‘डी-सिनाइफिकेशन’ का विरोधाभास: चीन से फैक्ट्रियां हटाना आसान, लेकिन उसका औद्योगिक इकोसिस्टम तैयार करना बेहद कठिन; जानें ग्लोबल सप्लाई चेन की सच्चाई
वैश्विक कंपनियां ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के तहत भारत और वियतनाम का रुख कर रही हैं, लेकिन स्पेयर पार्ट्स, कुशल कारीगरों और लॉजिस्टिक्स के लिए अब भी चीन पर ही टिकी है निर्भरता।
भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक प्रतिबंधों (Tariffs) और वैश्विक सप्लाई चेन में आई रुकावटों के बाद दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs) चीन पर अपनी निर्भरता को कम करने में जुटी हैं। इस प्रक्रिया को वैश्विक अर्थशास्त्र में ‘डी-सिनाइफिकेशन’ (De-Sinification) या ‘चाइना प्लस वन’ (China Plus One) रणनीति कहा जा रहा है। एप्पल, सैमसंग और जापानी इलेक्ट्रॉनिक्स दिग्गजों जैसी कंपनियां अपनी विनिर्माण इकाइयों को चीन से निकालकर भारत, वियतनाम, मेक्सिको और थाईलैंड जैसे देशों में स्थानांतरित कर रही हैं। हालांकि, इस आर्थिक बदलाव के बीच एक बड़ा विरोधाभास (Paradox) उभरकर सामने आया है—किसी देश में नई फैक्ट्री की दीवारें खड़ी करना तो आसान है, लेकिन चीन के दशकों पुराने सप्लायर नेटवर्क, कुशल कार्यबल, उन्नत लॉजिस्टिक्स और टेक्नोलॉजी के ‘औद्योगिक इकोसिस्टम’ (Industrial Ecosystem) को किसी दूसरी जगह दोबारा खड़ा करना लगभग असंभव साबित हो रहा है।
सििविल्स डेली और गेटवे हाउस की हालिया औद्योगिक रिपोर्टों के अनुसार, चीन केवल सस्ते श्रम (Cheap Labour) का केंद्र नहीं है, बल्कि वह दुनिया का सबसे बड़ा और सघन कंपोनेंट सप्लायर क्लस्टर है। जब कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी अपनी अंतिम असेंबली (Final Assembly) को चीन से भारत या वियतनाम शिफ्ट करती है, तो भी उस उत्पाद को बनाने में लगने वाले 70 से 80 प्रतिशत कलपुर्जे (Intermediate Components), कच्चा माल और मशीनरी चीन की ही कंपनियों से आयात करनी पड़ती है। यानी फैक्ट्री का पता तो बदल जाता है, लेकिन सप्लाई चेन के तार अब भी चीनी इकोसिस्टम से ही जुड़े रहते हैं। यही कारण है कि ‘डी-सिनाइफिकेशन’ का लक्ष्य हासिल करना कई गुना जटिल और समय लेने वाला बन गया है।
1. क्यों चीन का स्थान लेना आसान नहीं? 5 मुख्य कारक
चीनी विनिर्माण (Chinese Manufacturing) को दुनिया में सबसे प्रतिस्पर्धी बनाने वाले कारक केवल फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं हैं:
- सघन सप्लायर नेटवर्क (Supplier Density): चीन के प्रमुख औद्योगिक शहरों में एक ही शहर के भीतर उत्पाद के हर छोटे से छोटे पुर्जे (नट-बोल्ट से लेकर माइक्रोचिप तक) बनाने वाले दर्जनों सप्लायर्स मौजूद होते हैं।
- अभूतपूर्व लॉजिस्टिक्स व पोर्ट्स: चीन के बंदरगाह, एक्सप्रेसवे, रेलवे और समर्पित कार्गो नेटवर्क उत्पादों को रिकॉर्ड समय में दुनिया के किसी भी कोने में भेजने की क्षमता रखते हैं।
- कुशल और अनुभवी कार्यबल: इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और प्रेसिजन इंजीनियरिंग में चीन के पास दशकों का तकनीकी अनुभव और लाखों कुशल टेक्नीशियन मौजूद हैं।
- संचित व्यावसायिक संबंध (Accumulated Relationships): बहुराष्ट्रीय कंपनियों और चीनी सप्लायर्स के बीच 30-40 सालों से कायम विश्वास, लचीलापन और संकट के समय तेजी से उत्पादन बढ़ाने (Scale Up) की क्षमता।
2. ‘दोतरफा विरोधाभास’ (Two-Sided Paradox) और चीनी कंपनियों की नई चाल
वैश्विक विनिर्माण क्षेत्र में इस समय एक दिलचस्प दोतरफा खेल चल रहा है:
- पश्चिमी कंपनियों की बाहर निकलने की होड़: अमेरिका और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन के दबदबे से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
- चीनी दिग्गजों का वैश्विक विस्तार (BYD & Xpeng Model): बीवायडी (BYD) और एक्सपेंग (Xpeng) जैसी चीनी इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियां जब यूरोप या हंगरी में अपनी फैक्ट्रियां लगा रही हैं, तो वे अपने साथ अपने चीनी सप्लायर नेटवर्क को भी विदेशों में ले जा रही हैं।
- चेंजिंग टारगेट (Moving Target): जहां एक तरफ अन्य देश चीन के पुराने मैन्युफैक्चरिंग मॉडल की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं चीन रोबोटिक्स, एआई और उच्च-तकनीकी सेमीकंडक्टर निर्माण में खुद को तेजी से अपग्रेड कर रहा है।
3. भारत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए क्या हैं सबक?
‘चाइना प्लस वन’ रणनीति से भारत, वियतनाम और मेक्सिको जैसी अर्थव्यवस्थाओं को बड़ा लाभ हो रहा है, लेकिन वास्तविक सफलता के लिए कुछ कड़े कदम जरूरी हैं:
- केवल ‘असेंबली हब’ बनने से बचें: भारत को केवल विदेशों से आए पुर्जों को जोड़ने (Final Assembly) तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश के भीतर ही कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग (Component Ecosystem) को बढ़ावा देना होगा।
- घरेलू सप्लायर नेटवर्क का विकास: प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाओं के जरिए एमएसएमई (MSMEs) और स्थानीय पुर्जा निर्माताओं को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालना होगा।
- लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचे में सुधार: बंदरगाहों, मालगाड़ियों और सीमा शुल्क (Customs) प्रक्रियाओं को तेज और पारदर्शी बनाना होगा ताकि माल ढुलाई की लागत (Logistics Cost) घट सके।
निष्कर्ष
‘डी-सिनाइफिकेशन’ या चीन से दूरी बनाने की प्रक्रिया केवल किसी एक देश से फैक्ट्रियां उखाड़कर दूसरे देश में लगाने जितना सरल मामला नहीं है। चीन ने पिछले चार दशकों में जिस अद्वितीय औद्योगिक इकोसिस्टम का निर्माण किया है, उसे रातों-रात अन्यत्र दोहराया नहीं जा सकता। भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए यह एक बड़ा अवसर है कि वे केवल अंतिम असेंबली तक सीमित न रहकर अनुसंधान, डिजाइन, उच्च-स्तरीय लॉजिस्टिक्स और घरेलू सप्लायर नेटवर्क का निर्माण करें, ताकि वैश्विक सप्लाई चेन में सही मायनों में चीन का एक मजबूत और आत्मनिर्भर विकल्प बन सकें।
