नीरज शेखर का राज्यसभा टिकट कटा: चंद्रशेखर परिवार लगभग चार दशक में पहली बार संसद से बाहर
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे और बलिया की राजनीति के चर्चित चेहरे नीरज शेखर इन दिनों सुर्खियों में हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए 8 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, जिसमें नीरज शेखर का नाम नहीं है। उनका मौजूदा राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार इससे लगभग चार दशक में पहली बार ऐसा होगा जब “शेखर परिवार” का कोई सदस्य लोकसभा या राज्यसभा, दोनों में से किसी भी सदन में नहीं होगा।
भाजपा की सूची में नाम नहीं
भाजपा ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए जिन आठ नामों की घोषणा की है, उनमें इस बार कई नए चेहरे शामिल हैं। नीरज शेखर, जो भाजपा से लगातार राज्यसभा सांसद थे, इस सूची से बाहर हैं। पूर्वांचल की राजनीति में इसे बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
नीरज शेखर का राजनीतिक सफर
नीरज शेखर का जन्म राजनीतिक परिवार में हुआ। उनके पिता चंद्रशेखर, जिनका जन्म 17 अप्रैल 1927 को बलिया के इब्राहिमपट्टी गांव में हुआ था, देश के आठवें प्रधानमंत्री रहे और बलिया से कई बार लोकसभा पहुंचे। 2007 में उनके निधन के बाद नीरज शेखर ने विरासत संभाली।
- 2007: बलिया लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) के टिकट पर जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे।
- 2009: लोकसभा चुनाव में दोबारा जीत।
- 2014: चुनाव हार गए। इसके बाद सपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा।
- 2019: सपा और राज्यसभा सीट दोनों से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए। उपचुनाव में राज्यसभा पहुंचे।
- 2020: भाजपा ने उन्हें फिर राज्यसभा भेजा।
- 2024: भाजपा के टिकट पर बलिया से लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन सपा के सनातन पांडे से हार गए।
हाल के महीनों में भी वह सक्रिय रहे। अप्रैल 2026 में उन्होंने चंद्रशेखर हाफ मैराथन के सातवें संस्करण का लोगो लॉन्च किया था और जून में मिर्जापुर के विंध्याचल धाम में दर्शन-पूजन किया था।
टिकट न मिलने के पीछे क्या कारण माने जा रहे हैं?
पार्टी की ओर से कारणों का आधिकारिक ब्योरा मेरे सामने नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों और रिपोर्टों में कुछ संभावित वजहें गिनाई जा रही हैं:
सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा अपने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को नए सिरे से साध रही है। माना जा रहा है कि उच्च सदन के लिए नए चेहरों और अलग सामाजिक संतुलन को तरजीह दी गई है।
बलिया में चुनावी पकड़
2024 में बलिया से नीरज शेखर की हार को भी एक अहम कारण बताया जा रहा है। बलिया के एक वरिष्ठ पत्रकार के हवाले से कहा जा रहा है कि पूर्वांचल में पिछले चुनावों में भाजपा को कम सीटें मिलीं और बलिया में नीरज शेखर भी खुद नहीं जीत सके।
पार्टी की चयन नीति
भाजपा पर राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन में चौंकाने वाले फैसले लेने और बिना बड़े कारण के एक ही नेता को बार-बार दोहराने से बचने का तर्क भी दिया जा रहा है। इसे भी एक संभावित कारण माना जा रहा है।
अब आगे क्या?
विश्लेषकों के मुताबिक नीरज शेखर के सामने कुछ विकल्प हैं। वह संगठन में सक्रिय रहकर अपनी जमीनी पकड़ साबित कर सकते हैं, 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के जरिए नई पारी शुरू कर सकते हैं या अगले लोकसभा चुनाव का इंतजार कर सकते हैं। यह भी संभव है कि पार्टी आगे उन्हें संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी दे। फिलहाल यह सब अनुमान ही है और असली तस्वीर पार्टी तथा खुद नीरज शेखर के फैसले से साफ होगी।
बलिया के लिए क्या मायने?
चंद्रशेखर के बाद पूर्वांचल, खासकर बलिया की राजनीति में शेखर परिवार की मौजूदगी लंबे समय तक रही है। इस घटनाक्रम से संसद में उसकी उपस्थिति का एक अध्याय फिलहाल थम गया है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा नए चेहरों और नए समीकरणों पर दांव लगाती दिख रही है।

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