हूथी विद्रोही
हूथी विद्रोही

 

हूथी विद्रोहियों का बड़ा कब्जा: लाल सागर के अहम जलमार्ग पर कंट्रोल, भारत पर भी मंडरा रहा खतरा

 

यमन के ईरान-समर्थित हूथी विद्रोही एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में हैं। बीते कुछ हफ्तों में हूथी लड़ाकों ने लाल सागर के तट पर तेजी से बढ़त बनाते हुए बाब अल-मंडब जलडमरूमध्य के आसपास के अहम इलाकों पर लगभग पूरा नियंत्रण हासिल कर लिया है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक रूप से अहम समुद्री रास्तों में गिना जाता है, और इस पर हूथी कब्जे ने वैश्विक व्यापार, तेल आपूर्ति और खासतौर पर भारत जैसे देशों की चिंता बढ़ा दी है।

कैसे हुई यह ताज़ा जंग शुरू?

करीब चार साल की सापेक्ष शांति के बाद जुलाई 2026 में यमन में हूथी विद्रोहियों और सऊदी समर्थित सरकारी सेना के बीच लड़ाई फिर भड़क उठी थी। अगस्त-सितंबर के दौरान यह संघर्ष और तेज हो गया, जब हूथी लड़ाकों ने अपना ध्यान उत्तरी यमन से हटाकर पश्चिमी तटीय इलाकों की ओर केंद्रित कर दिया। 10 सितंबर 2026 को हूथी बलों ने होदेइदाह प्रांत के हैस और अल-खौखा जिलों पर कब्जा किया, साथ ही पश्चिमी तईज़ प्रांत के मोखा शहर पर भी नियंत्रण हासिल कर लिया। इसके कुछ दिनों बाद यानी 11-12 सितंबर के आसपास हूथी लड़ाकों ने लाल सागर के बीचोंबीच स्थित हनीश द्वीपों पर भी कब्जा जमा लिया, जिससे इस पूरे तटीय क्षेत्र पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया।

बाब अल-मंडब जलडमरूमध्य इतना अहम क्यों?

बाब अल-मंडब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है, और यह यूरोप व एशिया के बीच व्यापार का एक अहम रास्ता है। दुनिया के करीब 10 प्रतिशत व्यापार और लगभग 5 से 7 प्रतिशत वैश्विक तेल शिपमेंट इसी जलमार्ग से होकर गुजरते हैं। इस जलडमरूमध्य का महत्व हाल के महीनों में और बढ़ गया था, क्योंकि 2026 के ईरान युद्ध के दौरान ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने के बाद सऊदी अरब को अपने तेल निर्यात के लिए लाल सागर के रास्ते पर पहले से कहीं ज्यादा निर्भर रहना पड़ा था। मार्च से जुलाई 2026 के बीच बाब अल-मंडब के रास्ते सऊदी अरब का समुद्री कच्चा तेल निर्यात पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले करीब आठ गुना बढ़ गया था। अब जब हूथी विद्रोहियों ने इस पूरे रास्ते पर नियंत्रण जमा लिया है, तो यह सऊदी अरब समेत पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बन गया है।

बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य | मानचित्र, अवरोध बिंदु, लाल सागर, ईरान युद्ध, यमन, नाकाबंदी और होर्मुज | ब्रिटानिका

सऊदी अरब पर सीधा हमला

हूथी विद्रोहियों का दबाव अब सिर्फ यमन तक सीमित नहीं रहा। 10 सितंबर 2026 को सऊदी अरब की अहम ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, जिसे पेट्रोलाइन कहा जाता है, पर ड्रोन और मिसाइल हमलों की एक श्रृंखला के बाद इसे बंद करना पड़ा। यह पाइपलाइन सऊदी अरब के भीतर तेल को लाल सागर स्थित निर्यात टर्मिनलों तक पहुंचाने के लिए बेहद अहम मानी जाती है। अनुमान है कि इसकी मरम्मत में तीन से पांच हफ्ते तक का समय लग सकता है। इसके अलावा हूथी हमलों में सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों को भी नुकसान पहुंचा है, जिसमें दर्जनों लोग घायल हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज और लाल सागर, दोनों प्रमुख निर्यात रास्तों पर एक साथ खतरा मंडराने से वैश्विक बाजार में करीब 4 प्रतिशत तेल आपूर्ति घटने की आशंका जताई जा रही है।

तेल की कीमतों पर सीधा असर

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ा है। 14 सितंबर 2026 तक ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 3 से 4 प्रतिशत का इजाफा हो चुका था, क्योंकि व्यापारी और विश्लेषक आपूर्ति में संभावित कमी को कीमतों में शामिल कर रहे थे। इसके अलावा अमेरिका में डीजल की कीमतें पहली बार 6 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंच गई हैं, जो इस संकट के वैश्विक असर को दर्शाता है।

भारत के लिए क्यों है यह चिंता की बात

भारत से करीब 3,000 किलोमीटर दूर स्थित इस जलडमरूमध्य पर हूथी नियंत्रण भारत के लिए भी कई मायनों में गंभीर चिंता का विषय है। सबसे पहले, खाड़ी क्षेत्र से आने वाली तेल आपूर्ति में बाधा और होर्मुज पर पहले से जारी दबाव के चलते भारत को ऊर्जा की ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है। दूसरा, यूरोप जाने वाले भारतीय निर्यात के लिए जहाजों को अगर स्वेज नहर की बजाय अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से होकर लंबा रास्ता लेना पड़े, तो इससे ढुलाई की लागत और डिलीवरी का समय दोनों बढ़ जाएंगे। इससे पहले भी लाल सागर में हूथी हमलों के दौरान कंटेनर जहाजों का स्वेज नहर से गुजरना भारी मात्रा में घट गया था, जबकि केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाने वाले जहाजों की संख्या तेजी से बढ़ गई थी। इससे माल ढुलाई की लागत, बीमा प्रीमियम और यात्रा में लगने वाला समय, तीनों बढ़ जाते हैं, जिसका असर आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है।

आगे की राह अनिश्चित?

सऊदी अरब के सामने फिलहाल सीमित विकल्प नज़र आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रियाद पूर्ण युद्ध नहीं चाहता, लेकिन हूथी विद्रोहियों के बढ़ते हौसले उसे व्यापक संघर्ष की ओर धकेल सकते हैं। क्षेत्रीय कूटनीतिक प्रयासों के तहत ईरान के साथ बातचीत की योजना थी, लेकिन 14 सितंबर 2026 को प्रस्तावित यह वार्ता टाल दी गई, जिससे अनिश्चितता और बढ़ गई है। विश्लेषकों के अनुसार सऊदी समर्थित और यूएई समर्थित गुटों के बीच आपसी तालमेल की कमी ने भी हूथी विद्रोहियों को यमन में गहरी बढ़त बनाने का मौका दिया है। फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह संकट कूटनीतिक बातचीत से सुलझेगा, या आने वाले दिनों में और बड़ा टकराव देखने को मिलेगा।

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द्वारा Kanchan

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