नेहा बोरा कौन हैं? दिल्ली हाईकोर्ट में ₹10,000 के शांति मुचलके पर आज फैसला, जानें पूरा मामला
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा इन दिनों दिल्ली में छात्र प्रदर्शनों और पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देने वाली अपनी याचिका के कारण चर्चा में हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 अक्टूबर 2026 को उनकी याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत 23 अक्टूबर को शाम 6 बजे आदेश सुनाने वाली है। नेहा ने दिल्ली पुलिस द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें ₹10,000 का निजी शांति मुचलका और एक जमानतदार देने को कहा गया है। यह नोटिस 16 अक्टूबर को हुए ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च के बाद जारी किया गया था। मामला शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की निवारक कार्रवाई की वैधता से जुड़ा है।
कौन हैं नेहा बोरा?
29 वर्षीय नेहा बोरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में शोधार्थी हैं और देश के प्रमुख वामपंथी छात्र संगठनों में शामिल AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वह छात्र आंदोलनों, शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रही हैं।
नेहा ने दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में पढ़ाई की है। राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में उनकी दिलचस्पी कॉलेज के दिनों में बढ़ी। 2019-20 के दौरान नागरिकता कानून के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में भी वह सक्रिय थीं। बाद में उन्होंने परीक्षा प्रश्नपत्र लीक, बेरोजगारी, असमानता और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े मुद्दों पर छात्र संगठनों के साथ काम किया।
अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।
क्या है ₹10,000 के शांति मुचलके का मामला?
16 अक्टूबर को दिल्ली में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च के दौरान नेहा बोरा समेत कई प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया था। उन्हें अगले दिन रिहा कर दिया गया।
इसके बाद दिल्ली पुलिस की ओर से जारी नोटिस में उन्हें विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष ₹10,000 का निजी मुचलका और एक जमानतदार प्रस्तुत करने को कहा गया। यह कार्रवाई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत शांति बनाए रखने से संबंधित निवारक प्रक्रिया का हिस्सा बताई गई।
नेहा ने इस नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि नोटिस का पर्याप्त तथ्यात्मक आधार नहीं है और इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध को सीमित करने के लिए किया जा रहा है।
वहीं, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट को शांति भंग होने की आशंका पर निवारक कार्रवाई करने का अधिकार है। पुलिस ने याचिका की सुनवाई योग्य होने पर भी सवाल उठाए।
दिल्ली हाईकोर्ट में क्या हुआ?
22 अक्टूबर को न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें लगभग ढाई से तीन घंटे तक सुनीं और आदेश सुरक्षित रख लिया। अदालत ने कहा कि वह 23 अक्टूबर को शाम 6 बजे फैसला सुनाएगी।
सुनवाई के दौरान लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की मांग, शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर भी बहस हुई। नेहा की ओर से कहा गया कि लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना अपने आप में गलत नहीं है। पुलिस पक्ष ने तर्क दिया कि सत्ता परिवर्तन का रास्ता मतदान है और विरोध प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है।
फिलहाल अदालत का अंतिम आदेश सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पुलिस का नोटिस रद्द होगा या नेहा को शांति मुचलका भरना पड़ेगा।
नेहा बोरा का मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला केवल एक छात्र नेता के नोटिस तक सीमित नहीं है। इसमें सवाल है कि प्रशासन शांति बनाए रखने के लिए निवारक शक्तियों का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में कर सकता है और शांतिपूर्ण विरोध करने वालों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा कैसे की जानी चाहिए।
अदालत के फैसले से नेहा की याचिका और संबंधित नोटिस की वैधता पर स्थिति स्पष्ट होगी। हालांकि, आदेश का वास्तविक दायरा अदालत के लिखित फैसले से ही समझा जा सकेगा।

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