ग्लोबल साउथ के लिए मिसाल बन सकता है गुजरात का जल प्रबंधन मॉडल, 4P पर जोर
नई दिल्ली: जल संकट अब केवल पानी की कमी का सवाल नहीं रह गया है। बढ़ते शहर, कृषि की बढ़ती जरूरत, भूजल का गिरता स्तर और जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित बारिश दुनिया के कई विकासशील देशों के सामने जल सुरक्षा की बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ऐसे समय में भारत के गुजरात से विकसित जल प्रबंधन अनुभव को ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक संभावित मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।
6 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात से भारत और फिर व्यापक ग्लोबल साउथ तक विकसित हुए जल प्रबंधन अनुभव पर आधारित एक लेख साझा किया। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि जल सुरक्षा केवल बांध, पाइपलाइन या जलाशय बनाने से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए मजबूत संस्थाओं, स्थानीय भागीदारी, वित्तीय संसाधनों और बेहतर योजना की भी जरूरत होती है।
गुजरात से शुरू हुआ शासन आधारित प्रयोग
गुजरात में 2001 से 2014 के बीच जल प्रबंधन को लेकर किए गए संस्थागत सुधारों में स्थानीय जरूरतों, प्रशासनिक समन्वय और समुदाय की भागीदारी पर जोर दिया गया। चिंतन शिविरों जैसे मंचों के माध्यम से विभिन्न विभागों और हितधारकों को एक साथ लाकर जल संबंधी समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा की गई।
इस अनुभव से एक महत्वपूर्ण सबक सामने आया कि जल संकट का समाधान केवल नई परियोजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि जल संसाधन और जल सेवा को एक साथ प्रबंधित करने से संभव है।
4P मॉडल में क्या है खास?
इस दृष्टिकोण को चार प्रमुख स्तंभों से जोड़ा गया है, जिन्हें 4P कहा जाता है। इनमें राजनीतिक नेतृत्व, सार्वजनिक वित्त, साझेदारी और लोगों की भागीदारी शामिल हैं।
राजनीतिक नेतृत्व जल को दीर्घकालिक प्राथमिकता देता है, सार्वजनिक वित्त योजनाओं के निर्माण और संचालन के लिए संसाधन उपलब्ध कराता है, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के बीच साझेदारी काम को विस्तार देती है और लोगों की भागीदारी योजनाओं को जमीन से जोड़ती है।
इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि समुदाय को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि जल व्यवस्था का भागीदार और जिम्मेदार हितधारक माना जाता है।
पानी की पाइपलाइन से आगे की सोच
भारत की जल नीति में पिछले वर्षों में कई बड़े कार्यक्रम सामने आए हैं। जल जीवन मिशन का लक्ष्य ग्रामीण परिवारों तक सुरक्षित और पर्याप्त नल से जल पहुंचाना है। वहीं जल शक्ति अभियान: कैच द रेन बारिश के पानी को संचित करने और स्थानीय जल संरक्षण को बढ़ावा देता है।
अटल भूजल योजना में सामुदायिक भागीदारी के जरिए भूजल प्रबंधन पर जोर दिया गया, जबकि ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ के माध्यम से कम पानी में अधिक कृषि उत्पादन के लिए सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा दिया गया।
इन योजनाओं की खासियत यह है कि ये जल संकट को अलग-अलग हिस्सों में देखने के बजाय पेयजल, कृषि, भूजल और वर्षा जल संरक्षण को व्यापक जल प्रबंधन व्यवस्था से जोड़ती हैं।
पानी समितियां बढ़ाती हैं स्थानीय जिम्मेदारी
ग्रामीण क्षेत्रों में पानी समितियां जैसी संस्थाएं जल आपूर्ति व्यवस्था के संचालन और स्थानीय निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। स्थानीय समुदाय यदि यह तय करने में शामिल हो कि पानी का उपयोग कैसे होगा, स्रोतों को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा और व्यवस्था के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी, तो योजनाओं के लंबे समय तक चलने की संभावना बढ़ती है।
2026 में गुजरात समेत कई राज्यों के साथ जल जीवन मिशन 2.0 के तहत सुधार आधारित समझौते भी किए गए हैं। इनका उद्देश्य ग्रामीण जल सेवा को अधिक टिकाऊ, जवाबदेह और समुदाय आधारित बनाना है।
ग्लोबल साउथ के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई विकासशील देशों में तेजी से शहरीकरण और कृषि की बढ़ती मांग पानी पर दबाव बढ़ा रही है। ऐसे देशों में केवल बड़े जल ढांचे बनाना महंगा होने के साथ-साथ कई बार पर्याप्त समाधान भी नहीं देता।
भारत का अनुभव यह दिखाता है कि स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जल-कुशल कृषि और समुदाय आधारित संस्थाएं मिलकर अपेक्षाकृत टिकाऊ व्यवस्था तैयार कर सकती हैं।
हालांकि किसी एक देश का मॉडल दूसरे देश में ज्यों का त्यों लागू नहीं किया जा सकता। स्थानीय जलवायु, भूगोल, सामाजिक संरचना, कृषि पद्धति और प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार बदलाव जरूरी होंगे।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ेगी चुनौती
जलवायु परिवर्तन के कारण कई क्षेत्रों में बारिश का समय और स्वरूप बदल रहा है। कहीं कम बारिश और सूखे की स्थिति बन रही है तो कहीं कम समय में अत्यधिक वर्षा से बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है।

ऐसे में भविष्य की जल नीति का लक्ष्य केवल अधिक पानी उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि जल स्रोतों को जलवायु झटकों के प्रति अधिक लचीला बनाना होगा। इसके लिए भूजल की निगरानी, वर्षा जल का स्थानीय संचयन, जल पुनर्चक्रण और कृषि में पानी की दक्षता बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।
भारत के सामने भी कई चुनौतियां
भारत के जल प्रबंधन मॉडल की चर्चा करते समय इसकी सीमाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन, जल स्रोतों का प्रदूषण, योजनाओं के रखरखाव और ग्रामीण जल आपूर्ति की निरंतरता अभी भी चुनौती हैं।
इसलिए सफलता को केवल कितने नल कनेक्शन दिए गए या कितनी संरचनाएं बनाई गईं, इससे नहीं मापा जाना चाहिए। असली कसौटी यह है कि लोगों को लगातार सुरक्षित पानी मिल रहा है या नहीं और स्थानीय जल स्रोत भविष्य के लिए सुरक्षित हैं या नहीं।
आगे की राह
भारत ग्लोबल साउथ के साथ दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से जल प्रबंधन के अपने अनुभव साझा कर सकता है। इसमें डिजिटल जल निगरानी, भूजल आंकड़े, वर्षा जल संचयन, सामुदायिक संस्थाएं, वित्तीय मॉडल और जल-कुशल कृषि जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।
आखिरकार गुजरात के अनुभव से सबसे बड़ा सबक यही निकलता है कि जल सुरक्षा केवल इंजीनियरिंग की परियोजना नहीं, बल्कि शासन, वित्त, संस्थाओं और समाज की साझा जिम्मेदारी है। यदि इस सोच को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जाए, तो भारत का अनुभव ग्लोबल साउथ के देशों के लिए उपयोगी मार्गदर्शन बन सकता है।

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