भक्ति का अनूठा सत्याग्रह: भारतबाला की ‘रामनामी’ को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार; जानिए छत्तीसगढ़ के उस सम्प्रदाय की कहानी जो शरीर पर गोदवाता है ‘राम’ नाम

72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने निर्देशक भारतबाला को सौंपा सम्मान; छुआछूत और मंदिर प्रवेश निषेध के खिलाफ 130 साल पहले शुरू हुई थी शरीर पर ‘राम’ नाम उकेरने की अनूठी परंपरा।


प्रसिद्ध फिल्म निर्माता भारतबाला गणापति (Bharatbala Ganapathy) की चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘रामनामी’ (Ram-Nami) ने देश के सबसे प्रतिष्ठित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (72nd National Film Awards) में ‘सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र’ (Best Documentary) का राष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किया है। गुजरात के केवड़िया स्थित एकता नगर (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के समीप) आयोजित भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने निर्देशक भारतबाला को इस गौरवशाली पुरस्कार से सम्मानित किया। यह डाक्यूमेंट्री छत्तीसगढ़ के मध्य और उत्तरी जिलों में फैले रामनामी सम्प्रदाय (Ramnami Community) की 130 वर्ष पुरानी अनूठी धार्मिक व सांस्कृतिक परंपरा और उनके सामाजिक संघर्ष की गाथा को राष्ट्रीय पटल पर उजागर करती है।

भरतबाला की 'रामनामी' को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

रामनामी समाज की स्थापना 1890 के दशक में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर क्षेत्र में एक दलित ग्रामीण परशुराम भारद्वाज (Parasuram Bharadwaj) द्वारा की गई थी। उस दौर में सवर्णों और मंदिर पुजारियों द्वारा जब दलितों को मंदिर में प्रवेश करने और भगवान राम की पूजा करने से रोका गया, तो परशुराम ने अपने पूरे शरीर पर ‘राम’ नाम का गोदना (Tattoo) बनवाकर इसका अहिंसक विरोध जताया। उनका मानना था कि ईश्वर किसी मंदिर या मूर्ति में सीमित नहीं है, बल्कि हर इंसान के भीतर बसा है। इसके बाद पूरा समाज अपने चेहरे, माथे और अंग-प्रत्यंग पर ‘राम’ नाम अंकित कराने लगा, जिसे फिल्म निर्माता भारतबाला ने गायक कैलाश खेर (Kailash Kher) के गीत “राम ही पार लगावेंगे” के साथ बेहद संवेदनशील तरीके से पर्दे पर उतारा है।

1. मंदिर प्रवेश से इनकार बना भक्ति का विद्रोह: कैसे शुरू हुई ‘रामनामी’ परंपरा?

छत्तीसगढ़ में रामनामी सम्प्रदाय के जन्म और उनके सिद्धांतों का ऐतिहासिक सफर:

  • ‘रोम-रोम में राम’ की अवधारणा: जब दलित समाज को मंदिरों के बाहर रोका गया, तो उन्होंने अपने शरीर को ही राम का मंदिर बना लिया। समाज के लोग मानते हैं—“बाहर राम, भीतर राम, मोरा रोम-रोम राम ही राम।”
  • जातिगत भेदभाव को चुनौती: रामनामियों ने बिना किसी हिंसा के केवल अपने शरीर पर ईश्वर का नाम लिखकर स्थापित सामाजिक व्यवस्था और छुआछूत को चुनौती दी।
  • निराकार भक्ति और रामचरितमानस: यह समाज किसी मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता। इनके मुख्य ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ का पाठ करना और सिर पर मोर पंख का मुकुट व सफेद वस्त्र धारण करना इनकी पहचान है।

छत्तीसगढ़ की अनूठी रामभक्ति को राष्ट्रीय सम्मान, डाक्यूमेंट्री 'राम-नामी' को मिला 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, बढ़ा प्रदेश का मान

2. रामनामी गोदना के प्रकार और रूप (Types of Ramnami Tattoos)

रामनामी समाज में शरीर पर ‘राम’ नाम अंकित कराने की गहराई के आधार पर अलग-अलग श्रेणियां होती हैं:

गोदना का प्रकार (Tattoo Category) शरीर का क्षेत्र (Body Area Covered) सामाजिक व धार्मिक महत्व (Significance)
माथेबादा (Shiromani/Mathebada) केवल माथे और चेहरे पर ‘राम’ नाम सम्प्रदाय के शुरुआती चरण में अपनाया जाने वाला रूप
सर्वांग रामनामी (Sarvang Ramnami) हाथ, छाती और पीठ सहित अधिकांश शरीर पर भक्ति की गहन अवस्था को प्रदर्शित करता है
नखशिख रामनामी (Nakhshikh Ramnami) सिर के बालों से लेकर पैर के नाखूनों तक पूर्ण समर्पण; पूरे शरीर पर केवल ‘राम’ नाम की छाप
सफेद ओढ़नी (Ramnami Shawl) सफेद कपड़े पर ‘राम’ नाम की छपाई वस्त्र के रूप में राम नाम धारण करने वाले अनुयायी

3. “यह पुरस्कार रामनामी समाज का है”: निर्देशक भारतबाला और कैलाश खेर की जुगलबंदी

पुरस्कार प्राप्त करने के बाद निर्देशक भारतबाला ने अपनी भावनाएं व्यक्त कीं:

रामनामी सम्प्रदाय... छत्तीसगढ एक ऐसा समुदाय जिसके विषय में बहुत ही कम लोग जानते हैं तो आइए आज उनके विषय में जानते हैं I छत्तीसगढ में ये लोग ...

  1. भारतबाला का वक्तव्य: “राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करना मेरे लिए सम्मान की बात है, लेकिन यह पुरस्कार मेरा नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज का है। उनकी आस्था केवल एक पूजा-पद्धति नहीं है, वे इसे अपने शरीर और अपनी सांसों में लेकर जीते हैं।”
  2. कैलाश खेर के साथ संयोग: एयरपोर्ट पर एक आकस्मिक मुलाकात के दौरान गायक कैलाश खेर इस प्रोजेक्ट से जुड़े और उन्होंने “राम ही पार लगावेंगे” गाना गाकर फिल्म की आत्मा को संगीतमय कर दिया।
  3. संस्कृति मंत्री की सराहना: छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि इस राष्ट्रीय पुरस्कार से छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा और आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक पहचान मिली है।

निष्कर्ष 

भारतबाला की डाक्यूमेंट्री ‘रामनामी’ को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार केवल एक फिल्म की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत के उस अहिंसक और समतावादी सामाजिक आंदोलन की जीत है जिसने भक्ति को सामाजिक न्याय का हथियार बनाया। छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज की यह कहानी सिखाती है कि सच्ची आस्था किसी दीवार, जाति या मंदिर की मोहताज नहीं होती, वह इंसान के भीतर और उसके आचरण में रची-बसी होती है।

अन्य ख़बरें !

By Kanchan

One thought on “Bharatbala Ramnami Documentary: ‘रामनामी’ को मिला राष्ट्रीय पुरस्कार; जानिए छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज की कहानी”

Comments are closed.