“हर बात में कोर्ट जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ”: जजों के साहसिक बयान पर बोले अभिषेक मनु सिंघवी; कहा—”हर दर्द की दवा न्यायपालिका नहीं”
मतदान अधिकारों पर जस्टिस नरीमन और जस्टिस भुइयां की टिप्पणियों की तारीफ की; चुनाव आयोग से जुड़े कानूनी विवादों पर कांग्रेस सांसद का संतुलनकारी रुख।
देश के प्रमुख संविधान विशेषज्ञ, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और तेलंगाना से कांग्रेस के राज्य सभा सांसद डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (Dr. Abhishek Manu Singhvi) ने चुनावी शुचिता, नागरिकों के मतदान अधिकारों और न्यायपालिका की भूमिका पर 5 अक्टूबर 2026 को दो बड़े व दूरगामी बयान दिए हैं। एक ओर जहां सिंघवी ने सर्वोच्च अदालत के वर्तमान न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर.एफ. नरीमन द्वारा वोटिंग राइट्स और चुनावी प्रक्रिया पर दी गई बेबाक राय का स्वागत किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हर छोटी-बड़ी बात पर कोर्ट जाने की प्रवृत्ति का विरोध करते हुए इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतिकूल बताया।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि चुनावी शुचिता पर जस्टिस नरीमन और जस्टिस भुइयां के बयानों में सबसे महत्वपूर्ण बात उनकी “निडरता और स्पष्टता” है। उन्होंने भारतीय नागरिक समाज के डॉक्टरों, इंजीनियरों, वकीलों और आम नागरिकों से भी बिना किसी डर के लोकतंत्र के सवालों पर बेबाकी से बोलने की अपील की। इसके साथ ही, एक इंटरव्यू में बोलते हुए सिंघवी ने एक परिपक्व कानूनी रुख अपनाते हुए कहा कि छोटी-छोटी बातों पर बार-बार अदालत का दरवाजा खटखटाने से न्यायिक विलंब (Judicial Delay) बढ़ता है और राजनीतिक व लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अवहेलना होती है।
1. “सच को सच कहने का साहस”: जजों की निडरता पर क्या बोले सिंघवी?
मतदान के अधिकार पर न्यायविदों की टिप्पणियों का समर्थन करते हुए सिंघवी के प्रमुख विचार:
- विद्वता और साहसिकता का संगम: सिंघवी ने कहा कि जस्टिस नरीमन एक वकील, कानून अधिकारी और जज—तीनों भूमिकाओं में अत्यधिक विद्वान व्यक्ति रहे हैं। जब वे आम नागरिक के वोट देने के अधिकार पर बोलते हैं, तो उनका बयान ऐतिहासिक महत्व रखता है।
- जस्टिस भुइयां की सराहना: उन्होंने जस्टिस उज्ज्वल भुइयां को न्यायपालिका के सबसे सम्मानित और बेबाक लोगों में से एक बताया और कहा कि संस्थागत दबावों के बीच सच को सच कहना एक नया और सकारात्मक बदलाव है।
- नागरिक समाज से अपील: सिंघवी ने आह्वान किया कि भारत के प्रबुद्ध वर्ग और आम नागरिकों को भी लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए इसी तरह निडर होकर अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए।
2. डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी: बहुआयामी प्रोफाइल और उपलब्धियां (Profile Card)
वरिष्ठ अधिवक्ता और जनप्रतिनिधि के रूप में उनका रिपोर्ट कार्ड:
| पहलू (Parameter) | विवरण व तथ्य (Details & Facts) |
|---|---|
| नाम व पहचान | डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (वरिष्ठ अधिवक्ता व कांग्रेस सांसद) |
| संसदीय स्थिति | तेलंगाना राज्य से राज्य सभा सांसद (पूर्व में राजस्थान/पश्चिम बंगाल से) |
| पूर्व कानूनी पद | भारत के सबसे युवा अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) रहे |
| शैक्षणिक योग्यता | सेंट स्टीफंस (दिल्ली), ट्रिनिटी कॉलेज (कैम्ब्रिज) और हार्वर्ड से पीएच.डी. |
| परोपकार/स्कॉलरशिप | कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के साथ वार्षिक ‘सिंहवी-ट्रिनिटी स्कॉलरशिप’ का संचालन |
| हालिया प्रमुख स्टैंड | चुनावी निष्पक्षता का समर्थन व न्यायपालिका पर अत्यधिक निर्भरता का विरोध |
3. “हर दर्द का इलाज न्यायपालिका नहीं”: चुनाव आयोग विवाद पर रुख
अदालती कार्यवाहियों और लोकतांत्रिक संतुलन पर सिंघवी का स्पष्टीकरण:
- ‘छींके और कोर्ट गए’ संस्कृति का विरोध: सिंघवी ने कहा कि लोगों को लगता है कि जरा सा विवाद हुआ नहीं कि आप कोर्ट पहुंच जाएं। यह रवैया लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करता है।
- न्यायिक देरी की वास्तविकता: उन्होंने स्पष्ट किया कि याचिका दायर होने के बाद नोटिस, जवाब और सुनवाई की प्रक्रिया में व्यापक विलंब होता है। इसलिए हर राजनीतिक या प्रशासनिक समस्या का हल केवल कोर्ट से तलाशना सही रणनीति नहीं है।
- शिक्षा और वैश्विक योगदान: कानून के क्षेत्र में मेधावी छात्रों को आगे बढ़ाने के लिए डॉ. सिंघवी द्वारा शुरू की गई ‘सिंहवी-ट्रिनिटी स्कॉलरशिप 2026’ के तहत नेशनल लॉ स्कूल (NLSIU) के स्नातक कार्तिक कालरा को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में एलएलएम (LLM) के लिए पूर्ण वित्त पोषित छात्रवृत्ति प्रदान की गई है।
निष्कर्ष
देश के सबसे प्रमुख संवैधानिक वकीलों में शुमार डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी के हालिया बयान उनकी कानूनी परिपक्वता और लोकतांत्रिक संतुलन को दर्शाते हैं। एक तरफ जहां वे चुनावी निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए न्यायपालिका और नागरिक समाज की सक्रियता के हिमायती हैं, वहीं दूसरी तरफ वे अदालतों पर अत्यधिक बोझ डालने के बजाय राजनीतिक व लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के जरिए समाधान खोजने की वकालत करते हैं।


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