नए रेशम मार्ग के पार: उज़्बेकिस्तान की यात्रा; जानिए कैसे ‘शांत और व्यावहारिक कूटनीति’ से वैश्विक राजनीति का केंद्र बना ताशकंद

गुटनिरपेक्षता, क्षेत्रीय सौहार्द और आर्थिक आधुनिकीकरण के बल पर राष्ट्रपति शौकत मिर्ज़ियोयेव ने उज़्बेकिस्तान को बनाया मध्य एशिया का सबसे भरोसेमंद कनेक्टिविटी हब।


प्राचीन सिल्क रोड (Silk Road) का ऐतिहासिक दिल कहा जाने वाला उज़्बेकिस्तान आज 21वीं सदी के ‘नए रेशम मार्ग’ (New Silk Road) के चौराहे पर एक नई पहचान गढ़ रहा है। अक्टूबर 2026 में वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और बड़े देशों के बीच जारी कूटनीतिक खींचतान के दौर में उज़्बेकिस्तान स्वयं एक विशेष प्रकार की शांत कूटनीति (Quiet Diplomacy) का प्रतीक बन गया है। राष्ट्रपति शौकत मिर्ज़ियोयेव (Shavkat Mirziyoyev) के नेतृत्व में ताशकंद ने एक ऐसी विदेश नीति अपनाई है जो अत्यधिक व्यावहारिक, संयमित और अपनी रणनीतिक गुंजाइश (Strategic Autonomy) के प्रति पूरी तरह सचेत है। किसी भी सैन्य ब्लॉक में शामिल हुए बिना यह देश पूर्व और पश्चिम, तथा उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाले एक शांतिपूर्ण सेतु के रूप में उभर रहा है।

उज़्बेकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी ब्योरों के अनुसार, 2016 के बाद से ‘न्यू उज़्बेकिस्तान’ (New Uzbekistan) सुधार एजेंडे के तहत देश ने अपनी पुरानी अलगाववादी नीति को अलविदा कह दिया है। रूस, चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ, भारत और खाड़ी देशों के बीच अपने राष्ट्रीय हितों का संतुलन बनाए रखते हुए उज़्बेकिस्तान ने ‘बहु-आयामी कूटनीति’ (Multi-Vector Diplomacy) को अपना आधार बनाया है। मध्य एशिया के केंद्र में स्थित यह देश अपने चारों ओर शांति, स्थिरता और गुड-नेबरलीनेस (अच्छा पड़ोस) का माहौल बनाकर न केवल विदेशी निवेश आकर्षित कर रहा है, बल्कि चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ और भारत के ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर’ के बीच एक मजबूत लॉजिस्टिक्स हब के रूप में काम कर रहा है।

1. शांत और संयमित कूटनीति: बिना शोर-शराबे के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा

उज़्बेकिस्तान की आधुनिक विदेश नीति के मुख्य सिद्धांत:

  • गैर-सैन्य गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment): उज़्बेकिस्तान किसी भी विदेशी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनता और न ही अपनी धरती पर किसी विदेशी सैन्य अड्डे की अनुमति देता है।
  • तनाव में मध्यस्थ की भूमिका: रूस-यूक्रेन संघर्ष या चीन-पश्चिम के तनावों के बीच ताशकंद ने किसी एक पक्ष का अंधानुकरण करने के बजाय आर्थिक और मानवीय रिश्तों को प्राथमिकता दी है।
  • विवादों का शांतिपूर्ण समाधान: संप्रभु समानता, सीमाओं की अखंडता और दूसरों के आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप के सिद्धांतों का कड़ाई से पालन।

2. ‘नया रेशम मार्ग’ और रणनीतिक कनेक्टिविटी का केंद्र

उज़्बेकिस्तान के इस रणनीतिक कायाकल्प को समझने के लिए प्रमुख पहलू:

कूटनीतिक पहलू (Diplomatic Pillar) नीतिगत दृष्टिकोण (Policy Approach) वैश्विक व क्षेत्रीय प्रभाव (Impact)
बहु-आयामी संतुलन (Multi-Vectorism) चीन, रूस, अमेरिका व भारत से समान दूरी व संबंध रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) की सुरक्षा
मध्य एशियाई सौहार्द (Central Asian Solidarity) पड़ोसियों (कजाकिस्तान, तजाकिस्तान आदि) से सीमा विवाद हल संपूर्ण मध्य एशिया का एकीकृत आर्थिक बाजार बनना
ट्रांस-अफगान रेल नेटवर्क (Trans-Afghan Rail) ताशकंद से काबुल होते हुए पाकिस्तान/हिंद महासागर तक दक्षिण एशिया व मध्य एशिया के बीच सीधा व्यापारिक मार्ग
सांस्कृतिक व डिजिटल कूटनीति समरकंद व बुखारा के जरिए ऐतिहासिक धरोहर का प्रचार वैश्विक पर्यटन और शांति संवाद के मंच के रूप में पहचान

3. मध्य एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता का नया अध्याय

पूर्व में मध्य एशियाई देशों के बीच जल बंटवारे, सीमांकन और व्यापार को लेकर जो तनाव थे, ताशकंद की नई पहल से वे अब खत्म हो रहे हैं:

  1. अराल सागर और पर्यावरण कूटनीति: जलवायु परिवर्तन और अराल सागर के जल संकट से निपटने के लिए उज़्बेकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पर्यावरण-अनुकूल नीतियों का नेतृत्व किया है।
  2. अफगानिस्तान में शांति और पुनर्निर्माण: पड़ोसी देश अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए उज़्बेकिस्तान ने खाद्य सहायता, बिजली आपूर्ति और ढांचागत परियोजनाओं (जैसे रेलवे) के माध्यम से व्यावहारिक रुख अपनाया है।
  3. भारत-उज़्बेकिस्तान संबंध: भारत के साथ ताशकंद का फार्मास्युटिकल, आईटी, अंतरिक्ष और रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है, जो ‘चाबहार पोर्ट’ के जरिए मध्य एशिया को जोड़ने का माध्यम बन रहा है।

4. आगे की राह : 2030 तक उज़्बेकिस्तान का विज़न

उज़्बेकिस्तान की ‘शांत कूटनीति’ आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीति में एक उदाहरण बनेगी:

  • ‘उज़्बेकिस्तान-2030’ रणनीति: देश का लक्ष्य दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होना और विश्व व्यापार संगठन (WTO) की सदस्यता प्राप्त करना है।
  • आर्थिक आधुनिकीकरण: केवल प्राकृतिक संसाधनों (कपास, सोना, गैस) के निर्यात पर निर्भर रहने के बजाय हाई-टेक उद्योगों और मूल्य संवर्धन (Value Addition) को बढ़ावा देना।
  • वैश्विक शांति मंच: समरकंद और ताशकंद को वैश्विक शिखर सम्मेलनों (जैसे SCO, UN सम्मेलनों) के निष्पक्ष स्थल के रूप में विकसित करना।

निष्कर्ष 

‘नए रेशम मार्ग’ की इस यात्रा में उज़्बेकिस्तान ने यह साबित कर दिया है कि किसी देश की शक्ति केवल उसकी सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि उसकी कूटनीतिक परिपक्वता, स्थिरता और रचनात्मक संवाद से तय होती है। अपनी सीमाओं और अवसरों के प्रति पूरी तरह सचेत रहते हुए उज़्बेकिस्तान की यह ‘शांत और व्यावहारिक कूटनीति’ मध्य एशिया को विश्व राजनीति और व्यापार का नया शक्ति-केंद्र बना रही है।

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By Kanchan

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