MMDR Amendment Act 2026: खनिजों पर केंद्र का बढ़ा दखल, राज्यों से टकराव क्यों? समझिए पूरा विवाद
MMDR Amendment Act 2026 के लागू होने के बाद भारत में केंद्र और राज्यों के बीच खनिज संसाधनों और राजस्व के बंटवारे को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। संसद ने 13 अगस्त 2026 को संशोधन विधेयक पारित किया था और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इसे 22 अगस्त 2026 से लागू कर दिया गया। संशोधन का उद्देश्य खनन क्षेत्र में कर और शुल्क व्यवस्था को अधिक समान, स्थिर और पूर्वानुमेय बनाना बताया गया है। लेकिन खनिज-संपन्न राज्यों का एक वर्ग मानता है कि नए प्रावधान उनके वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों को सीमित करते हैं।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खनिजों से मिलने वाली आय कई राज्यों की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। मामला केवल खनन नीति का नहीं, बल्कि भारतीय संघवाद और राजकोषीय स्वायत्तता का भी बन गया है।
MMDR Amendment Act 2026 में क्या बदला?
संशोधन के तहत केंद्र सरकार के नियामक अधिकारों का दायरा बढ़ाकर केवल खानों और खनिज विकास तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि खनिज-युक्त भूमि को भी इसके दायरे में शामिल किया गया है।
सबसे महत्वपूर्ण बदलाव नई धारा 9D से जुड़ा है। इसके तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर अपनी ओर से कर, उपकर या अन्य शुल्क मनमाने ढंग से नहीं लगा सकेंगी। ऐसे शुल्क केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अनुसार ही लगाए जा सकेंगे।
इसके अलावा, संशोधन लागू होने से पहले लगाए गए कुछ ऐसे राज्य स्तरीय कर या उपकर, जिनकी राशि अभी तक जमा या वसूल नहीं की गई थी, उन्हें कानून के तहत अमान्य माना गया है। यही प्रावधान राज्यों की सबसे बड़ी आपत्तियों में शामिल है।
संविधान में खनिजों पर अधिकार किसका है?
खनन क्षेत्र में केंद्र और राज्यों के अधिकार संविधान की सातवीं अनुसूची से तय होते हैं। राज्य सूची की प्रविष्टि 23 राज्यों को खानों के विनियमन और खनिज विकास से जुड़े मामलों में अधिकार देती है। हालांकि यह अधिकार संघ सूची की प्रविष्टि 54 के अधीन है। इसके तहत संसद सार्वजनिक हित में खनिज विकास को संघ के नियंत्रण में लेने के लिए कानून बना सकती है।
इसके अलावा राज्य सूची की प्रविष्टि 50 राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति देती है, लेकिन यह शक्ति संसद द्वारा खनिज विकास से संबंधित कानून के जरिए लगाई गई सीमाओं के अधीन है। जमीन पर कर लगाने की शक्ति अलग संवैधानिक प्रावधानों से आती है।
यही संवैधानिक ढांचा मौजूदा विवाद को जटिल बनाता है। प्रश्न यह है कि संसद खनिज विकास के नाम पर राज्यों की कराधान शक्ति पर कितनी सीमा तक नियंत्रण लगा सकती है।
2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद बदली थी तस्वीर
इस विवाद की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का 25 जुलाई 2024 का Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से माना था कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि MMDR कानून के तहत दी जाने वाली रॉयल्टी को कर नहीं माना जा सकता।
इस फैसले ने खनिज-संपन्न राज्यों के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने की संभावना बढ़ा दी थी। कुछ राज्यों ने इसके बाद खनिज-युक्त भूमि से जुड़े कर और उपकर लगाने की दिशा में कदम उठाए।
2026 का संशोधन इसी पृष्ठभूमि में आया है। इसलिए राज्य इसे केवल खनन सुधार नहीं, बल्कि 2024 के फैसले से मिली अपनी वित्तीय गुंजाइश पर नए सिरे से लगाई गई सीमा के रूप में देख रहे हैं।
खनिज-संपन्न राज्यों को क्यों है चिंता?
खनिज और पेट्रोलियम से मिलने वाली आय सभी राज्यों के लिए समान महत्व नहीं रखती। जिन राज्यों में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और अन्य खनिजों का बड़ा उत्पादन होता है, उनके लिए खनन से मिलने वाली राशि विकास और बजट प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
2024-25 में राज्यों की अपनी गैर-कर आय का लगभग 41 प्रतिशत, यानी करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये, खनिज और पेट्रोलियम से संबंधित प्राप्तियों से आया था। ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इसका महत्व राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है।
उदाहरण के लिए, झारखंड ने 2026-27 के बजट में खनिज-युक्त भूमि उपकर से करीब 14,656 करोड़ रुपये की आय का अनुमान लगाया है। ऐसे में केंद्र के नए प्रतिबंधों का असर राज्य के भविष्य के राजस्व पर पड़ने की आशंका स्वाभाविक है।
केंद्र का क्या तर्क है?
केंद्र सरकार का कहना है कि अलग-अलग राज्यों में कई प्रकार के कर और शुल्क लगाने से खनन कंपनियों पर लागत बढ़ती है। इससे खनिजों की कीमत, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत और औद्योगिक उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
सरकार के अनुसार नया कानून खनन क्षेत्र में स्थिरता, समानता और पूर्वानुमेयता लाएगा तथा निवेश को प्रोत्साहित करेगा। केंद्र का यह भी कहना है कि खनन से मिलने वाले कुल कर और वैधानिक भुगतानों का लगभग 90 प्रतिशत राज्यों को ही मिलता है, इसलिए राज्यों के मौजूदा प्रमुख राजस्व स्रोत को समाप्त नहीं किया जा रहा है।
राज्यों का विरोध और ओडिशा का नया मोर्चा
दूसरी ओर, कई विपक्षी-शासित राज्यों ने कानून की संवैधानिकता और वित्तीय प्रभाव पर सवाल उठाए हैं। कर्नाटक, केरल और तेलंगाना ने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की थी। बाद में झारखंड सरकार ने भी कानून को अदालत में चुनौती देने का फैसला किया।
ओडिशा में विवाद और तेज हो गया है। विधानसभा के हालिया सत्र में विपक्ष ने संशोधन के खिलाफ लगातार प्रदर्शन किया। अब 8 अक्टूबर 2026 को राज्यव्यापी बंद का आह्वान भी किया गया है। विपक्ष का आरोप है कि कानून से राज्य को भविष्य में बड़े पैमाने पर राजस्व नुकसान हो सकता है। हालांकि इन नुकसान के आंकड़ों को लेकर केंद्र और राज्य पक्षों के दावे अलग-अलग हैं।
असली सवाल: एकरूपता या राज्य की स्वायत्तता?
MMDR Amendment Act 2026 मूल रूप से दो अलग-अलग जरूरतों के बीच संतुलन का सवाल खड़ा करता है। एक ओर केंद्र का तर्क है कि देश के खनन क्षेत्र के लिए एक समान और स्थिर वित्तीय व्यवस्था जरूरी है। दूसरी ओर राज्यों का कहना है कि खनन का सामाजिक और पर्यावरणीय बोझ स्थानीय स्तर पर उन्हें उठाना पड़ता है, इसलिए प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली आय पर उनका पर्याप्त अधिकार भी होना चाहिए।
यही वजह है कि यह विवाद आने वाले समय में राजकोषीय संघवाद की एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन सकता है। अदालतों के सामने अब यह सवाल भी महत्वपूर्ण होगा कि संसद द्वारा खनिज विकास के क्षेत्र में लगाई गई नई सीमाएं राज्यों की संवैधानिक कराधान शक्तियों के साथ किस सीमा तक संतुलित हैं।
MMDR Amendment Act 2026 इसलिए केवल खनन क्षेत्र का नया कानून नहीं है। यह भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण, राज्यों की वित्तीय स्वतंत्रता और केंद्र-राज्य संबंधों के बीच संतुलन की बड़ी बहस का नया अध्याय बन चुका है।

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