

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हालांकि PCI के पास ऐसी कठोर दंडात्मक शक्तियां नहीं हैं जैसी किसी आपराधिक या नियामक प्राधिकरण के पास हो सकती हैं। इसकी भूमिका मुख्य रूप से प्रेस की स्वतंत्रता और जिम्मेदार पत्रकारिता के बीच संतुलन कायम करने तथा आत्म-नियमन को बढ़ावा देने की है।

क्या PCI डिजिटल मीडिया को भी नियंत्रित करता है?

यह सवाल आज के मीडिया माहौल में खासा महत्वपूर्ण है। PCI का मुख्य कानूनी दायरा प्रिंट मीडिया और समाचार एजेंसियों से जुड़ा है। इसका मतलब यह है कि टेलीविजन, सोशल मीडिया और डिजिटल समाचार प्लेटफॉर्म का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र इसके प्रत्यक्ष दायरे में नहीं आता।

जबकि आज खबरों का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों से उपभोग किया जाता है, ऐसे में PCI की वर्तमान संरचना और कानूनी सीमा दोनों पर नए सिरे से विचार की जरूरत महसूस होती है।

शिकायतों का बढ़ता बोझ

PCI की अपनी वेबसाइट के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में परिषद को 1,099 नई शिकायतें मिलीं और कुल 557 मामले निपटाए गए। उस अवधि के अंत में 1,650 मामले विचाराधीन थे। 2025-26 में नई शिकायतों की संख्या बढ़कर 1,315 हो गई।

ऐसे समय में जब शिकायतों का बोझ कम नहीं हो रहा, परिषद के महत्वपूर्ण पद लंबे समय तक खाली रहना उसकी संस्थागत क्षमता के लिए चिंता का विषय बन सकता है।

आगे क्या होना चाहिए?

सबसे पहले सदस्य नियुक्ति प्रक्रिया के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी समय-सीमा तय करने की आवश्यकता है। किस पद पर कितने समय तक रिक्ति रही, किस चरण में नियुक्ति अटकी है और कब तक अधिसूचना जारी होनी है, इसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।

एक लाइव वैकेंसी डैशबोर्ड, पारदर्शी नामांकन प्रक्रिया और पर्याप्त सचिवालय संसाधन परिषद की कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं। साथ ही नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के अनावश्यक प्रभाव से संस्था की स्वायत्तता सुरक्षित रखना भी जरूरी है।

निष्कर्ष

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया केवल एक सरकारी संस्था नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की जवाबदेही के बीच संतुलन बनाने वाली महत्वपूर्ण संवैधानिक-लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। जब इसकी आधी सदस्यीय क्षमता खाली हो और पत्रकारों का प्रतिनिधित्व ही अनुपस्थित हो, तो सवाल केवल नियुक्तियों की देरी का नहीं रहता, बल्कि संस्था की प्रतिनिधिक वैधता और प्रभावशीलता का बन जाता है।

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By Kanchan

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