बर्बादी रोकें, खुशहाली लाएं: अंतर्राष्ट्रीय खाद्य हानि और अपव्यय जागरूकता दिवस पर भारत के पास बड़ा अवसर; पोषण सुरक्षा, किसानों की आय और संसाधन दक्षता में होगा सुधार
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और एफएओ (FAO) का आह्वान: कटाई के बाद के नुकसान (Post-Harvest Loss) को रोककर भारत 17 करोड़ की आबादी के लिए बेहतर पोषण सुनिश्चित कर सकता है।
दुनिया भर में प्रतिवर्ष 29 सितंबर को मनाए जाने वाले ‘अंतर्राष्ट्रीय खाद्य हानि और अपव्यय जागरूकता दिवस’ (International Day of Awareness of Food Loss and Waste – IDAFLW 2026) ने भारत के कृषि-खाद्य क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी अवसर को रेखांकित किया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) द्वारा आयोजित इस वैश्विक दिवस का मुख्य उद्देश्य भोजन के नुकसान और बर्बादी को रोककर भुखमरी मिटाना, किसानों की आय बढ़ाना और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में यदि खेत से लेकर थाली तक भोजन के नुकसान को रोका जाए, तो देश में पोषण सुरक्षा, कृषि आय और पर्यावरण संरक्षण तीनों लक्ष्यों को एक साथ हासिल किया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की हालिया UNEP फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति घरेलू खाद्य अपव्यय (Food Waste) 55 किलोग्राम प्रति वर्ष है, जो वैश्विक औसत (79 किग्रा/वर्ष) से काफी कम है। हालांकि, भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती कटाई के बाद आपूर्ति श्रृंखला में होने वाला खाद्यान्न नुकसान (Post-Harvest Food Loss) है। अपर्याप्त कोल्ड चेन, वेयरहाउसिंग, प्रसंस्करण (Processing) और परिवहन की कमी के कारण देश में हर साल अरबों रुपये की फल, सब्जियां और खाद्यान्न सड़ जाते हैं। जबकि दूसरी ओर, देश में लगभग 170-175 मिलियन (17 करोड़) लोग कुपोषण और खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। ऐसे में खाद्य हानि को रोकना भारत के लिए केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि एक आर्थिक व सामाजिक आवश्यकता बन चुका है।
1. ‘फूड लॉस’ बनाम ‘फूड वेस्ट’: दोनों में क्या है अंतर?
अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति में भोजन की बर्बादी को दो अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है:
- खाद्य हानि (Food Loss): यह फसल की कटाई, भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन के दौरान (यानी बाजार या रिटेल तक पहुंचने से पहले) होने वाला नुकसान है। भारत जैसे विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे की कमी से ‘फूड लॉस’ अधिक होता है।
- खाद्य अपव्यय (Food Waste): यह रिटेल दुकानों, होटलों, रेस्तरां और घरों में खाने योग्य भोजन को फेंकने या बर्बाद करने से संबंधित है। वैश्विक स्तर पर उपलब्ध भोजन का लगभग 19% (1.05 अरब टन) बर्बाद कर दिया जाता है।
- घरेलू स्तर पर बर्बादी: वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, कुल खाद्य अपव्यय का 60 प्रतिशत हिस्सा घरों में, 28 प्रतिशत रेस्तरां/होटलों में और 12 प्रतिशत खुदरा (Retail) दुकानों में होता है।
2. किसानों की आय में वृद्धि और कुपोषण से मुक्ति का ‘त्रिवेणी संगम’
भोजन के नुकसान को कम करने से भारत को तीन बड़े प्रत्यक्ष लाभ मिल सकते हैं:
- पोषण और खाद्य सुरक्षा: वैश्विक भुखमरी सूचकांक (GHI) की चुनौतियों के बीच, खाद्य हानि को रोककर अतिरिक्त खाद्यान्न को जरूरतमंदों तक पहुंचाया जा सकता है, जिससे कुपोषण दर में तेजी से कमी आएगी।
- किसानों की आय में सीधा इजाफा: फसल कटाई के बाद सड़ने वाले फल और अनाज का संरक्षण होने से किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा और बिचौलियों के कारण होने वाला नुकसान समाप्त होगा।
- सर्कुलर इकोनॉमी और रोजगार: खाद्य प्रसंस्करण, रीसाइक्लिंग और एग्री-टेक स्टार्टअप्स के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में नए रोजगार और उद्यमिता के अवसर पैदा होंगे।
3. पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास लक्ष्य (SDG 12.3)
भोजन की बर्बादी केवल आर्थिक नुकसान नहीं है, बल्कि यह धरती के बहुमूल्य संसाधनों की भी बर्बादी है:
- प्राकृतिक संसाधनों की बचत: बर्बाद होने वाले भोजन को उगाने में भारी मात्रा में पानी, भूमि, उर्वरक और ऊर्जा की खपत होती है।
- ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन: लैंडफिल (कचरे के ढेरों) में सड़ने वाला भोजन मीथेन (Methane) जैसी खतरनाक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करता है, जो वैश्विक तापमान (Global Warming) को बढ़ाती है।
- एसडीजी लक्ष्य 12.3 (SDG Target 12.3): संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक खुदरा व उपभोक्ता स्तर पर प्रति व्यक्ति खाद्य अपव्यय को आधा किया जाए और उत्पादन व आपूर्ति श्रृंखला में खाद्य हानि को कम किया जाए।
निष्कर्ष
‘अंतर्राष्ट्रीय खाद्य हानि और अपव्यय जागरूकता दिवस 2026’ भारत को यह याद दिलाता है कि हमारी पारंपरिक भारतीय संस्कृति में ‘अन्न ही पूर्णब्रह्म है’ का संदेश सदियों से दिया जाता रहा है। आधुनिक तकनीक, बेहतर कोल्ड-स्टोरेज बुनियादी ढांचे, एग्री-लॉजिस्टिक्स में निवेश और उपभोक्ता जागरूकता के माध्यम से भारत भोजन के नुकसान को न्यूनतम कर सकता है। भोजन के एक-एक दाने की बचत करके हम न केवल अपने अन्नदाताओं को समृद्ध बना सकते हैं, बल्कि देश से कुपोषण को समाप्त कर एक हरित और सतत भविष्य की नींव रख सकते हैं।
