न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता: मौत की सजा में माफी पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से चर्चा में आए न्यायमूर्ति, जानें पूरा सफर

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता इन दिनों गंभीर अपराधों में सजा कम करने और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर अपनी टिप्पणियों के कारण चर्चा में हैं। 8 अक्टूबर 2026 को एक मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने की न्यायिक प्रवृत्ति की भी एक सीमा होनी चाहिए। अगले दिन पंजाब सरकार की याचिका से जुड़े मामले में भी उनकी एक टिप्पणी सुर्खियों में रही। इन घटनाक्रमों ने न्याय, दंड, सुधार और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन पर बहस को फिर सामने ला दिया है।

मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने पर क्या बोले जस्टिस दत्ता?

सुप्रीम कोर्ट की माफ करने की कोई तो लिमिट हो... मौत की सजा बदलने पर जस्टिस दीपांकर दत्ता की अहम टिप्पणी | Justice Dipankar Datta remark on Supreme Court tendency to forgive

8 अक्टूबर को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ एक ऐसे दंपती की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो 2001 में हरियाणा के हिसार जिले में एक पूर्व विधायक के परिवार के आठ सदस्यों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। याचिका में समयपूर्व रिहाई की मांग की गई थी।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता ने गंभीर अपराधों में मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने की न्यायिक प्रवृत्ति पर मौखिक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अदालत की माफी करने की प्रवृत्ति की भी एक सीमा होनी चाहिए और किसी बिंदु पर रेखा खींचनी होगी।

उन्होंने ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ यानी ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराधों की गंभीरता को देखते हुए सजा के मामलों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणियां थीं। इन्हें अपने-आप में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला या मौत की सजा संबंधी कानून में बदलाव नहीं माना जाना चाहिए।

पंजाब सरकार के मामले में भी चर्चा में आए

9 अक्टूबर को न्यायमूर्ति दत्ता की पीठ पंजाब सरकार की उस याचिका पर सुनवाई करने वाली थी, जिसमें मुख्यमंत्री भगवंत मान के कार्यालय से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच के पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी।

इस दौरान न्यायमूर्ति शील नागू सुनवाई से अलग हो गए। उन्होंने पहले पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में काम किया था और मामले से जुड़े कुछ प्रकरणों को पहले देख चुके थे।

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इस घटनाक्रम पर न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा, “हम बहुत कठिन समय में हैं। पता नहीं हमला कहां से आ जाएगा।” इसके बाद मामला दूसरी पीठ को सौंपने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने की बात कही गई।

कौन हैं न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता?

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता का जन्म 9 फरवरी 1965 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सलील कुमार दत्ता भी न्यायिक क्षेत्र से जुड़े रहे हैं।

उन्होंने 1989 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हाजरा लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी की और उसी वर्ष पश्चिम बंगाल बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया। करीब 16 वर्षों तक उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट, अन्य उच्च न्यायालयों, अधिकरणों और सुप्रीम कोर्ट में वकालत की। इस दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल सरकार, केंद्र सरकार और विभिन्न वैधानिक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व भी किया।

कलकत्ता हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

22 जून 2006 को न्यायमूर्ति दत्ता कलकत्ता हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश नियुक्त हुए। इसके बाद 28 अप्रैल 2020 को उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया।

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बॉम्बे हाईकोर्ट में ढाई वर्ष से अधिक समय तक सेवा देने के बाद उन्होंने 12 दिसंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, उनका सेवानिवृत्ति दिवस 8 फरवरी 2030 निर्धारित है।

न्यायिक टिप्पणियों का क्या महत्व है?

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की मौखिक टिप्पणियां अक्सर महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक मुद्दों पर बहस को जन्म देती हैं। हालांकि, कानूनी रूप से किसी मामले में अंतिम आदेश और सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी में अंतर होता है।

मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने, दोषियों की समयपूर्व रिहाई और दंड के उद्देश्य जैसे मुद्दों पर न्यायपालिका को अपराध की गंभीरता, पीड़ितों के अधिकार, दोषसिद्ध व्यक्ति के सुधार की संभावना और कानून के निर्धारित मानकों को ध्यान में रखना होता है।

न्यायमूर्ति दत्ता की हालिया टिप्पणियां इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं। उनका वास्तविक कानूनी प्रभाव संबंधित मामलों में जारी होने वाले आदेशों और लागू न्यायिक सिद्धांतों के आधार पर ही निर्धारित होगा।

निष्कर्ष

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता का न्यायिक सफर कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत से शुरू होकर बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश तक पहुंचा है। अक्टूबर 2026 में गंभीर अपराधों की सजा और न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों पर उनकी टिप्पणियों ने उन्हें चर्चा में ला दिया है। इन बयानों को समझते समय मौखिक टिप्पणी और अदालत के अंतिम फैसले के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

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By Kanchan

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