समुद्र के बढ़ते स्तर पर संयुक्त राष्ट्र का ऐतिहासिक घोषणापत्र: डूबते द्वीप देशों का नहीं खत्म होगा ‘अस्तित्व’; भारत के 7,500 किमी लंबे तटबंधों पर भी मंडराया संकट
193 सदस्य देशों की सहमति से UNGA ने पास किया राजनीतिक घोषणापत्र; समुद्र में जमीन डूबने पर भी बरकरार रहेगी संप्रभुता व समुद्री सीमाएं (EEZ), भारत के मुंबई, कोलकाता व सुंदरबन पर बढ़ा खतरा।
वैश्विक तापमान में वृद्धि और ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के लगातार बढ़ते जलस्तर के गंभीर खतरे से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने एक ऐतिहासिक मील का पत्थर पार किया है। 24 सितंबर 2026 को यूएन महासभा के 81वें सत्र के दौरान सर्वसम्मति से ‘समुद्र स्तर वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र’ (UN Declaration on Sea-Level Rise) को अपनाया गया। यह पहला मौका है जब दुनिया भर के देशों ने स्वीकार किया है कि समुद्र में जलमग्न होने की स्थिति में भी छोटे द्वीप देशों की संप्रभुता, राज्य का दर्जा (Statehood) और संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता खत्म नहीं होगी। यह घोषणापत्र वैश्विक स्तर पर 77 करोड़ से अधिक तटीय निवासियों और भारत जैसे व्यापक तटरेखा वाले देशों के लिए नीतिगत दिशा तय करता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के आंकड़े दर्शाते हैं कि वैश्विक समुद्र स्तर बढ़ने की दर 1993-2002 में 2.1 मिमी प्रति वर्ष से बढ़कर 2015-2024 में 4.7 मिमी प्रति वर्ष हो गई है, जबकि अकेले वर्ष 2024 में 5.9 मिमी की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई। भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) का अनुमान है कि वर्ष 2100 तक भारत के तटों पर समुद्र का स्तर 0.5 से 1 मीटर तक बढ़ सकता है। भारत की 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा, जिस पर 35 करोड़ से अधिक आबादी आजीविका के लिए निर्भर है, तटीय कटाव, लवणीकरण (Salinisation) और मुंबई, चेन्नई, कोलकाता व सुंदरबन जैसे क्षेत्रों में विनाशकारी चक्रवाती तूफानों (Storm Surges) के अत्यधिक जोखिम का सामना कर रही है।
1. डूबते द्वीप और अंतरराष्ट्रीय कानून: SIDS की संप्रभुता की रक्षा
संयुक्त राष्ट्र के इस 4-पृष्ठीय घोषणापत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत द्वीप राष्ट्रों को अभूतपूर्व कानूनी संरक्षण दिया गया है:
- राज्य के दर्जे की निरंतरता (Legal Continuity): यदि किसी छोटे द्वीप देश (SIDS) का भूभाग पूरी तरह समुद्र में समा जाता है, तब भी उसकी सरकार, अंतरराष्ट्रीय पहचान और यूएन की सदस्यता समाप्त नहीं मानी जाएगी।
- स्थिर समुद्री सीमाएं (Fixed Maritime Baselines): समुद्र तल ऊपर उठने से तटीय आधार रेखाएं (Baselines) बदलने के बावजूद देशों का 200 समुद्री मील का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) और क्षेत्रीय समुद्र की सीमाएं अपरिवर्तित रहेंगी।
- जलवायु न्याय और नुकसान की भरपाई (Loss and Damage): घोषणापत्र में उन विस्थापित आबादी के मानवाधिकारों, पेयजल सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए जलवायु वित्त (Climate Finance) बढ़ाने का आह्वान किया गया है।
2. क्यों बढ़ रहा है समुद्र का स्तर? वैज्ञानिक कारक और भारत का संकट
समुद्र स्तर में वृद्धि केवल पानी के स्तर का बढ़ना नहीं है, बल्कि यह एक जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया है:
| वैज्ञानिक कारक (Scientific Factor) | कार्यप्रणाली और प्रभाव (Mechanism & Impact) | भारत के तटीय क्षेत्रों में स्थिति (Impact on India) |
|---|---|---|
| थर्मल विस्तार (Thermal Expansion) | महासागरों का तापमान बढ़ने से पानी का आयतन (Volume) फैलता है। | हिंद महासागर के तेजी से गर्म होने से तटीय जलस्तर में वृद्धि। |
| ग्लेशियरों का पिघलना (Melting Ice) | अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ पिघलकर महासागरों में मिलना। | वैश्विक जलस्तर में रिकॉर्ड वार्षिक वृद्धि (2024 में 5.9 मिमी)। |
| तटीय धंसाव (Subsidence) | भूजल निष्कर्षण और बुनियादी ढांचे के बोझ से जमीन का धंसना। | कोलकाता और सुंदरबन में समुद्र का सापेक्ष जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। |
| स्टॉर्म सर्ज (Storm Surges) | चक्रवात के दौरान समुद्र का पानी अंदरूनी हिस्सों में घुसना। | ओड़िशा, पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में पेयजल का लवणीकरण। |
3. तटीय सुरक्षा का कौन सा रास्ता बेहतर? ‘कंक्रीट दीवार’ बनाम ‘पारिस्थितिक ढाल’
तटीय कटाव को रोकने के लिए पारंपरिक और आधुनिक पारिस्थितिक दृष्टिकोण में अंतर:
- कंक्रीट सी-वॉल (Hard Sea Walls): समुद्र के तटों पर पत्थरों या कंक्रीट की दीवारें बनाना तात्कालिक संपत्ति की रक्षा तो करता है, लेकिन यह समुद्री धाराओं को मोड़कर पड़ोसी क्षेत्रों में कटाव को और बढ़ा देता है।
- पारिस्थितिक ढाल (Ecosystem-based Buffers): मैंग्रोव जंगलों, तटीय रेत के टीलों (Sand Dunes) और कोरल रीफ का संरक्षण अधिक टिकाऊ साबित होता है। मैंग्रोव लहरों की ऊर्जा को 66% तक कम कर देते हैं और गाद (Sediment) को रोककर जमीन को ऊंचा उठाते हैं।
- नियोजित पुनर्वास (Planned Retreat): अति-संवेदनशील इलाकों से बुनियादी ढांचे और बस्तियों को रणनीतिक रूप से पीछे हटाना।
4. आगे की राह: भारत के लिए रणनीतिक कदम
संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के आलोक में भारत को अपनी तटीय नीति में निम्नलिखित सुधार करने होंगे:
- उच्च-रेजोल्यूशन मैपिंग (Granular Hazard Mapping): INCOIS और ISRO के उपग्रहों के माध्यम से जिला व पंचायत स्तर पर तटीय कटाव और जलभराव के सटीक डिजिटल मानचित्र तैयार किए जाएं।
- तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ/IPZ) का सख्त प्रवर्तन: अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप के लिए ‘द्वीप संरक्षण क्षेत्र’ (IPZ) और मुख्यभूमि पर CRZ नियमों के तहत उच्च जोखिम वाले कंक्रीट निर्माण पर तुरंत रोक लगाई जाए।
- मैंग्रोव और नीली कार्बन (Blue Carbon) का संरक्षण: ‘मिष्टी’ (MISHTI) योजना के तहत देश के सभी तटीय राज्यों में मैंग्रोव आवरण का विस्तार किया जाए।
- वैश्विक नेतृत्व और IRIS पहल: भारत द्वारा शुरू किए गए ‘आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन’ (CDRI) के तहत IRIS (Infrastructure for Resilient Island States) कार्यक्रम को मजबूत कर छोटे द्वीप राष्ट्रों को सौर ऊर्जा, विलवणीकरण (Desalination) और तटीय बुनियादी ढांचे के लिए वित्तीय व तकनीकी मदद दी जाए।
निष्कर्ष
समुद्र के बढ़ते स्तर पर संयुक्त राष्ट्र का यह पहला घोषणापत्र केवल एक विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि डूबते तटीय क्षेत्रों और द्वीप राष्ट्रों के लिए अस्तित्व की ढाल है। भारत के लिए यह चेतावनी और अवसर दोनों है। अपनी 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा को बचाने के लिए भारत को कंक्रीट की दीवारों के बजाय मैंग्रोव रूपी प्राकृतिक ढाल, सख्त तटीय नियमों और उच्च-स्तरीय आपदा योजना को अपनाना होगा।


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