आसमान से दगा और एल नीनो का प्रहार: दशक के सबसे कमजोर दौर में दक्षिण-पश्चिम मानसून; 13% की गिरावट से कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंडराया संकट
औसत आंकड़ों के पीछे छिपा जिलों का सूखा; घटता भूजल और जलाशयों का गिरता स्तर बना किसानों के लिए बड़ी चुनौती, जानें आगे की राह।
भारत का कृषि अर्थशास्त्र, ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा जिस पर सबसे अधिक निर्भर करती है, उस दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon 2026) ने इस वर्ष निराशाजनक विदाई दी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी अंतिम आंकड़ों के अनुसार, चार महीने (जून से सितंबर) का मानसून सत्र पूरे देश में लगभग 12.6% से 13% की वर्षा कमी (Deficit) के साथ समाप्त हुआ है। वर्ष 2001 के बाद से यह चौथा सबसे कम मानसूनी वर्षा वाला वर्ष दर्ज किया गया है। प्रशांत महासागर में तीव्र होते एल नीनो (El Niño) के प्रभाव और मौसम की भीषण क्षेत्रीय विषमता ने देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थितियां पैदा कर दी हैं।
देश भर में दीर्घकालिक औसत (LPA) 868.6 मिमी के मुकाबले केवल 759.4 मिमी बारिश दर्ज की गई। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर का औसत आंकड़ा कई जिलों में पड़े भीषण सूखे, लंबी शुष्क अवधियों (Dry Spells) और अचानक हुई विनाशकारी बारिश को छिपा देता है। यद्यपि हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD) और स्थानीय वायुमंडलीय परिस्थितियों ने कुछ क्षेत्रों को आंशिक राहत दी, लेकिन एल नीनो के प्रभाव ने मानसूनी चक्र को तोड़ दिया। अब जलाशयों का गिरता जलस्तर, घटता भूजल, और रबी व खरीफ फसलों की बुआई का चरण यह तय करेंगे कि यह मानसूनी कमी किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए कितना बड़ा झटका साबित होगी।
1. दशक का सबसे कमजोर मानसून: महीनों के अनुसार बारिश का गणित
वर्ष 2026 के मानसून के दौरान वर्षा की मासिक स्थिति इस प्रकार रही:
| महीना (Month) | मानसूनी स्थिति / विचलन (Rainfall Status) | मुख्य कारण व प्रभाव (Key Drivers & Impact) |
|---|---|---|
| जून (June) | -35.4% (भारी कमी) | एल नीनो का तीव्र उभार, मानसून के आगमन में देरी |
| जुलाई (July) | +1.0% (सामान्य से थोड़ा अधिक) | बंगाल की खाड़ी में बने निम्न दबाव के क्षेत्र से राहत |
| अगस्त (August) | -16.3% (गंभीर गिरावट) | लंबे समय तक शुष्क दौर (Dry Spells), फसलों की बुआई प्रभावित |
| सितंबर (September) | -7.6% (कमी जारी रही) | मानसून की समय से पूर्व वापसी और कम वर्षा |
| कुल मानसूनी औसत | ~12.6% से 13% की अखिल भारतीय कमी | 2001 के बाद चौथा सबसे कमजोर मानसूनी सीजन |
2. केवल ‘एल नीनो’ जिम्मेदार नहीं: मानसून के जटिल जलवायु कारक
मानसून की चाल केवल एक ही घटना पर निर्भर नहीं करती, बल्कि कई समुद्री व वायुमंडलीय चक्र इसे प्रभावित करते हैं:
- एल नीनो का प्रभाव (ENSO): मध्य व पूर्वी प्रशांत महासागर के गर्म होने से भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ गईं, जो 2027 की शुरुआत तक जारी रह सकती हैं।
- इंडियन ओशन डिपोल (IOD): हिंद महासागर में बने सकारात्मक/तटस्थ आईओडी ने एल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करने का प्रयास किया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था।
- इंट्रा-सीज़नल ऑसिलेशन (MJO): मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन की कमजोर स्थिति के कारण मानसून की ट्रफ लाइन लंबे समय तक निष्क्रिय (Break Period) रही।
3. सिंचित बनाम असिंचित खेती: अर्थव्यवस्था पर मंडराता संकट
भारत में लगभग 60 प्रतिशत कृषि भूमि वर्षा-आधारित (Rain-fed Farming) है, जहाँ सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है:
- फसलों की पैदावार पर असर: धान, दलहन और तिलहन जैसी खरीफ फसलों की बुआई के महत्वपूर्ण चरणों में बारिश न होने से पैदावार घटने का अनुमान है।
- जलाशयों और भूजल का स्तर: कम बारिश के कारण देश के प्रमुख 150 जलाशयों में जल भंडारण क्षमता घटी है, जिससे आगामी रबी फसल (गेहूं व सरसों) की सिंचाई और पेयजल आपूर्ति पर संकट गहरा सकता है।
- ग्रामीण आय व महंगाई का खतरा: फसल उत्पादन घटने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग कम होगी और खाद्य वस्तुओं की कीमतें (Food Inflation) बढ़ सकती हैं।
4. आगे की राह : जल और कृषि संकट से निपटने के उपाय
संपादकीय और नीतिगत विश्लेषणों ने इस मानसूनी घाटे से निपटने के लिए निम्नलिखित तात्कालिक और दीर्घकालिक कदम सुझाए हैं:
- जिला स्तरीय आकस्मिक योजनाएं (District Contingency Plans): कम बारिश से प्रभावित जिलों में किसानों को तुरंत आकस्मिक फसल योजनाएं और सब्सिडी वाले बीज उपलब्ध कराए जाएं।
- सूखा-सहनशील फसलें व सूक्ष्म सिंचाई: बाजरा, ज्वार और दलहन जैसी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा दिया जाए तथा ड्रिप/स्प्रिंकलर (Micro-irrigation) तकनीक अपनाई जाए।
- सटीक आंकड़ों का प्रकाशन: जिला व तहसील स्तर पर जलाशयों के जलस्तर और मृदा नमी (Soil Moisture Data) के रियल-टाइम आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।
- फसल बीमा का त्वरित आकलन: ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ के तहत उपग्रह आधारित आंकलन से प्रभावित किसानों को बिना देरी मुआवजा दिया जाए।
- शहरी जल प्रबंधन: शहरों में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को अनिवार्य कर जल संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
निष्कर्ष
2026 के मानसून में 13% की गिरावट केवल मौसम का एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन और एल नीनो के बढ़ते प्रभाव की चेतावनी है। अखिल भारतीय औसत से परे जाकर उन जिलों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जहाँ सूखा पड़ा है। सूक्ष्म सिंचाई, सूखा-रोधी फसलों और वैज्ञानिक जल प्रबंधन के माध्यम से ही भारत अपनी कृषि अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रख सकता है।

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