साइबर अपराध और न्याय का कड़वा सच: ‘SPIR 2026’ रिपोर्ट में बड़ा खुलासा; पुलिस-बैंकों की बेरुखी से रिश्वत और रसूख ही बने रिकवरी का सहारा
लोकनीति-सीएसडीएस और कॉमन कॉज़ के 16 राज्यों के सर्वेक्षण में सामने आई व्यवस्था की लाचारी; 51% गरीब पीड़ितों को काम कराने के लिए देनी पड़ी रिश्वत, 55% ने लगाया व्यक्तिगत संपर्कों का जोर।
देश में डिजिटल लेन-देन और इंटरनेट का इस्तेमाल जितनी तेजी से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से साइबर फ्रॉड और ऑनलाइन ठगी के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन जब एक आम नागरिक साइबर अपराध का शिकार होता है, तो उसे पुलिस और व्यवस्था से न्याय पाने के लिए किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है? अक्टूबर 2026 में जारी लोकनीति-सीएसडीएस (Lokniti-CSDS) और कॉमन कॉज़ (Common Cause) की संयुक्त अध्ययन रिपोर्ट ‘स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट (SPIR) 2026’ ने इस कड़वी हकीकत का पर्दाफाश किया है। 16 राज्यों के 8,306 नागरिकों पर किए गए इस व्यापक सर्वेक्षण के अनुसार, औपचारिक पुलिस प्रक्रिया में देरी और बेरुखी के कारण साइबर शिकायतों के निवारण में रिश्वतखोरी (Bribery) और व्यक्तिगत रसूख (Personal Networks) सबसे कारगर साधन बनकर उभरे हैं।
भारत में साइबर अपराध के मामलों में 17.9% की भारी वृद्धि हुई है (2023 में 86,420 मामलों से बढ़कर 2024 में 1,01,928 मामले), जबकि देश में कुल दर्ज अपराधों में 6% की कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर ठगी का शिकार हुए केवल 49% पीड़ित ही पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हैं। 39% पीड़ित पुलिस के चक्कर काटने के डर से शिकायत ही दर्ज नहीं कराते, जबकि 9% पहली यात्रा के बाद प्रक्रिया छोड़ देते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पुलिस थानों और बैंकों से मदद न मिलने के कारण पीड़ित अनौपचारिक रास्तों को अपनाने पर मजबूर हैं, और ये अनौपचारिक तरीके हाशिए पर खड़े (गरीब, ग्रामीण व महिला) पीड़ितों के लिए अधिक बार इस्तेमाल होते दिखते हैं।
1. पुलिस और बैंकों का उदासीन रवैया: एफआईआर और रिकवरी में अड़चनें
रिपोर्ट के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि औपचारिक शिकायत दर्ज कराना एक कठिन परीक्षा है:
- एफआईआर (FIR) दर्ज न होना: अध्ययन में पाया गया कि पुलिस में शिकायत करने वाले 15 पीड़ितों में से केवल 6 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई। इनमें से दो में एफआईआर कराने के लिए पीड़ितों को उच्च अधिकारियों या नेताओं से सिफ़ारिश करानी पड़ी।
- बैंकों की जिम्मेदारी से दूरी: वित्तीय धोखाधड़ी के शिकार पीड़ितों ने बैंकों की भूमिका को 5 में से केवल 1 स्टार की बेहद खराब रेटिंग दी। अधिकांश मामलों में बैंकों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि पीड़ित ने खुद धोखाधड़ी करने वाले की मदद की थी।
- शिकायत प्रक्रिया की जटिलता: 42% शिकायतकर्ताओं ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया को काफी कठिन माना।
2. रिश्वतखोरी और रसूख (Personal Networks) के आंकड़े: SPIR 2026 का सच
सर्वेक्षण में उजागर हुए अनौपचारिक चैनलों के आंकड़े:
| कारक (Informal Channel) | कुल पीड़ित (%) | गरीब पीड़ित (%) | ग्रामीण पीड़ित (%) | पूरी राशि वापस मिलने की दर (Full Recovery %) |
|---|---|---|---|---|
| रिश्वत देना (Paid Bribery) | 27% | 51% | 36% | 41% (रिश्वत न देने वालों में केवल 12%) |
| व्यक्तिगत रसूख का इस्तेमाल | 37% | 55% | 44% | 32% (रसूख न लगाने वालों में केवल 13%) |
नोट: आंकड़े दर्शाते हैं कि रिश्वत या रसूख लगाने पर रिकवरी दर 3 से 4 गुना बढ़ जाती है, जो कि न्याय प्रणाली पर एक गंभीर सवालिया निशान है।
3. हाशिए पर स्थित वर्गों पर दोहरा बोझ (Vulnerable Groups)
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि साइबर अपराध में न्याय पाने का आर्थिक और सामाजिक बोझ सबसे ज्यादा गरीब और ग्रामीण आबादी पर पड़ता है:
- गरीबों के लिए न्याय ज्यादा महंगा: जहां अमीर/संपन्न पीड़ितों में से केवल 12% को पुलिस को रिश्वत देनी पड़ी, वहीं गरीब पीड़ितों में यह आंकड़ा 51% रहा। इसी तरह 55% गरीब पीड़ितों को किसी नेता या वरिष्ठ अधिकारी से पैरवी करानी पड़ी।
- महिलाओं की निर्भरता: साइबर मामलों को आगे बढ़ाने के लिए 35% महिला पीड़ितों को भुगतान/रिश्वत का सहारा लेना पड़ा (पुरुषों में 22%), जबकि 41% महिलाओं को व्यक्तिगत नेटवर्क का उपयोग करना पड़ा।
- संस्थागत विश्वास पर संकट: जब औपचारिक व्यवस्था निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से काम नहीं करती, तो वंचित वर्ग अनौपचारिक रास्तों के लिए सबसे ज्यादा शोषित होता है।
4. संस्थागत सुधार और आगे की राह (Governance Recommendations)
SPIR 2026 रिपोर्ट ने साइबर अपराध से निपटने और पुलिस तंत्र को दुरुस्त करने के लिए मुख्य सुझाव दिए हैं:
- अनिवार्य व ऑनलाइन एफआईआर: साइबर वित्तीय फ्रॉड के मामलों में बिना किसी टालमटोल के डिजिटल एफआईआर (Auto-FIR) प्रणाली लागू करना।
- पुलिस और बैंक का रियल-टाइम तालमेल: 1930 हेल्पलाइन के जरिए ठगी की गई रकम को बैंकों द्वारा तुरंत फ्रीज (Block) करने की समयबद्ध जवाबदेही तय करना।
- भ्रष्टाचार पर नकेल और पारदर्शी ट्रैकिंग: पुलिस थानों में शिकायतों के स्टेटस को ऑनलाइन ट्रैक करने की व्यवस्था हो, ताकि रिश्वतखोरी और विवेकाधीन शक्तियों के दुरुपयोग को रोका जा सके।
- ग्रामीण व साइबर थानों की क्षमता वृद्धि: केवल बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि ब्लॉक और जिला स्तर पर साइबर विशेषज्ञ पुलिसकर्मियों की तैनाती।
निष्कर्ष
‘स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट (SPIR) 2026’ देश के प्रशासनिक और कानूनी ढांचे के सामने एक बड़ा आईना रखती है। साइबर अपराध के शिकार आम नागरिकों, विशेषकर गरीब और ग्रामीण आबादी को यदि न्याय पाने के लिए रिश्वत या राजनीतिक रसूख का सहारा लेना पड़े, तो यह कानून के शासन (Rule of Law) की मूल भावना को कमजोर करता है। समय आ गया है कि सरकारें पुलिस और बैंकिंग प्रणाली को अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाएं।

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