जनसांख्यिकीय समिति  ने राज्यों से मांगा 15 साल का ‘धर्म-वार’ डेटा; संपत्ति, वाहन और स्कूल दाखिले के सवालों पर घिरी सरकार

सेवानिवृत्त जस्टिस पी.पी. नावलेकर समिति ने राज्यों को भेजी 35 प्रश्नों की प्रश्नावली; राज्यों ने धर्म- आधारित रिकॉर्ड न होने का दिया हवाला, कांग्रेस ने बताया ‘पूर्वाग्रह से ग्रसित एजेंडा’।

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अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलावों के अध्ययन के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा गठित ‘उच्चस्तरीय जनसांख्यिकीय परिवर्तन समिति’ (HLCDC) ने देश की राज्य सरकारों को एक 35-प्रश्नों वाली विस्तृत प्रश्नावली भेजी है। 26 मई 2026 को सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में बनी इस समिति ने राज्यों से पिछले 15 वर्षों का जिला-वार और धर्म-वार (Religion-Wise) डेटा मांगा है। इस डेटा में जन्म दर, स्कूलों में नामांकन, संपत्ति खरीद-बिक्री, वाहन पंजीकरण, पहचान पत्रों (आधार व वोटर आईडी) में अचानक वृद्धि और धार्मिक ढांचों के निर्माण का ब्योरा शामिल है। हालांकि, इस मांग ने राज्य प्रशासनों को असमंजस में डाल दिया है क्योंकि सरकारी विभाग सामान्य तौर पर नागरिकों का प्रशासनिक रिकॉर्ड धर्म के आधार पर नहीं रखते हैं।

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द हिंदू और सिविल्स डेली की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, यह समिति मुख्य रूप से अवैध अप्रवासन और असामान्य कारणों से सीमावर्ती व अन्य क्षेत्रों में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलावों (Demographic Shifts) का अध्ययन करने के लिए बनाई गई थी। हालांकि, समिति द्वारा राज्यों से छह धार्मिक समुदायों—हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी और बौद्ध—के दैनिक प्रशासनिक जीवन का डेटा मांगे जाने से एक नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्यों का कहना है कि आरटीओ (RTO), भूमि निबंधन (Property Registration) और स्कूली शिक्षा जैसे विभाग धर्म के आधार पर फाइलें वर्गीकृत नहीं करते हैं। दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे प्रशासनिक व्यवस्था का ध्रुवीकरण करने का प्रयास करार दिया है।

1. 35 प्रश्नों की प्रश्नावली: समिति ने किन-किन क्षेत्रों का मांगा ब्योरा?

जस्टिस पी.पी. नावलेकर समिति द्वारा राज्यों को भेजी गई प्रश्नावली में प्रशासनिक और सामाजिक जीवन के कई संवेदनशील पहलुओं पर सवाल पूछे गए हैं:

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  • जन्म व शिक्षा का आंकड़ा: पिछले 15 वर्षों में देर से हुए जन्म पंजीकरण, संस्थागत/गैर-संस्थागत जन्म और प्राथमिक से लेकर उच्च विद्यालयों में धर्म-वार छात्र नामांकन।
  • संपत्ति व वाहनों का पंजीकरण: किस जिले में किस समुदाय द्वारा कितनी जमीन-जायदाद खरीदी गई और वाणिज्यिक व निजी वाहनों का पंजीकरण किसके नाम पर है।
  • पहचान पत्रों में अचानक उछाल: आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) और राशन कार्ड में किन जिलों में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई है।
  • धार्मिक ढांचे व मैपिंग: 15 वर्षों में निर्मित मस्जिद, मंदिर, चर्च और अन्य धार्मिक स्थल, तथा क्या उनकी जीआईएस (GIS) मैपिंग की गई है।
  • धर्मांतरण व डिटेंशन सेंटर: अनुसूचित जनजाति (ST) क्षेत्रों में धार्मिक धर्मांतरण से जुड़ी खुफिया रिपोर्टें और राज्य में संचालित डिटेंशन सेंटरों व निर्वासित अवैध प्रवासियों का ब्योरा।

2. राज्य सरकारों की असमर्थता: “हमारे पास नहीं है धर्म-वार रिकॉर्ड”

समिति के इस कदम से राज्यों के प्रशासनिक तंत्र के सामने बड़ी व्यावहारिक चुनौती खड़ी हो गई है:

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  • विभागीय फाइलों में धर्म का कॉलम नहीं: ट्रांसपोर्ट विभाग (RTO) और प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन विभाग केवल नागरिक की पहचान और करों का रिकॉर्ड रखते हैं, न कि उनके धर्म का।
  • केवल जनगणना में होता है धर्म-वार संकलन: सामान्य सरकारी कामकाज के दौरान जनगणना (Census) के अलावा दैनिक आधार पर धार्मिक आंकड़े एकत्र नहीं किए जाते।
  • असंभव समय-सीमा: राज्यों के अधिकारियों का कहना है कि लाखों फाइलों को पलटकर 15 साल का धर्म-आधारित वर्गीकरण तैयार करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

3. राजनीतिक विवाद और विपक्ष के तीखे हमले

इस प्रश्नावली के सार्वजनिक होते ही देश की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है:

  1. कांग्रेस का हमला: कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर इस रिपोर्ट को साझा करते हुए आरोप लगाया कि समिति का एजेंडा “पूर्वाग्रह से ग्रसित और ध्रुवीकरण करने वाला” है, जिसकी रिपोर्ट पहले से तैयार रखी गई है।
  2. गृह मंत्रालय का पक्ष: समिति से जुड़े सूत्रों का कहना है कि घुसपैठ और अवैध प्रवासियों के प्रभाव को समझने के लिए जमीनी सामाजिक बदलावों और संसाधनों के उपभोग का सटीक आंकड़ा जुटाना आवश्यक है।
  3. संवैधानिक व गोपनीयता संबंधी चिंताएं: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य प्रशासनिक सेवाओं को धर्म से जोड़ना नागरिकों की गोपनीयता और धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़े करता है।

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निष्कर्ष 

अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक अध्ययन निश्चित रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और नीति-निर्माण का विषय है। हालांकि, आरटीओ, स्कूल नामांकन और संपत्ति सौदों जैसे दैनिक नागरिक कामकाज से 15 साल का धर्म-वार डेटा मांगने का समिति का प्रयास व्यावहारिक और राजनीतिक रूप से अत्यंत जटिल साबित हो रहा है। जब तक राज्य सरकारें और केंद्र मिलकर ऐसे आंकड़ों की उपलब्धता और इसके औचित्य पर कोई सहमति नहीं बना लेते, तब तक नावलेकर समिति की इस जांच पर प्रशासनिक और राजनीतिक गतिरोध बने रहने की पूरी संभावना है।

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By Kanchan

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