India Coal Crisis:देश के 40% कोयला आधारित पावर प्लांटों में स्टॉक ‘क्रिटिकल’ स्तर पर, 25% से भी कम बची इन्वेंट्री
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के अनुसार 190 में से 74 बिजली संयंत्रों में बचा महज 3 से 7 दिनों का कोयला; पीक डिमांड 267 गीगावाट के पार पहुंचने से बिजली व्यवस्था पर बढ़ा दबाव।
देश भर में देर से आई भीषण गर्मी और बिजली की अभूतपूर्व मांग के बीच भारत का थर्मल पावर इंफ्रास्ट्रक्चर गंभीर दबाव में आ गया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) द्वारा सितंबर 2026 में जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल 190 कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में से लगभग 40 प्रतिशत (74 पावर प्लांट) में कोयले का स्टॉक घटकर 25 प्रतिशत से भी कम यानी अति-संवेदनशील (Critical) स्तर पर पहुंच गया है। इन बिजली घरों के पास महज 3 से 7 दिनों का ही ईंधन बचा है।
भारत की कुल विद्युत उत्पादन प्रणाली 70 प्रतिशत से अधिक थर्मल पावर (कोयला आधारित ऊर्जा) पर निर्भर है। सितंबर 2026 के दूसरे पखवाड़े में देश की पीक पावर डिमांड 267 गीगावाट (GW) के पार पहुंच गई, जो मई में दर्ज रिकॉर्ड 270.70 गीगावाट के बेहद करीब है। यद्यपि कोल इंडिया के खदान मुहानों (Pitheads) पर कोयले का पर्याप्त भंडारण है, लेकिन मुख्य रूप से रेल परिवहन की लॉजिस्टिक बाधाओं और खदान क्षेत्रों में मानसूनी बारिश के कारण यह संकट पैदा हुआ है।
1. 74 पावर प्लांटों में क्रिटिकल स्टॉक: उत्तर और पश्चिमी राज्य सबसे अधिक प्रभावित
सीआरआइएसआईएल (CRISIL) और सीईए के आंकड़ों के अनुसार, 19 सितंबर 2026 तक थर्मल पावर स्टेशनों पर कुल कोयला इन्वेंट्री घटकर 22.9 मिलियन टन (MT) रह गई, जो कि सामान्य आवश्यकता (Normative Stock) का केवल 39 प्रतिशत है।
इस ईंधन संकट की सबसे गाज उत्तर और पश्चिमी राज्यों के बिजली संयंत्रों पर गिरी है:
- हरियाणा: राज्य के सभी 5 थर्मल पावर प्लांट (100% क्षमता) क्रिटिकल जोन में हैं।
- राजस्थान: राज्य की 96.3 प्रतिशत कोयला क्षमता (8 में से 7 प्लांट) क्रिटिकल स्तर पर चल रही है।
- मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र: मध्य प्रदेश में 69% और महाराष्ट्र में 64.5% थर्मल पावर क्षमता में कोयले की गंभीर कमी दर्ज की गई है।
इसके विपरीत, कोयला खदानों के करीब स्थित ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह संकट क्रमशः 10% और 6% तक ही सीमित रहा।
2. रिकॉर्ड बिजली मांग और अक्षय ऊर्जा की सीमाएं
सितंबर महीने में ‘एल् नीनो’ (El Niño) के असर और अत्यधिक तापमान के कारण देश भर में एयर कंडीशनिंग और कूलिंग उपकरणों का इस्तेमाल अचानक बढ़ गया। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच देश में बिजली की कुल खपत में 9.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
यद्यपि सौर और पवन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) स्रोतों से उत्पादन में 20.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, लेकिन उनकी रुक-रुक कर (Intermittent) उत्पादन की प्रकृति और ग्रिड-स्तरीय बैटरी स्टोरेज की सीमित क्षमता के कारण 24 घंटे निर्बाध आपूर्ति के लिए कोयला संयंत्रों को अपनी पूरी क्षमता से चलना पड़ रहा है। पिछले पांच महीनों में थर्मल प्लांटों ने 395 मिलियन टन कोयले की खपत की है, जो पिछले साल से 8% अधिक है।
3. खदानों में कोयला पर्याप्त, परिवहन नेटवर्क में अड़चन
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान संकट कोयले की कुल कमी के कारण नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) की बाधाओं के कारण है:
- पूर्वी खदानों में बारिश: छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा की कोयला खदानों में अनियमित मानसूनी बारिश से खदानों से कोयला निकालने की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
- रेलवे रेक्स (Rakes) की कमी: पावर प्लांटों तक प्रतिदिन आवश्यक 5 से 6 मालगाड़ियों (Rakes) के बजाय केवल 2 से 3 मालगाड़ियां ही पहुंच पा रही थीं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कोयला मंत्रालय और भारतीय रेलवे ने संयुक्त रूप से कोयला ढुलाई के लिए रोजाना चलने वाली मालगाड़ियों की संख्या 370 से बढ़ाकर 444 कर दी है, ताकि बिजली संयंत्रों तक आपूर्ति सुचारू की जा सके।
निष्कर्ष
सितंबर 2026 का कोयला संकट भारत की ऊर्जा प्रणाली की उस संवेदनशीलता को उजागर करता है, जहां बिजली की मांग में जरा सा उछाल आते ही पूरी सप्लाई चेन दबाव में आ जाती है। अल्पकालिक समाधान के रूप में रेलवे मालगाड़ियों की संख्या बढ़ाना और महंगे आयातित कोयले का सहारा लेना तात्कालिक राहत दे सकता है, लेकिन दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए भारत को अपने रेल-कोयला ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को मजबूत करने और ग्रिड-स्केल एनर्जी स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से निवेश करने की आवश्यकता है।

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