मणिपुर: राहत शिविरों में मौतों पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- हमें मजबूर न करें

सुप्रीम कोर्ट सख्त: मणिपुर राहत शिविरों में हुई मौतों पर जताया गहरा अफसोस, राज्य सरकार से मांगा जवाब

देश की सर्वोच्च अदालत ने मणिपुर के राहत शिविरों में हुई कई मौतों को लेकर गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDPs) के लिए बनाए गए राहत शिविरों में हुई दर्जनों मौतों, जिनमें कुछ मामलों में यौन उत्पीड़न की भी आशंका जताई गई है, पर गहरी चिंता जताते हुए राज्य सरकार से विस्तृत जवाब तलब किया है।

क्या है पूरा मामला?

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ 2023 की मणिपुर जातीय हिंसा से जुड़े यौन हिंसा के मामलों की जांच और मुकदमे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान अदालत ने पूर्व जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर गौर किया, जिसमें मुआवजे से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ राहत शिविरों में हुई मौतों का भी जिक्र था।

आठ जिलों में 640 मौतें, सिर्फ 20 मामलों में पोस्टमॉर्टम

अदालत के सामने पेश रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया — आठ जिलों के राहत शिविरों में कुल 640 मौतें दर्ज हुई हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 20 मामलों में ही पोस्टमॉर्टम कराया गया। इसके अलावा समाचार रिपोर्टों में सामने आई 25 अप्राकृतिक मौतों को लेकर अदालत ने मणिपुर के मुख्य सचिव को इन सभी मामलों का पूरा ब्योरा, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और मौत के कारणों से जुड़े अन्य दस्तावेज़ अदालत में पेश करने का निर्देश दिया है।

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बेहद कम मुआवजे पर भी जताई नाराजगी

अदालत ने इस बात पर भी गहरी नाराजगी जताई कि अप्राकृतिक मौत के शिकार हुए विस्थापित लोगों को महज 20,000 से 30,000 रुपये का मुआवजा दिया गया। पीठ ने राज्य सरकार से पूछा है कि आखिर इतनी कम राशि क्यों दी गई। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं, और उन्हें जरूरी चिकित्सा सुविधाएं व दैनिक जरूरत की चीजें मुहैया कराई जा रही हैं या नहीं।

मणिपुर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भी निर्देश

अदालत ने मणिपुर राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (MSLSA) को भी एक अलग स्टेटस रिपोर्ट अदालत में पेश करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश ने प्राधिकरण से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि हर अप्राकृतिक मौत के मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज हो, और सभी मामलों की जांच बिना किसी देरी के पूरी की जाए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राहत शिविरों में रह रहे लोगों की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी है।

अन्य अहम मामलों पर भी हुई सुनवाई

गौरतलब है कि 17 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में कई अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर भी सुनवाई हुई। अदालत ने एक अलग मामले में यह भी कहा कि ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता, और अनुभव के आधार पर वेतन में अंतर को उचित ठहराया जा सकता है। इसके अलावा अदालत ने एक अन्य मामले में लिंग के आधार पर नौकरी से इनकार किए जाने वाली एक महिला को मुआवजा देने का आदेश भी दिया। वहीं एक अलग आदेश में अदालत ने डिस्टेंस या ओपन मोड से पहले की डिग्री रखने वाले, लेकिन नियमित मोड से तीन साल की एलएलबी करने वाले विधि स्नातकों को अस्थायी रूप से अधिवक्ता के तौर पर पंजीकरण की अनुमति भी दे दी, जब तक इस मुद्दे पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता।

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आगे क्या होगा

फिलहाल सभी की नजरें मणिपुर सरकार की तरफ से दाखिल होने वाले हलफनामे पर टिकी हैं, जिसमें राज्य को यह बताना होगा कि राहत शिविरों में हुई मौतों की जांच के लिए क्या कदम उठाए गए और आगे क्या कार्रवाई प्रस्तावित है। यह मामला 2023 से चली आ रही मणिपुर जातीय हिंसा से जुड़े व्यापक न्यायिक हस्तक्षेप का हिस्सा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट लगातार राज्य में पीड़ितों को न्याय दिलाने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निगरानी बनाए हुए है।

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द्वारा Kanchan

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