संविधान के बुनियादी ढांचे से खिलवाड़? ‘एक देश, एक चुनाव’ JPC का सुप्रीम कोर्ट दौरा रद्द; जानिए क्यों गरमाया ‘शक्ति पृथक्करण’ का मुद्दा
विपक्ष की सख्त आपत्ति के बाद पीछे हटी संसदीय समिति; वरिष्ठ अधिवक्ताओं का तर्क—”विधेयक पास होने से पहले जजों से चर्चा करना असंवैधानिक और न्यायिक समीक्षा को प्रभावित करने जैसा।”
केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election – ONOE) से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सिटिंग जजों से मिलने का प्रस्तावित दौरा विवादों में घिरने के बाद रद्द कर दिया गया है। 6 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित इस “अनौपचारिक चर्चा” (Informal Discussion) पर विपक्षी दलों और कानूनी विशेषज्ञों ने तीखी आपत्ति जताई थी। राज्यसभा सांसद व वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल तथा कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने इसे भारतीय संविधान के मूल सिद्धांत ‘शक्ति पृथक्करण’ (Separation of Powers) का सीधा उल्लंघन करार दिया था। भारी विरोध और सुप्रीम कोर्ट की ओर से अनिच्छा के बाद JPC चेयरमैन और बीजेपी सांसद पी. पी. चौधरी ने इस दौरे को टालने की घोषणा की।
JPC 129वें संविधान संशोधन विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक, 2024 की समीक्षा कर रही है। समिति ने पूर्व मुख्य न्यायाधीशों (जैसे जस्टिस यू.यू. ललित, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़) से पहले ही विचार-विमर्श किया है। हालांकि, जब समिति ने सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जजों (वर्तमान न्यायाधीशों) से औपचारिक/अनौपचारिक चर्चा करने का कार्यक्रम तय किया, तो यह सवाल उठा कि जो न्यायपालिका कल को इस प्रस्तावित कानून की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) करेगी और उसकी संवैधानिक वैधता की जांच करेगी, उससे कानून बनाने वाली संसदीय समिति पहले ही परामर्श कैसे कर सकती है?
1. ‘शक्ति पृथक्करण’ (Separation of Powers) क्या है और यह मुद्दा क्यों बना?
भारतीय लोकतंत्र के तीन प्रमुख अंगों के बीच अधिकारों का बंटवारा:
- विधायिका (Parliament): कानून बनाने का काम करती है।
- कार्यपालिका (Executive): कानून को लागू करती है।
- न्यायपालिका (Judiciary): कानून की संवैधानिक व्याख्या करती है और यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी कानून संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन न करे।
विवाद की मुख्य वजह: यदि संसद की कोई समिति किसी प्रस्तावित विधेयक पर सिटिंग जजों से ही चर्चा करने लगेगी, तो विधायिका और न्यायपालिका के बीच की रेखा धुंधली हो जाएगी। कपिल सिब्बल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “देश के इतिहास में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई संसदीय समिति सुप्रीम कोर्ट में जाकर जजों को यह बताए कि आने वाला बिल कितना अच्छा है। यह सीधे तौर पर जजों को प्रभावित करने का प्रयास है।”
2. JPC के प्रस्तावित दौरे और संवैधानिक सिद्धांतों का तुलनात्मक विश्लेषण
संसदीय समिति और संवैधानिक नियमों के बीच टकराव के मुख्य बिंदु:
| संवैधानिक पहलू (Constitutional Aspect) | नियम/प्रावधान (Rule/Provision) | JPC के दौरे से उत्पन्न चिंता (Concern Raised) |
|---|---|---|
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) | सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा पास कानूनों की जांच करता है | पास होने से पहले जजों से चर्चा करने पर उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे |
| परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार (Article 143) | केवल राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग सकते हैं | किसी संसदीय समिति के पास जजों से अनौपचारिक सलाह लेने का अधिकार नहीं है |
| संस्थागत स्वतंत्रता (Independence) | न्यायपालिका और विधायिका का स्वतंत्र रहना आवश्यक है | दोनों के बीच संस्थागत ओवरलैप (Overlap) से संविधान का मूल ढांचा प्रभावित होगा |
| पूर्व जजों vs सिटिंग जजों की सलाह | पूर्व जजों/विशेषज्ञों को समिति में बुलाना सामान्य है | कोर्ट के वर्तमान कार्यरत जजों से उनके कक्ष में जाकर चर्चा करना अभूतपूर्व है |
3. अनुच्छेद 143 और न्यायिक समीक्षा का टकराव
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इस कदम से दो मुख्य संवैधानिक संकट खड़े हो रहे थे:
- अनुच्छेद 143 की अनदेखी: संविधान का अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे कानून के किसी जटिल प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट से परामर्श (Advisory Opinion) मांगें। कोई संसदीय समिति स्वयं जजों के पास जाकर परामर्श नहीं ले सकती।
- भविष्य की याचिकाओं पर प्रभाव: ‘एक देश, एक चुनाव’ कानून लागू होने के बाद यदि सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी जाती (जैसे राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती का मुद्दा), तो जिन जजों ने समिति से चर्चा की होगी, वे उस बेंच का हिस्सा बनने पर नैतिक व कानूनी रूप से असमंजस में पड़ जाते।
निष्कर्ष और संदेश
JPC द्वारा सुप्रीम कोर्ट का दौरा रद्द किया जाना यह दर्शाता है कि भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक संतुलन (Checks and Balances) और ‘शक्ति पृथक्करण’ का सिद्धांत आज भी अत्यंत मजबूत है। विधायिका का काम जनता के प्रतिनिधियों के बीच चर्चा करके कानून बनाना है, जबकि न्यायपालिका का काम उस कानून की निष्पक्ष जांच करना है। दोनों संस्थाओं की मर्यादा और स्वतंत्रता बनाए रखना ही भारतीय संविधान की सर्वोच्चता का आधार है।
