बक्सा टाइगर रिजर्व में लौटी बाघिन की दहाड़, बिहार से आई T138 अब खुले जंगल में, तीन और बाघों की तैयारी

बक्सा टाइगर रिजर्व में लंबे इंतजार के बाद बाघों की स्थायी वापसी की उम्मीद मजबूत हुई है। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई करीब तीन साल की बाघिन T138 ने 4 अक्टूबर की शाम अपने सॉफ्ट एनक्लोजर से बाहर निकलकर बक्सा के जंगल में कदम रखा। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल के पहले बड़े बाघ पुनर्वास अभियान का अहम चरण पूरा हुआ। अब वन विभाग की नजर उसके नए इलाके में व्यवहार, भोजन की उपलब्धता और सुरक्षित तरीके से क्षेत्र अपनाने पर है।

बिहार के वाल्मीकि रिजर्व से बक्सा पहुंची बाघिन बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई करीब तीन साल की बाघिन को बक्सा टाइगर रिजर्व में ...

2 अक्टूबर को हुई थी पहली रिहाई

बाघिन को 30 सितंबर को बिहार से पश्चिम बंगाल लाया गया था। उसे विशेष निगरानी और चिकित्सकीय जांच के बाद बक्सा में लगभग 2.2 से 2.3 हेक्टेयर के सॉफ्ट एनक्लोजर में रखा गया, ताकि वह नए वातावरण के अनुरूप ढल सके। 2 अक्टूबर को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की मौजूदगी में उसके लिए बाड़े का द्वार खोला गया। शुरुआती दिनों में उसे जल्दबाजी में खुले जंगल में नहीं भेजा गया, क्योंकि वन अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना था कि वह नए क्षेत्र में सामान्य व्यवहार करे और खुद शिकार करने में सक्षम हो।

अब T138 ने खुद जंगल चुना

The number of tigers has increased in Bihar, now their population has reached 80

5 अक्टूबर को सामने आई जानकारी के अनुसार T138 शाम के समय सॉफ्ट एनक्लोजर से निकलकर जंगल के बड़े हिस्से में पहुंच गई। यह बाघिन की प्राकृतिक अनुकूलन क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। उसके शरीर पर निगरानी के लिए रेडियो या उपग्रह कॉलर लगाया गया है, जिससे उसकी गतिविधियों, स्वास्थ्य और क्षेत्रीय व्यवहार पर लगातार नजर रखी जा सकेगी। कैमरा ट्रैप और वनकर्मियों की मैदानी निगरानी भी इस अभियान का हिस्सा है।

बक्सा में क्यों जरूरी है बाघों की वापसी?

बक्सा टाइगर रिजर्व उत्तर बंगाल के डुआर्स क्षेत्र में स्थित है और इसका कुल क्षेत्रफल करीब 760 वर्ग किलोमीटर है। इसे 1983 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत देश का 15वां बाघ रिजर्व घोषित किया गया था। इसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भूटान और असम के जंगलों से जुड़े बड़े पारिस्थितिक परिदृश्य का हिस्सा है। ऐसे क्षेत्र में बाघों की मौजूदगी केवल एक प्रजाति की वापसी नहीं, बल्कि पूरे वन तंत्र के संतुलन से जुड़ा विषय है।

हालांकि बक्सा में वर्षों तक स्थायी बाघ आबादी नहीं रही, लेकिन जंगल ने बाघों से पूरी तरह रिश्ता नहीं खोया था। कैमरा ट्रैप में 2021 और 2023 में बाघ दर्ज किए गए थे। 2023 में दर्ज एक बाघ की पहचान असम के मानस टाइगर रिजर्व के बाघ से मेल खाने की बात भी सामने आई थी। इससे संकेत मिला कि बाघ आसपास के बड़े वन क्षेत्रों के बीच आवाजाही कर रहे हैं, लेकिन बक्सा में स्थायी आबादी स्थापित नहीं हो पा रही थी।

पुनर्वास से पहले बदला गया जंगल का आधार

बुक्सा टाइगर रिज़र्व में बाघिन को लाया गया

बाघों को केवल जंगल में छोड़ देना इस योजना का उद्देश्य नहीं है। सरकार और वन्यजीव विशेषज्ञों ने 2018 से बक्सा में आवास सुधार, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने, घासभूमि बहाल करने, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और वन्यजीव गलियारों पर काम किया है। सरकारी जानकारी के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में 800 से अधिक चीतल छोड़े गए हैं और करीब 380 हेक्टेयर घासभूमि बहाल या विकसित की गई है। निगरानी में शिकार आधार में सुधार के संकेत मिले हैं।

आगे तीन और बाघ लाने की योजना

बक्सा में T138 की एंट्री इस योजना की शुरुआत भर है। पश्चिम बंगाल सरकार के अनुसार अगले दो महीनों में तीन और बाघ यहां लाए जाने की योजना है। व्यापक परियोजना का लक्ष्य ऐसी आबादी तैयार करना है जो आगे चलकर खुद प्रजनन कर सके और लंबे समय तक स्थिर बनी रहे।

लेकिन सफलता आसान नहीं होगी। पर्याप्त शिकार, सुरक्षित आवास, वन्यजीव गलियारों की निरंतरता और मानव-बाघ संघर्ष को नियंत्रित करना इस अभियान की असली परीक्षा होगी। बक्सा की कहानी इसलिए केवल एक बाघिन के लौटने की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की भी परीक्षा है कि क्या वर्षों से कमजोर पड़ चुकी पारिस्थितिकी को वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए फिर से इतना मजबूत किया जा सकता है कि जंगल अपने बाघ खुद संभाल सके।

निष्कर्ष

T138 का खुले जंगल में जाना बक्सा टाइगर रिजर्व के लिए उम्मीद भरा मोड़ है, लेकिन इसे अंतिम सफलता मानना अभी जल्दबाजी होगी। आने वाले महीनों में उसकी गतिविधियां, शिकार करने की क्षमता, क्षेत्र का उपयोग और संभावित अन्य बाघों के साथ उसका व्यवहार यह तय करेगा कि यह महत्वाकांक्षी पुनर्वास कार्यक्रम कितनी मजबूती से आगे बढ़ता है।

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By Kanchan

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