DOTS से DOST तक: 2026 में भारत की टीबी उन्मूलन रणनीति में क्या बदल रहा है
भारत में टीबी (क्षय रोग) से लड़ाई अब एक निर्णायक मोड़ पर है। दशकों से चली आ रही DOTS रणनीति के बाद अब देश एक नए, ज़्यादा मानवीय ढाँचे की ओर बढ़ रहा है। 2026 में इस विषय पर कई अहम आँकड़े और नीतिगत बदलाव सामने आए हैं।
DOTS क्या है और यह कैसे काम करती है?
DOTS ऐसी रणनीति है जिसमें मरीज़ निगरानी में दवा लेता है, ताकि पूरा इलाज हो और दवा-प्रतिरोधी टीबी न पनपे। इसमें जाँच और दवाएँ मुफ़्त होती हैं और इलाज कम से कम 6 से 8 महीने चलता है। पूरे देश में यह व्यवस्था लागू है।
आँकड़े क्या कहते हैं?
भारत आज भी दुनिया के टीबी बोझ का लगभग एक-चौथाई हिस्सा उठाता है, लेकिन प्रगति साफ़ दिखती है। 2015 से 2024 के बीच देश में टीबी के नए मामलों में 21% और इससे होने वाली मौतों में 28% की गिरावट आई। WHO की ग्लोबल टीबी रिपोर्ट 2025 के अनुसार उपचार कवरेज 2015 के 53% से बढ़कर 2024 में 92% हो गया।
टीबी मुक्त भारत अभियान की भूमिका
7 दिसंबर 2024 से शुरू हुए इस अभियान में 20 करोड़ से ज़्यादा संवेदनशील लोगों की जाँच हुई और 28 लाख से अधिक मरीज़ों की पहचान की गई। साथ ही तकनीक का भी सहारा लिया जा रहा है। कार्यक्रम में खाँसी की आवाज़ से स्क्रीनिंग, छाती के एक्स-रे पढ़ने और अधिक जोखिम वाले मरीज़ों को चिह्नित करने में एआई का उपयोग हो रहा है।
DOTS से DOST: नया ढाँचा
फ़रवरी 2026 में द लैंसेट रीजनल हेल्थ (दक्षिण-पूर्व एशिया) में एक शोध-पत्र छपा, जिसके लेखकों में राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं। इसमें “DOST” नाम का ढाँचा सुझाया गया। हिंदी शब्द “दोस्त” से प्रेरित यह मरीज़-केंद्रित तरीका चिकित्सा और सामाजिक सहायता को जोड़ता है। इसके पहले चरण में सघन जाँच, शुरुआत में ही आणविक निदान और मज़बूत इलाज पर ज़ोर है, जैसा 100-दिवसीय टीबी अभियान में देखा गया। शोध-पत्र के अनुसार DOST, DOTS की विरासत पर बना है, पर उससे आगे जाता है।
निक्षय मित्र: समाज की भागीदारी
निक्षय मित्र वह व्यक्ति है जो इलाज के दौरान मरीज़ की मदद करने वाला “टीबी दोस्त” बनता है। इस समुदाय-आधारित पहल में स्वयंसेवक मरीज़ों को पोषण और सामाजिक सहयोग देते हैं, ताकि इलाज के नतीजे बेहतर हो।
अब भी क्या चुनौतियाँ हैं?
- लक्ष्य पीछे छूटा: भारत ने 2025 तक टीबी उन्मूलन का लक्ष्य रखा था, जो हासिल नहीं हुआ।
- प्रवासी मज़दूर: अनौपचारिक मज़दूरों के एक जगह से दूसरी जगह जाने के कारण स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मरीज़ों को ढूँढना और इलाज निर्बाध रखना कठिन होता है।
- बिना लक्षण वाले मरीज़: राष्ट्रीय टीबी प्रसार सर्वे के मुताबिक़ देश में लगभग आधे मामले बिना लक्षण वाले हैं। विश्व टीबी दिवस 2026
इस वर्ष की थीम “हाँ! हम टीबी को ख़त्म कर सकते हैं: देशों के नेतृत्व में, लोगों की शक्ति से” रही।
आम नागरिक क्या करें?
दो हफ़्ते से ज़्यादा खाँसी, बुखार, वज़न घटना या रात में पसीना आए तो नज़दीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जाँच कराएँ। जाँच और इलाज दोनों निःशुल्क हैं। केंद्रीय टीबी विभाग की वेबसाइट पर निक्षय ऐप की जानकारी उपलब्ध है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि दवा का कोर्स बीच में न छोड़ें, क्योंकि अधूरा इलाज दवा-प्रतिरोधी टीबी का ख़तरा बढ़ाता है।
आँकड़े बताते हैं कि भारत सही दिशा में है, पर मंज़िल अभी दूर है। DOTS ने इलाज की नींव रखी, और अब DOST जैसा दृष्टिकोण मरीज़ को अकेला न छोड़ने की बात करता है। जब समाज, सरकार और स्वास्थ्यकर्मी साथ आएँगे, तभी टीबी मुक्त भारत का सपना पूरा होगा।
(डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सूचना के लिए है। किसी भी लक्षण पर डॉक्टर से सलाह लें।)
