2036 ओलंपिक की मेजबानी से पहले भारत को बदलना होगा अपना खेल तंत्र, प्रतिभा से लेकर बुनियादी ढांचे तक बड़ी चुनौती
नई दिल्ली: भारत के 2036 ओलंपिक की मेजबानी के लक्ष्य ने देश के खेल तंत्र को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन पिछले कुछ वर्षों में बेहतर हुआ है, लेकिन ओलंपिक जैसी विशाल प्रतियोगिता की मेजबानी केवल स्टेडियम और आयोजन क्षमता का सवाल नहीं है। इसके लिए ऐसे मजबूत खेल तंत्र की जरूरत होगी, जो देश के गांवों और स्कूलों से प्रतिभाओं को तलाशकर उन्हें लंबे समय तक प्रशिक्षण, पोषण, चिकित्सा और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा उपलब्ध करा सके।
6 अक्टूबर 2026 तक भारत उन सात देशों में शामिल है जो 2036 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक की मेजबानी में रुचि दिखा चुके हैं। भारत के साथ जर्मनी, कतर, हंगरी, तुर्किये, दक्षिण अफ्रीका और दक्षिण कोरिया भी प्रक्रिया में हैं। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की मौजूदा प्रक्रिया के अनुसार आगे की बातचीत के बाद मेजबान का चयन बाद के चरण में होगा।
ओलंपिक की मेजबानी सिर्फ स्टेडियम बनाने का सवाल नहीं
किसी देश के लिए ओलंपिक की मेजबानी वैश्विक प्रतिष्ठा, पर्यटन, खेल कूटनीति और आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से बड़ा अवसर हो सकती है। लेकिन इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि आयोजन समाप्त होने के बाद बनाए गए स्टेडियम, प्रशिक्षण केंद्र और अन्य सुविधाएं कितनी उपयोगी रहती हैं।
इसी को स्थायी खेल विरासत कहा जा सकता है। यदि अरबों रुपये खर्च करके बनाए गए परिसर कुछ वर्षों बाद कम उपयोग में आने लगें, तो आयोजन का सामाजिक और आर्थिक लाभ सीमित हो सकता है। इसलिए भारत के लिए जरूरी है कि ओलंपिक के लिए तैयार होने वाली सुविधाएं केवल 2036 के आयोजन को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि उसके बाद की कई दशकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाएं।
भारत का प्रदर्शन सुधरा, लेकिन प्रतिभा की लंबी श्रृंखला जरूरी
भारत ने अंतरराष्ट्रीय खेलों में अपनी स्थिति मजबूत की है। 2022 एशियाई खेलों में भारत ने 107 पदक जीतकर पहली बार 100 से अधिक पदक हासिल किए थे। 2026 एशियाई खेलों से पहले भी देश की नजर 100 से अधिक पदकों का आंकड़ा दोहराने पर रही है।
फिर भी ओलंपिक के स्तर पर भारत की चुनौती अलग है। कुछ खेलों में विश्वस्तरीय खिलाड़ियों की मौजूदगी अपने आप में पर्याप्त नहीं होगी। देश को बड़ी संख्या में ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत होगी जो लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंच सकें।
यानी एक-दो असाधारण खिलाड़ियों पर निर्भर रहने के बजाय स्कूल, कॉलेज और स्थानीय स्तर से राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक प्रतिभा की लगातार श्रृंखला तैयार करनी होगी।
खेलो इंडिया में बड़ा निवेश, अब जमीन पर असर की परीक्षा
भारत सरकार ने 2026 में खेलो इंडिया योजना और राष्ट्रीय खेल महासंघों को सहायता के लिए 2026-27 से 2030-31 तक कुल 36,441 करोड़ रुपये के संयुक्त परिव्यय को मंजूरी दी है। सरकार के अनुसार इस योजना का उद्देश्य स्कूल और ग्रामीण स्तर से लेकर उच्च प्रदर्शन वाले खिलाड़ियों तक एक व्यवस्थित रास्ता तैयार करना है।
योजना में 9,000 खेलो इंडिया खिलाड़ियों और 18,000 उभरते खिलाड़ियों को 30 प्राथमिक खेलों में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। प्रशिक्षण के साथ भोजन, चिकित्सा सहायता, खेल सामग्री, यात्रा और शैक्षणिक सहयोग जैसी सुविधाओं को भी इसमें शामिल किया गया है।
यह निवेश महत्वपूर्ण है, लेकिन असली परीक्षा कार्यान्वयन और परिणाम की होगी। प्रतिभा पहचान कितनी पारदर्शी है, खिलाड़ियों को कितने वर्षों तक समर्थन मिलता है और सुविधाएं छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों तक कितनी पहुंचती हैं, इससे इस योजना की वास्तविक सफलता तय होगी।
कोचिंग और खेल विज्ञान में सुधार जरूरी
ओलंपिक स्तर की तैयारी केवल रोजाना अभ्यास से नहीं होती। आधुनिक खेलों में खेल विज्ञान, पोषण, शरीर विज्ञान, चोट प्रबंधन, मनोवैज्ञानिक तैयारी, जैव-यांत्रिकी और आंकड़ों के विश्लेषण की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सरकार की नई योजनाओं में खेल विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण को भी शामिल किया गया है। साथ ही राष्ट्रीय कोच मान्यता व्यवस्था शुरू करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।
भारत के लिए अगला कदम यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी सुविधाएं केवल चुनिंदा राष्ट्रीय केंद्रों तक सीमित न रहें। जिला और राज्य स्तर के खिलाड़ियों को भी वैज्ञानिक प्रशिक्षण और विशेषज्ञ सहायता मिलनी चाहिए।
महिला खिलाड़ियों की बढ़ती भागीदारी उम्मीद जगाती है
भारतीय खेलों में महिलाओं की उपलब्धियां इस बात का प्रमाण हैं कि अवसर और संस्थागत समर्थन मिलने पर प्रतिभा तेजी से सामने आ सकती है। मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, कुश्ती, बैडमिंटन, निशानेबाजी और एथलेटिक्स जैसे खेलों में भारतीय महिला खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
इसलिए भविष्य की खेल नीति में महिला खिलाड़ियों के लिए सुरक्षित प्रशिक्षण वातावरण, बेहतर सुविधाएं, पोषण, प्रतियोगिताओं में निरंतर अवसर और करियर के बाद की सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी प्राथमिकता देनी होगी।
खेल महासंघों का सुशासन भी बड़ी कसौटी
भारत की 2036 ओलंपिक दावेदारी के संदर्भ में खेल संस्थाओं का प्रशासन, पारदर्शिता और डोपिंग नियंत्रण भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। सरकार ने स्वयं 2036 की दावेदारी से जुड़े संवाद में खेल संस्थाओं के सुशासन, डोपिंग रोधी उपायों और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन को प्रमुख विषयों में बताया है।
खिलाड़ी-केंद्रित व्यवस्था का अर्थ है कि निर्णयों के केंद्र में खिलाड़ी का प्रशिक्षण, स्वास्थ्य और प्रदर्शन हो। महासंघों में बेहतर प्रशासन, स्पष्ट जवाबदेही और पेशेवर प्रबंधन इस दिशा में महत्वपूर्ण होंगे।
खेल को मानव पूंजी के रूप में देखना होगा
भारत के लिए खेल केवल पदक जीतने का माध्यम नहीं होना चाहिए। नियमित खेल गतिविधियां बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य, अनुशासन, मानसिक क्षमता और सामाजिक भागीदारी को मजबूत करती हैं।
यही कारण है कि खेलों में निवेश को केवल ओलंपिक पदकों की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए। यदि 2036 की तैयारी के दौरान देश में बेहतर मैदान, प्रशिक्षित कोच, खेल विज्ञान केंद्र, स्थानीय प्रतियोगिताएं और स्कूलों में खेल संस्कृति विकसित होती है, तो उसका लाभ ओलंपिक के बाद भी कई पीढ़ियों तक मिल सकता है।
2036 का लक्ष्य, 2036 से बहुत आगे की तैयारी
भारत की ओलंपिक दावेदारी अभी चयनित मेजबानी में नहीं बदली है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने देश के सामने एक बड़ा अवसर जरूर रखा है। राष्ट्रीय खेल नीति 2025 और 2026 में विस्तारित खेलो इंडिया योजना का घोषित लक्ष्य भी जमीनी स्तर से लेकर उच्च प्रदर्शन वाले खेलों तक एक मजबूत व्यवस्था बनाना है।
आखिरकार भारत के लिए असली उपलब्धि केवल 2036 में दुनिया की मेजबानी करना नहीं होगी। असली सफलता तब होगी जब ओलंपिक की तैयारी के बहाने देश ऐसा खेल तंत्र बना सके जिसमें किसी प्रतिभाशाली बच्चे का भविष्य उसके शहर, परिवार की आर्थिक स्थिति या संसाधनों की कमी से तय न हो।
ओलंपिक का मंच 2036 में मिले या नहीं, भारत की खेल व्यवस्था को आज से ही ऐसा बनना होगा कि प्रतिभा को पदक तक पहुंचने के लिए संयोग का सहारा न लेना पड़े।

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