दवा क्षेत्र का नया क्षितिज: ‘दुनिया की फार्मेसी’ भारत अब दुर्लभ बीमारियों के इलाज में रचेगा इतिहास; किफायती मैन्युफैक्चरिंग और स्पेशल ‘ऑर्फन-ड्रग’ मॉडल का मेल
9 करोड़ से अधिक भारतीय दुर्लभ बीमारियों से प्रभावित; अमेरिका में पेटेंट-मुक्त हो चुकीं 600 दवाओं के सस्ते निर्माण से भारत बन सकता है वैश्विक ग्लोबल हब।
वैश्विक स्तर पर ‘दुनिया की फार्मेसी’ (Pharmacy of the World) के रूप में विख्यात भारत अब फार्मास्युटिकल क्षेत्र में एक नई क्रांति की ओर कदम बढ़ा रहा है। हालिया स्वास्थ्य व आर्थिक विश्लेषणों में यह रेखांकित किया गया है कि भारत अपनी किफायती जेनेरिक दवा निर्माण क्षमता (Affordable Generic Manufacturing), एपीआई (API) उत्पादन और बायोसिमिलर्स के अनुभव को मिलाकर एक विशेष ‘ऑर्फन-ड्रग इकोसिस्टम’ (Orphan-Drug Ecosystem) तैयार कर सकता है। दुर्लभ बीमारियों (Rare Diseases) के इलाज में आने वाली अत्यधिक लागत और दवाओं की कमी को दूर करने के लिए भारत का यह मॉडल न केवल देश के 9 करोड़ मरीजों को नया जीवन दे सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर विकासशील देशों के लिए भी संजीवनी साबित हो सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार, ‘ऑर्फन ड्रग्स’ (Orphan Drugs) उन दवाओं को कहा जाता है जो अत्यंत दुर्लभ बीमारियों के निदान और इलाज के लिए बनाई जाती हैं। चूंकि इन बीमारियों के मरीजों की संख्या बहुत कम होती है, इसलिए बड़ी फार्मा कंपनियां शोध और विकास (R&D) में भारी व्यावसायिक लाभ न दिखने के कारण इनकी दवाएं बनाने से कतराती हैं, जिससे इन दवाओं की कीमत लाखों-करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है। हालांकि, अमेरिका (US FDA) द्वारा स्वीकृत लगभग 600 ऑर्फन दवाओं के पेटेंट अब समाप्त हो चुके हैं। भारत इनमें से कई दवाओं के एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (APIs) का पहले से निर्माण और निर्यात करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत यदि गैर-लाभकारी सार्वजनिक-हित मॉडल (Section 8 Non-Profit Model) और सीएसआर (CSR) फंड का उपयोग करे, तो वह इन दवाओं के किफायती फॉर्मूलेशन बनाकर घरेलू व अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रांति ला सकता है।
1. भारत में दुर्लभ बीमारियों की विभीषिका और ‘ऑर्फन ड्रग’ संकट
भारत में दुर्लभ बीमारियों का दायरा और मरीजों की स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है:
- 9 करोड़ से अधिक प्रभावित मरीज: भारत में 1,000 से अधिक दुर्लभ आनुवंशिक विकारों (Genetic Disorders) की पहचान की गई है, जिनसे देश में 90 से 96 मिलियन लोग प्रभावित हैं।
- केवल 5% मरीजों तक इलाज की पहुंच: दुर्लभ बीमारियों के 95% मामलों में कोई अनुमोदित थेरेपी उपलब्ध नहीं है, और जहां उपलब्ध है, वहां वार्षिक इलाज का खर्च लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक आता है।
- व्यावसायिक अरुचि (Commercial Disincentives): प्रत्येक दुर्लभ बीमारी के मरीजों की संख्या कम होने के कारण पारंपरिक फार्मास्यूटिकल कंपनियां आरएंडडी में निवेश नहीं करती हैं, जिससे ये दवाएं ‘ऑर्फन’ (लावारिस) रह जाती हैं।
2. भारत के पास क्या है अवसर? 600 पेटेंट-मुक्त दवाओं का निर्माण
भारत अपनी स्थापित जेनेरिक दवा क्षमताओं के बल पर इस संकट का समाधान निकाल सकता है:
- पेटेंट-मुक्त एपीआई (API) की मौजूदगी: अमेरिकी ऑर्फन ड्रग एक्ट 1983 के तहत स्वीकृत लगभग 600 ऑर्फन दवाओं के पेटेंट खत्म हो चुके हैं। भारत इनके कच्चे माल (APIs) का निर्यात करता है, लेकिन घरेलू बाजार के लिए फिनिश्ड सिरप या गोलियां नहीं बनाता।
- पब्लिक-इंटरेस्ट फार्मा मॉडल (Section 8 Companies): इंडियन ऑर्गनाइजेशन फॉर रेयर डिजीज (IORD) ने सुझाव दिया है कि धारा 8 के तहत गैर-लाभकारी कंपनियां बनाकर कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड की मदद से इन दवाओं का नो-प्रॉफिट-नो-लॉस के आधार पर उत्पादन किया जाए।
- उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI Scheme): भारत सरकार की पीएलआई योजना और कस्टम ड्यूटी में छूट से घरेलू स्तर पर कच्चे माल का निर्माण और सस्ता होगा।
3. आगे की राह: विनियामक और क्लिनिकल रोडमैप
भारत को ऑर्फन-ड्रग्स का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने की आवश्यकता है:
- आईसीएमआर (ICMR) पेशेंट रजिस्ट्री: भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद को दुर्लभ बीमारियों के राष्ट्रीय रजिस्टर को क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क के रूप में विकसित करना होगा ताकि दवा परीक्षण आसान हो सकें।
- सीडीएससीओ (CDSCO) रूल 101 के तहत त्वरित मंजूरी: भारतीय औषधि महानियंत्रक को बायोइक्विवेलेंस (Bioequivalence) के आधार पर जेनेरिक ऑर्फन दवाओं को तुरंत मंजूरी देनी चाहिए।
- नवजात शिशुओं की व्यापक जांच (Newborn Screening): राज्यों को नवजात शिशुओं की जांच का दायरा बढ़ाना होगा ताकि दुर्लभ बीमारियों का शुरुआती चरण में ही पता लगाकर इलाज शुरू किया जा सके।
निष्कर्ष
‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में भारत ने जेनेरिक दवाओं के क्षेत्र में जो सफलता हासिल की है, वही सफलता अब ऑर्फन ड्रग्स के क्षेत्र में दोहराई जा सकती है। सस्ती विनिर्माण क्षमता, विशाल वैज्ञानिक जनशक्ति और सार्वजनिक-हित फार्मा मॉडल का संयोजन भारत को दुर्लभ बीमारियों के इलाज का वैश्विक मसीहा बना सकता है। राष्ट्रीय दुर्लभ बीमारी नीति (NPRD) के तहत उठाए गए सरकारी कदमों और घरेलू उद्योग के सहयोग से भारत न केवल अपने करोड़ों नागरिकों को किफायती इलाज दे पाएगा, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा।
