AI और ऑटोमेशन से बढ़ रहा रोजगार संकट, Global South के सामने सबसे बड़ी चुनौती; युवाओं के लिए घट रहे अवसर
नई दिल्ली: दुनिया की अर्थव्यवस्था तकनीकी बदलाव के एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वचालन, रोबोटिक्स और उन्नत विनिर्माण उत्पादन की क्षमता तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन रोजगार पैदा करने की पारंपरिक व्यवस्था पर सवाल भी खड़े कर रहे हैं। खासकर विकासशील और निम्न आय वाले देशों के लिए यह चुनौती अधिक गंभीर है, क्योंकि इन देशों में बड़ी संख्या में युवा हर साल रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं, जबकि कई पारंपरिक क्षेत्रों में पहले की तुलना में कम श्रमिकों की जरूरत पड़ रही है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की Employment and Social Trends 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में वैश्विक बेरोजगारी दर करीब 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन केवल बेरोजगारी दर पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। दुनिया में रोजगार चाहने वाले लेकिन काम नहीं पा सकने वाले लोगों की व्यापक संख्या यानी वैश्विक रोजगार अंतर करीब 40.8 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं लगभग 2.1 अरब लोग अनौपचारिक रोजगार में हैं।
युवा आबादी बनी अवसर भी और चुनौती भी
विकासशील देशों के लिए बड़ी युवा आबादी को लंबे समय से आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण आधार माना जाता रहा है। इसे जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जाता है। लेकिन यदि अर्थव्यवस्था पर्याप्त संख्या में उत्पादक और सम्मानजनक रोजगार पैदा करने में विफल रहती है, तो यही लाभांश आर्थिक और सामाजिक दबाव में बदल सकता है।
ILO की Global Employment Trends for Youth 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में वैश्विक युवा बेरोजगारी दर बढ़कर 12.4 प्रतिशत हो गई। करीब 6.7 करोड़ युवा बेरोजगार थे, जबकि लगभग 20 प्रतिशत युवा रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण से बाहर थे।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शुरुआती रोजगार का अनुभव किसी युवा के आगे के पूरे करियर को प्रभावित कर सकता है। लंबे समय तक बेरोजगारी या अस्थिर काम से आय, कौशल विकास और भविष्य की रोजगार क्षमता पर असर पड़ सकता है।
AI से सिर्फ नौकरियां खत्म नहीं, काम का स्वरूप भी बदल रहा
AI को लेकर बहस अक्सर इस सवाल तक सीमित हो जाती है कि कितनी नौकरियां खत्म होंगी। वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। AI कुछ कामों को स्वचालित कर सकता है, कुछ नौकरियों में इंसानों की उत्पादकता बढ़ा सकता है और नए प्रकार के काम भी पैदा कर सकता है।
ILO और विश्व बैंक के संयुक्त अध्ययन में 135 देशों के रोजगार पर जनरेटिव AI के संभावित प्रभाव का विश्लेषण किया गया। अध्ययन के अनुसार विकासशील देशों में AI से होने वाला प्रत्यक्ष स्वचालन जोखिम विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कम हो सकता है, लेकिन डिजिटल बुनियादी ढांचे और कौशल की कमी के कारण इन देशों को AI के लाभ मिलने में अधिक समय लग सकता है।
विश्व आर्थिक मंच के अनुसार भी आने वाले वर्षों में इंसान और मशीन के बीच काम का बंटवारा तेजी से बदलने की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि कई क्षेत्रों में नौकरी पूरी तरह खत्म होने के बजाय उसके भीतर किए जाने वाले कार्यों का स्वरूप बदल सकता है।
Global South के सामने दोहरी चुनौती
Global South के कई देशों के सामने समस्या दो स्तरों पर है। पहली चुनौती पर्याप्त संख्या में रोजगार पैदा करना है और दूसरी चुनौती ऐसे रोजगार पैदा करना है जिनमें तकनीकी बदलाव के साथ आगे बढ़ने की क्षमता हो।
पारंपरिक विकास मॉडल में कृषि से श्रमिक उद्योग और फिर अधिक उत्पादक सेवा क्षेत्रों की ओर जाते रहे हैं। लेकिन स्वचालन और उन्नत मशीनरी के कारण विनिर्माण क्षेत्र पहले की तुलना में कम श्रमिकों के साथ अधिक उत्पादन करने में सक्षम हो रहा है। इससे गरीब देशों के लिए वह रास्ता कठिन हो सकता है जिसमें बड़ी संख्या में कम और मध्यम कौशल वाले श्रमिकों को उद्योगों में रोजगार मिलता था।
यही कारण है कि विकासशील देशों को केवल अत्याधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में निवेश करने के बजाय श्रम-प्रधान विनिर्माण, कृषि प्रसंस्करण, स्वास्थ्य सेवाओं, पर्यटन, देखभाल सेवाओं और छोटे उद्योगों जैसे क्षेत्रों पर भी ध्यान देना होगा।
भारत जैसे देशों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है मुद्दा?
भारत समेत दक्षिण एशिया में यह बहस विशेष महत्व रखती है। 6 अक्टूबर 2026 को जारी विश्व बैंक की दक्षिण एशिया संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है और 2026 में वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। लेकिन रिपोर्ट ने साथ ही रोजगार पैदा करने के लिए नए विकास स्रोतों और AI को उत्पादक तरीके से अपनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
इसका मतलब यह है कि केवल तेज आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी। विकास का लाभ तभी व्यापक रूप से दिखाई देगा जब वह बड़ी संख्या में लोगों के लिए रोजगार और आय के अवसर पैदा करे।
कौशल और डिजिटल ढांचे में निवेश जरूरी
AI आधारित अर्थव्यवस्था में केवल डिग्री होना पर्याप्त नहीं रह जाएगा। श्रमिकों को अपने क्षेत्र के ज्ञान के साथ डिजिटल उपकरणों, AI आधारित प्रणालियों और बदलती कार्य प्रक्रियाओं को समझने की क्षमता विकसित करनी होगी।
इसके लिए व्यावसायिक शिक्षा, उद्योग आधारित प्रशिक्षण, डिजिटल बुनियादी ढांचा और निरंतर कौशल विकास को रोजगार नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा। साथ ही छोटे और मध्यम उद्योगों को भी नई तकनीक अपनाने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की जरूरत होगी।
विश्व बैंक की 2026 की विकास रिपोर्ट भी इस बात पर जोर देती है कि AI का लाभ विकासशील देशों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल आधारभूत ढांचे, कौशल और संस्थागत क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है।
बेरोजगारी का असर अर्थव्यवस्था से आगे जाएगा
यदि बड़ी युवा आबादी को पर्याप्त और स्थिर रोजगार नहीं मिलता है, तो इसका प्रभाव केवल आय पर नहीं पड़ेगा। लंबे समय तक बेरोजगारी आर्थिक असमानता, प्रवासन, सामाजिक असंतोष, संस्थाओं पर घटते भरोसे और राजनीतिक ध्रुवीकरण जैसी समस्याओं को भी बढ़ा सकती है।
इसलिए भविष्य की रोजगार नीति का लक्ष्य केवल बेरोजगारी दर कम करना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य ऐसे उत्पादक, सुरक्षित और सम्मानजनक रोजगार तैयार करना होना चाहिए जो तकनीकी बदलाव के साथ टिक सकें।
आगे का रास्ता क्या?
AI और स्वचालन को रोजगार के लिए केवल खतरे के रूप में देखना समाधान नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी प्रगति का लाभ कुछ कंपनियों और उच्च कौशल वाले श्रमिकों तक सीमित न रहे।
सरकारों को श्रम-प्रधान क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने, उद्योग की जरूरत के अनुसार कौशल प्रशिक्षण देने, डिजिटल पहुंच बढ़ाने और श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत होगी। वहीं कंपनियों को भी केवल श्रम लागत घटाने के बजाय AI को मानव क्षमता बढ़ाने वाली तकनीक के रूप में अपनाने पर ध्यान देना होगा।
भविष्य का रोजगार संकट तकनीक के आने से अपने आप पैदा नहीं होगा। असली संकट तब पैदा होगा जब तकनीकी प्रगति की गति और रोजगार पैदा करने की क्षमता के बीच अंतर बहुत बड़ा हो जाएगा। Global South के लिए आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी आर्थिक परीक्षा यही होगी कि वह अपनी युवा आबादी को बोझ बनने से पहले उत्पादक शक्ति में बदल पाए या नहीं।

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